शेखावाटी प्रदेश का मौर्यकाल

शेखावाटी प्रदेश का मौर्यकाल

मौर्य सूर्यवंशी क्षत्रिय थे। शाक्यों के उस उच्च तथा पवित्र वंश की वे एक शाखा थे- जिसमें महात्मा गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था। मोर पक्षी के बाहुल्य वाला प्रदेश होने से उसका नाम मौर्य जनपद हुआ और वहां के शासक मौर्य कहलाए 15। बौद्ध धर्मानुयायी होने से ब्राह्मणों ने उन्हें शूद्र कहना प्रारंभ किया जो यथार्थ के विपरीत था।
उसी मौर्य कुल में उत्पन्न राजकुमार चन्द्रगुप्त ने अपने जमाने के महान कूटनीतिज्ञ आचार्य चाणक्य के समर्थन और सहायता के बल पर साम्राज्य भोगी नन्दवंशीय राजा को मार कर मगध महाराज्य पर अधिकार जमाया और पश्चिमोत्तरी भारत के गणतंत्रीय संघराज्यों को भी अपने करद राज्य बनाकर समस्त उत्तरापथ पर एक छत्र साम्राज्य स्थापित किया। तब मत्स्य जनपदः मौर्य साम्राज्य के अन्तर्गत था और वहां के शासक राजवंश मौर्य साम्राज्य के अधीनस्थ सामन्त बन चुके थे।

चन्द्रगुप्त मौर्य के पौत्र सम्राट अशोक ने भारतवर्ष के प्रमुख जनपदों के प्रमुख स्थानों पर पाषाण स्तंभों और पहाड़ी चट्टानों पर धर्माज्ञाएं खुदाई थीं । उसी संदर्भ में मत्स्य जनपद के दो स्थानों पर उस सम्राट के आदेश से दो लघु शिलालेख खुदाये गए। प्रथम लेख बैराठ की भीमडूंगरी16 के पूर्व में स्थित एक चट्टान पर उत्कीर्ण है, जो अब घिसता-घिसता अवाच्य सा हो गया है। दूसरा भाभरू (बाभ्रू) गांव से बारह मील की दूरी पर बीजक की पहाड़ी के एक खंडित शिलाखण्ड पर खुदा हुआ था जो अब कलकत्ता संग्रहालय में सुरक्षित है। उक्त लेख से ज्ञात होता है कि अशोक के शासनकाल में वहां पर एक बौद्ध विहार था और उसमें बौद्ध भिक्षुक रहते थे। सम्राट ने वह लेख इसी निमित्त खुदाया था कि विहार में निवास करने वाले श्रमणों को नियम पालन से सम्बन्धित आदेश दिये जावें। उक्त लेख में उन बौद्ध गं्रथों के नाम ज्ञापित किए गये हैं, जिनमें आचार और धर्म विषयक नियम और उपदेश संकलित थे 17।

सम्राट अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य शनैः-शनैः निर्बल होता चला गया। केन्द्र से अति दूर के राज्य तब पुनः स्वतंत्र बन बैठे। मत्स्य जनपद का भी तब पुनः स्वतंत्र राज्य के रूप में उदय हुआ। किन्तु ऐसा लगता है कि उस काल वहां पर एक शक्तिशाली राज्य न रह कर अनेक छोटे राज्य अस्तित्व में आए हों और उनमें मौर्य सम्राटों के भाई बन्धुओं की भी कुछ जागीरें रही हों, जिनके स्वामी समय का लाभ उठाकर स्वतंत्र शासक बन बैठे हों। यही कारण है कि पश्चात् कालीन समय में वहां पर कई मौर्य राज्यों के अस्तित्व के प्रमाण पाये जाते है । केन्द्रीय शक्ति के शिथिल होते ही साम्राज्य का शक्ति संतुलन समाप्त हुआ। उस अराजक स्थिति का लाभ उठाकर सीरिया और पर्श (इरान) के यवनों (ग्रीकों ने जो उस काल वहां के शासक थे भारत के पश्चिमोत्तरी प्रान्तों पर, जिनमें काबुल और कंधार प्रमुख थे, अधिकार कर लिया। यवनराज मिनेण्डर ने आगे बढ़ कर वाहीक (पंजाब) के साकल (स्यालकोट) नगर को अपनी राजधानी बनाया और शीध्र ही पूर्वी पंजाब भी उसने जीत लिया। फिर तो उसकी सेनाएं घोडों की टापों से आगे के भारतीय प्रदेशों को रौंदती हुई मथुरा, पांचाल और साकेत (कौसल) तक बढती चली गई । साम्राज्य की राजधानी पाटलीपुत्र तब उनके आक्रमण की चपेट में आ चुकी थी। गार्गी संहिता के युग पुराण में उस यवन आक्रमण के सम्बन्ध में वर्णन है-

ततः साकेतमाक्रम्य, पांचालान् मथुरां तथा। यवनादुष्ट विक्रान्ताः, प्राप्स्यन्ति कुसुमध्वज।।

मौर्य साम्राज्य के प्रधान सेनापति शुंगवंशीय ब्राह्मण पुष्य-मित्र ने ग्रीक सेनाओं को मथुरा तक पीछे खेदेड़ कर देश के उस भाग को आसन्न खतरे से बचा लिया किन्तु तब उसने शक्तिहीन मौर्य सम्राट बृहद्रथ को मार कर मगध के राज्य पर अपना अधिकार भी जमा लिया 18। इस प्रकार ईस्वी सन् से 184 वर्ष पूर्व महान मौर्य साम्राज्य का अन्त हुआ। उस शताब्दी में लगातार होने वाले यवन आक्रमणों का प्रतिरोध मत्स्यों को अपनी शक्ति के बल पर करना पड़ा। उन्हीं आक्रमणों की चपेटों से मत्स्यों के अनेक शक्तिशाली राज्य समाप्त हो गए और जो निर्बल थे ग्रीकों की आधीनता स्वीकार करके करद राज्यों के रूप में बने रहे। इतिहास के विद्वानों का अनुमान है कि यवन राजा मिनाण्डर के सिक्कों का यहां पाया जाना यह सिद्ध करता है कि इस प्रदेश पर कुछ काल तक उसका अधिकार रहा होगा। बैराठ के उत्खनन में एक बौद्ध विहार के अवशेष मिले हैं। विहार के चैथे खण्ड (कमरे) में एक मृद् भाण्ड में कपडे़ में बंधी 36 मुद्राएं मिली हैं, जिनमें आठ पंचमार्क चांदी की मुद्राएं हैं तथा शेष 28 मुद्राएं इण्डोग्रीक शासकों की है। उनमें सोलह मुद्राएं यवनराज मिनाण्डर के शासनकाल की होने से यह सिद्ध होता है कि उस काल यह प्रदेश उसके आधीन था। (राजस्थान के इतिहास के स्रोत पृ. 22)। बौद्ध गं्रथों में राजा मिलिन्द के नाम से उसका उल्लेख मिलता हैं।

उस काल काबुल, कंधार, पंजाब और राजस्थान का चित्तौड़ तक का सारा भू-भाग उन ग्रीक राजाओं के अधिकार में था। आचार्य पतंजलि के महाभाष्य में भी यवनों द्वारा साकेत एवं मध्यमिका (चित्तौड़ के समीप नगरी नामक स्थान) के घेरे जाने का उल्लेख मिलता है। यथा- ‘अरुणद्यवनः साकेतं अरुणद्यवनों मध्यमिकाम्।’ 19 परन्तु उपरोक्त स्थिति अधिक समय तक नहीं बनी रही। यवनों को यहां से हटना पड़ा। शुंगों के राज्यकाल में मत्स्यों की राजनैतिक हैसियत क्या थी? इस बाबत कुछ भी पुष्ठ प्रमाण नहीं मिलते। इतिहासज्ञों की राय में शुंग महाराज्य की सीमाएं मथुरा से पूर्व में ही समाप्त होजाती थी। संभव है कि शुंग शासन के प्रारंभिककाल में भी मत्स्य जनपद पर यवनों (ग्रीकों) का ही अधिकार बना रहा होगा और यहां के शासक उनके मातहत बने रहे होंगे। महाकवि कालीदास रचित ‘मालविकाग्निमित्र’ नाटक से ज्ञात होता है कि शुंग सम्राट पुष्यमित्र ने – जो उस समय वृद्धावस्था को प्राप्त हो चुका था- अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया और यज्ञ के घोड़े की रक्षा के निमित अपने पौत्र एवमं अग्निमित्र के पुत्र राजकुमार वसुमित्र को नियुक्त किया। अश्वमेध का श्यामकर्ण घोड़ा जब सिन्धुपारा नदी के पश्चिमी तट पर पहुंचा तो वहां पर स्थित यवनों के रिसालों ने घोड़े को पकड़ लिया। सिन्धुपारा नदी बंुदेलखण्ड और राजपूताना के बीच की नदी है। संभव है वहां पर यवनों ने अपनी सुरक्षा चैकी बना रखी हो। वसुमित्र ने यवनों से युद्ध करके उन्हें पराजिन किया और यज्ञ के घोड़े को छाुडा लिया 20। उपर्युक्त रचना से भी यही प्रमाणित होता है कि राजस्थान के मत्स्य आदि जनपदों पर उस काल किसी न किसी रूप में ग्रीकों का अधिकार बना हुआ था।

इस प्रकार कुछ काल तक इस प्रदेश पर ग्रीक यवनों के अधिकार की छाया बनी रहने पर भी यहां के निवासियों के सांस्कृतिक जीवन, रहन-सहन और आचार-विचारों में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं आया। वे पहले की भांति ही वैदिक धर्मानुयायी बने रहे। किन्तु यह उल्लेखनीय है कि यज्ञ याग की अपेक्षा तब वासुदेव भक्ति और शिवाराधना का अधिक प्रचार हो चुका था। संभव है कि यहां के निवासियों के सम्पर्क से प्रभावित यहां आने वाले यवन भी वासुदेव भक्ति की तरफ आकर्षित होने लगे हों। दशार्ण जनपद की राजधानी विदिशा में यवन राजदूत हेलियोडोरस द्वारा भगवान वासुदेव के निमित्त निर्मित गरुड़ध्वज स्तंभ लेख इस कथन का जीवन्त प्रभाण है । यहां पर पाए जाने वाले यूप लेखों से सिद्ध होता है कि यज्ञों के सम्पादन तथा ब्राह्मणों को गोदान देने का क्रम तब भी यथावत प्रचलित था।

सन्दर्भ :

15.मौर्य साम्राज्य का इतिहास पृ. 119, 136 डॉ. सत्यकेतु विद्यालंकार।
16. जनरल कर्निघम के कथनानुसार – बैराठ को भीमनगर या भीम गांव के नाम से भी किसी युग में वहां के लोग पुकारते रहे है।(Archeological Survey of India in 1883,84 p. 29, 30)
17. ओझा – राजपूताने का इतिहास प्रथम भाग पृ. 104,105
18. मौर्य साम्राज्य का इतिहास पृ. 660 सत्यकेतुविद्यालंकार।
19. भारत के प्राचीन राजवंश पृ. 142, 143 पं. रेऊ।
20. भारत के प्राचीन राजवंश पृ. 144

लेखक : सुरजनसिंह शेखावत, झाझड़, पुस्तक  : शेखावाटी प्रदेश का प्राचीन इतिहास

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