व्यापार ही नहीं शौर्य में भी कम ना रहे है बणिये

व्यापार ही नहीं शौर्य में भी कम ना रहे है बणिये

स्वाभिमान के मामले में समझौता करने वाले लोगों पर अक्सर लोग व्यंग्य कसते सुने जा सकते है कि- “बणिये की मूंछ का क्या ? कब ऊँची हो जाये और कब नीची हो जाय ?” राजस्थान में तो एक कहावत है –गाँव बसायो बाणियो, पार पड़े जद जाणियो” कहावत के जरिये बणिये द्वारा बसाये किसी गांव की स्थिरता पर ही शक किया जाता रहा है|

उपरोक्त कहावतों से साफ है कि अपने व्यापार की सफलता के लिए व्यापारिक धर्म निभाने की बनिए की प्रवृति को लोगों ने उसकी कायरता समझ लिया| जबकि ऐसा नहीं है बनिए ने अपनी मूंछ कभी नीची की है यानी कहीं समझौता किया है तो वह उसकी एक व्यापारिक कार्यविधि का हिस्सा मात्र है| कोई भी व्यक्ति किसी भी व्यापार में सौम्य व्यवहार, मृदु भाषा व संयम के बिना सफल नहीं हो सकता और बनियों ने अपने इन्हीं गुणों के आधार पर व्यापार के हर क्षेत्रों में सफलता चूमी है|

बणिये के इन्हीं गुणों की वजह से उनको कायर मानने वाले लोग यह क्यों नहीं समझते कि आज तो व्यापार करना आसान है, ट्रांसपोर्ट के साधनों से एक जगह से दूसरी जगह माल लाना ले जाना, बैंकों के जरिये धन का स्थानांतरण करना एकदम आसान है जबकि पूर्व काल में जब न बैंक थे न आवागमन के साधन थे| तब भी बणियेअपने घर से हजारों मील दूर ऊंट, बैल गाड़ियों में माल भरकर यात्राएं करते हुए व्यापार करते थे| रास्ते में डाकुओं द्वारा लुटे जाने का पूरा खतरा ही नहीं रहता था, बल्कि कई छोटे शासक भी डाकुओं की भूमिका निभाते हुए व्यापारिक काफिलों को लुट लिया करते थे| फिर भी अपने धन व जान की परवाह किये बगैर बणिये बेधड़क होकर दूर दूर तक अपने काफिले के साथ व्यापार करते घूमते रहते थे| उनका यह कार्य किसी भी वीरता व साहस से कम नहीं था|

व्यापार ही क्यों युद्धों में भी बनियों ने क्षत्रियों की तरह शौर्य भी दिखा इस क्षेत्र में भी वे पीछे नहीं रहे जोधपुर, जैसलमेर का इतिहास पढ़ते हुए ऐसे कई उदाहरण पढने को मिल जाते है| इन पूर्व राज्यों में कई बनिए राज्य के सफल प्रधान सेनापति रहे है जिनकी वीरता व कूटनीति का इतिहासकारों ने लोहा माना है|

राजस्थान का प्रथम इतिहासकार मुंहता नैणसी (मोहनोत नैणसी) जो जैन था और जोधपुर के राजा जसवंत सिंह का सफल प्रधान सेनापति था जिसने जोधपुर राज्य की और से कई युद्ध अभियानों का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया| महाराणा प्रताप का मंत्री भामाशाह भी कोई व्यापारी नहीं एक वीर था| जोधपुर राज्य में महाराजा भीमसिंह व उनके बाद महाराजा मानसिंह के समय में इंद्रराज सिंघवी नामक बनिया जोधपुर का सेनापति रहा जिसकी वीरता, राजनैतिक समझ और कूटनीति इतिहास में भरी पड़ी है| इंद्रराज सिंघवी ने अपनी राजनैतिक कूटनीति व समझदारी से जोधपुर राज्य को ऐसे बुरे वक्त में युद्ध से बचाया था जब जोधपुर महाराजा के ज्यादातर सामंत विरोधियों से मिल जयपुर व बीकानेर की सेनाओं को जोधपुर पर चढ़ा लाये थे और जोधपुर की सेना में सैनिक तो दूर तोपें इधर उधर करने के लिए मजदुरों तक की कमी पड़ गयी थी| ऐसी स्थिति में इंद्रराज सिंघवी ने अपने बलबूते जोधपुर किले से बाहर निकल ऐसी चाल चली कि जयपुर, बीकानेर की सेनाओं को जोधपुर सेना के कमजोर प्रतिरोध के बावजूद मजबूर होकर वापस लौटना पड़ा|

आजादी के कुछ समय पहले भी जब जयपुर की सेना ने सीकर के राजा को गिरफ्तार करने हेतु सीकर पर चढ़ाई की तो शेखावाटी की समस्त शेखावत शक्तियाँ एकजुट होकर जयपुर सेना के खिलाफ आ खड़ी हुई यदि वह युद्ध होता तो भयंकर जनहानि होती पर शेखावाटी के सेठ जमनालाल बजाज की सुझबुझ व कूटनीति ने शेखावाटी व जयपुर के बीच होने वाले भयंकर युद्धपात से बचा लिया|

इन उदाहरणों के अलावा राजस्थान के पूर्व राज्यों के इतिहास में आपको कई ऐसे सफल सेनापतियों के बारे में पढने को मिलेगा जो बनिए थे और उन्होंने अपना परम्परागत व्यापार छोड़ सैन्य सेवा में अपनी वीरता व शौर्य का लोहा मनवाया| ज्ञान दर्पण पर जल्द ही आपको ऐसे शौर्य पुरुषों का परिचय भी पढने को मिलेगा|

20 Responses to "व्यापार ही नहीं शौर्य में भी कम ना रहे है बणिये"

  1. व्यापार ठीक है, लेकिन यहां के लोग तो हर चीज में अपना स्वार्थ लिप्त करने लगे जो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है. गाड़ी अपने निजी प्रयोग में आती है, लेकिन बैलेन्स शीट में व्यापार में.

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  2. प्रवीण पाण्डेय   April 17, 2013 at 4:14 am

    मिट्टी ही वीरता के भाव जगा जाती है।

    Reply
  3. लोग यह क्यों भूल जाते हैं की चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक, गुप्त वंश के सम्राट(भारत का स्वर्ण युग), हर्षवर्धन, यशोवर्धन, हेमू विक्रमादित्य, जनरल करिअप्पा, भामाशाह, महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय आदि ये सभी वैश्य थे….श्रीमान जी मैं आपका लेख अपने ब्लॉग " हमारा वैश्य समाज" पर डालना चाहता हूँ, क्या आप अनुमति देंगे…

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    • Ratan Singh Shekhawat   April 17, 2013 at 5:04 pm

      प्रवीण कुमार गुप्ता जी
      @ आप अपने ब्लॉग पर इस लेख को प्रकाशित कर सकते है !

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    • Praveen Singh   April 18, 2013 at 5:35 am

      please correct your knowledge.
      Hemu was a Brahman
      chandra gupt, harh wardhan, Ashok was a Kshatriya

      भामाशाह, महात्मा गांधी, was vaish

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    • भाई मेरे मैंने जो बात की है इतिहास के आधार पर की हैं. चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक के वंशज आज भी बिहार में है और माहुरी वैश्य कहलाये जाते हैं. गुप्त वंश के शाशको का गोत्र धारण था जो की अग्रवालो का एक गोत्र होता हैं इतिहास कारों ने गुप्त शाशको को वैश्य ही बताया हैं. हेमू को भी इतिहासकारों ने बनिया/बक्काल या वैश्य ही बताया हैं. हेमू के वंशज अपने आप को रौनियार वैश्य कहते हैं. हर्षवर्धन को भारतीय और चीनी इतिहास कारों ने वैश्य ही बता हैं. दरअसल आप भी गलत नहीं हो, राजा कोई भी होता था उसे क्षत्रिय ही कहा जता था. और वर्ण व्यवस्था आपस में परिवर्तित थी. खुद वैश्य समुदाय की अधिकतर जातिया क्षत्रिय ही थी. भगवान परशराम के समय में सबने हथियार छोड़ कर वैश्य कर्म अपना लिया था.

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    • Praveen Singh   April 26, 2013 at 7:06 am

      About chandra Gupta mauraya:-
      The Buddhist text the Mahavamsa calls Chandragupt a member of a division of the Khattiya (Kshatriya) clan called the Moriya (Maurya). Divyāvadāna calls Bindusara, son of Chandragupt, an anointed Kshatriya, Kshatriya Murdhabhishikata, and in the same work King Ashoka, son of Bindusara, is also styled a Kshatriya. The Mahaparinibbana Sutta states that the Moriyas (Mauryas) belonged to the Kshatriya community of Pippalivana. These traditions indicate that Chandragupt came from a Kshatriya lineage. The Mahavamshatika connects him with the Shakya clan of the Buddha, a clan which also belongs to the race of
      A medieval inscription represents the Maurya clan as belonging to the solar race of Kshatriyas. It is stated that the Maurya line sprang from Suryavamsi Mandhatri, son of prince Yuvanashva of the solar race.[citation needed] Chandragupta was a student of Chanakya.

      Source:- http://en.wikipedia.org/wiki/Chandragupta_Maurya
      Some Moori rajputs in rajsthan also trace their roots form Mauray as Moori
      :- Some Communist written has written that Chandragupta was a child of Gadariya

      Yes I have a friend he claim himself as mahuri vaish but He is backward(OBC). As per my knowledge Aggrawals are Upper Cast and Not recognized as OBC in any part of India.

      About Raja HarshVardhan
      Raja harsh vardha is a baniay is written by Xuanzang but he could not understand the difference Vishay or Bais both are different. Raja Harsh Vardhan was a Bais rajput(bais rajput claim their roots from RajaHarsh Vardhan. my once friend has got married from Baise rajpus)

      http://pustak.org/bs/home.php?bookid=3926
      http://en.wikipedia.org/wiki/Harsha

      Hem Chandra Vikramaditya

      Source:- http://www.jatland.com/home/Hemu(I am referring this link only to show that how history is rewriting )

      About BhamaSah
      http://en.wikipedia.org/wiki/Bhamashah

      Reply
    • भाई मेरे वैश्यों में बहुत सी जातिया पिछड़े वर्ग में आती हैं. और एक बात, वैश्यों की अधिकतर जातिय्या क्षत्रियों से निकली हुई हैं. इनका कर्म कही क्षत्रिय रहा और कभी वैश्य, समय के साथ साथ बदलता रहा हैं. वह उस समय की परिस्थिति पर निर्भर रहा हैं. स्थिति यंहा तक है की वैश्यों की एक जाती यदि किसी राज्य में वैश्य कही जाती हैं तो दूसरे में क्षत्रिय कही जाती है. क्षत्रिय कोई जाती नहीं है वर्ण हैं. और वर्ण व्यवस्था आपस में बदलती रहती हैं…

      Reply
    • भाई मेरे वैश्यों में बहुत सी जातिया पिछड़े वर्ग में आती हैं. और एक बात, वैश्यों की अधिकतर जातिय्या क्षत्रियों से निकली हुई हैं. इनका कर्म कही क्षत्रिय रहा और कभी वैश्य, समय के साथ साथ बदलता रहा हैं. वह उस समय की परिस्थिति पर निर्भर रहा हैं. स्थिति यंहा तक है की वैश्यों की एक जाती यदि किसी राज्य में वैश्य कही जाती हैं तो दूसरे में क्षत्रिय कही जाती है. क्षत्रिय कोई जाती नहीं है वर्ण हैं. और वर्ण व्यवस्था आपस में बदलती रहती हैं…

      Reply
    • Praveen Singh   May 3, 2013 at 5:26 am

      Dear Sir,
      First thing I am not taking about cast and Varn I am talking about the origin of the above heroes.
      If I accept your logic then how you can say that Mahatma Gandhi was a Vanish even he never did business in his life. You are proving wrong yourself post by post.
      Please read the above links that is talking about cast of above heroes not about the Varns or etc.
      As per my knowledge cast is a subset of Varns but people is free to do the job what he want,
      Rishi vishwaMistra is a ultimate example.

      Reply
    • Praveen Singh   May 3, 2013 at 5:27 am

      Dear Sir,
      First thing I am not taking about cast and Varn I am talking about the origin of the above heroes.
      If I accept your logic then how you can say that Mahatma Gandhi was a Vanish even he never did business in his life. You are proving wrong yourself post by post.
      Please read the above links that is talking about cast of above heroes not about the Varns or etc.
      As per my knowledge cast is a subset of Varns but people is free to do the job what he want,
      Rishi vishwaMistra is a ultimate example.

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    • Praveen Singh   May 3, 2013 at 10:56 am

      you are saying that Kshtriya is not a Cast Its a Varn then how can you claim that Vaish is a cast It is not a Varn.

      You are saying that Varn is changeable according to work then how can you claim those person as Vaish even they are not vaish as per their duty toward the society.

      Please don't tell the story show me the facts with proof. like me

      If knowingly on unknowingly i have heart you sentiments then please pardon me

      Reply
  4. HARSHVARDHAN   April 17, 2013 at 8:00 am

    ज्ञानवर्द्धक जानकारी उपलब्ध कराने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

    नये लेख : भारतीय रेलवे ने पूरे किये 160 वर्ष।

    Reply
  5. ताऊ रामपुरिया   April 17, 2013 at 9:23 am

    बहुत ही रोचक, जानकारी परक और ऐतिहासिक आलेख.

    रामराम.

    Reply
  6. दिलबाग विर्क   April 17, 2013 at 2:30 pm

    आपकी यह प्रस्तुति कल के चर्चा मंच पर है
    कृपया पधारें

    Reply
  7. Rajput   April 18, 2013 at 5:57 am

    व्यापार मे तो इस जाति का कोई सानी नहीं , ऐसी जगह दुकान लगा कर बर्षों ग्राहक का इंतजार करेंगे की आम आदमी सोच भी सकता, और फिर वक्त ऐसा आएगा की एक माना हुआ व्यापारी बनते देर नहीं लगती

    Reply
  8. वाह! क्या बात है बहुत ख़ूब!

    Reply
  9. Kameshwar Gupta   October 16, 2015 at 8:05 am

    ( रौनियार वैश्य की इतिहास गाथा)-1

    हम रौनियार वैश्य और हमारा वैश्य वंश-
    हमारी रौनियार वैश्य की इतिहास गाथा के प्रथम पुरुष सम्राट चन्द्रगुप्त बिक्रमादित्य हैं,जो गुप्त बंश के सस्थापक थे । इनकी शादी नेपाल की राज कुमारी" कुमारदेवी" से हुआ था ,नेपाल हमारे बंश का ननिहाल है । हमारी राजधानी पटलिपुत्रा थी जो आज पटना कहलाता है । हमारे ही समय में स्वेत हूँण का आक्रमण हुआ था जिसका लोहा हमारे पूर्वज सम्राट स्कन्द गुप्त ने लिया था । हम ही सम्राट हेमचन्द्र बिक्रमादित्य के बंशज है जिसे हेमू के नाम से पुकारते है जो दिल्ली से भारत देश चलाता था ।मध्यकाल में हमें अपमानित करने के लिए "रनहार" (रण +हार) कहा गया जो आधुनिक काल तक आते -आते अपभ्रंश" रौनियार "प्रचलित हो गया ।प्राचीन काल मे भी मुझे करास्कर (कड़कश आबाज मे बात करने वाला ,कड़ी संघर्ष ,कड़ी मेहनत करनेवाला )कहा गया । हमसे अत्याचार बर्दास्त नहीं होता ,अन्याय के खिलाफ खड़े हो जाना डीएनए में है।

    ऋग्वेद का दसवां मण्डल के पुरुष सूक्त मे ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य की उत्पाती की गई। कौटिल्य के अर्थशास्त्र- कौटिल्य का निर्देश है की गंधी , कारस्कर,माली ,धान्य के व्यापारी और प्रधान शिल्पी, क्षत्रियों के साथ राजमहल से पूर्वी भागो में निवास करें ,पक्वान्न ,मदिरा और मांस के बिक्रयी वैश्य राजप्रासाद से दक्षिण के भागों में रहे ,ऊनी और सूती बस्त्रों के शिल्पी तथा जौहरी ब्रहमानों के संग उत्तर दिशा में रहें ।

    हजारो वर्षो से खेती ,पशुपालन ,बाणिज्य ,कारीगरी ,उद्धोग-धंधा तथा अन्य प्रकार के स्वरोजगार व्यापार श्रेणी के मेहनतकश और कड़ी मेहनत से जीविका उपार्जन करने बालो की अपमान जनक स्थिति से गुजरना पड़ा है। ये सभी व्यापारी की श्रेणी में आते है यानि कमेरा(काम काजी लोग ) वर्ग जिसे वैश्य कहते हैं । इसी श्रेणी की एक वैश्य की जाती “कारस्कर “था । जिसका गोत्र कश्यप था । इस समुदाय के लोग फेरि लगाकर नमक व अन्य बस्तुए बेचते थे ,जो नमक बनाकर एवं उत्खनन करके उससे खड़िया नमक ,साधारण नमक एवं सेंधा नमक आदि गाँव –शहर ,देश –विदेश मे बेचते थे । अन्नय आदि बस्तु के बदले बिक्रय करते थे ,इस तरह मुख्य व्यावसाय नमक उत्पादन से लेकर वितरण था । कड़ी मेहनत ,संघर्सशील और बस्तुएँ बेचने के क्रम मे चिल्लाने के कारण प्राचीन काल मे इस जाती को “कारस्कर ”( कड़ी मेहनत,संघर्षशिलता, जुझारूपन और कर्कस आवाज में बोलने बाला )बताया और नीची जाती कहाँ ,एवं अपमानित किया जाता था। कुछ अंग्रेज़ विद्वान इस समुदाय के अधिकांश लोग को जुझारूपन ,फेरि लगाकर नमक बेचते समय चिल्लाने –गाने के कारण इसका नाम रोने –हारे ,तथा रनहार के अपभ्रंश जो बाद मे प्रचलित रौनियार ,रोनियर ,नोनियार ,नोनिया नूनियार [सभी वैश्य जाती ]का सम्बोधन हो गया बताया है । (अर्थशास्त्र पीटरसन की डिक्शनरी ऑफ फीक पृष्ट 303-4) वह आज भी रौनियार प्रचलित है । मेहनती कामों में लगे हुये लोगों को शुरू से लांछित और अपमानित किया जाता रहा है ,जबकि देश के आर्थिक स्थिति मजबूत करने में रौनियार समुदाय की अहम भूमिका थी । सदियों से देशहित ,समाजहित एवं धार्मिकहित में इस समुदाय के लोगों ने अग्रिणी भूमिका निभाते आया है ।

    Reply
  10. Kameshwar Gupta   October 16, 2015 at 8:09 am

    विक्रमादित्य सम्राट चन्द्रगुप्त को कौन नहीं जानता है । अगर भारतवर्ष को सोने की चिड़ियाँ कहा गया था तो वह काल चन्द्रगुप्तबंश का था।किन्तु उस समय भी इस समुदाय के लोगों को अपमानित करने में कोई कसर बाकी नहीं रखा था । “कौमुदी महोत्सव नामक प्राचीन नाटक “में चन्द्रगुप्त को “कारस्कर” बताकर ऐसे नीच जाती के पुरुष को राजा होने के अयोग्य बताया है । जबकि वकाटक महारानी प्रभावती गुप्ता के अभिलेख (महरौली और प्रयाग लौह स्तम्भ लेख )में गुप्तों की वंशावली दी गई है । गुप्त अभिलेखों में जो वंश वृक्षों में सर्वप्रथम नाम ‘श्री गुप्त ‘ का आता है ।“ श्री “शब्द सम्मानार्थ है “गुप्त ”का शाब्दिक अर्थ संरक्षित है । “श्री गुप्त ” का अर्थ लक्ष्मी व्दरा रक्षित (लक्ष्मी पुत्र ) है । चन्द्रगुप्त ,समुद्रगुप्त ,कुमारगुप्त तथा कार्तिकय व्दरा रक्षित हुआ । जो किसी प्रतापी राजा के लिए अत्यंत उपयुक्त है । चीनी यात्री इत्सिंग ने भी यात्रा वृतांत में “चे –लि –कि –तो”(लक्ष्मी पुत्र) बताया है । स्वयं समुद्रगुप्त कि प्रयाग प्रशस्ति –महाराजा श्री गुप्त प्रपौत्रस्य महाराजा घटोत्कच पौत्रस्य महाराजाधिराज चन्द्रगुप्त पुत्रस्य …..श्री समुद्रगुप्तस्य ……क्रमशः ! (1)कुमार गुप्त प्रथम ,स्कन्ध गुप्त ,पुरू गुप्त ,नरसिंह गुप्त बालादित्य ,कुमार गुप्त व्दितिये ,बुध्द गुप्त ,तथागत गुप्त ,बज्रगुप्त ,भानु गुप्त वैन्य गुप्त व्दादशादित्य गुप्त ……..परमभट्टारिकायां राजां महादेव्यां श्री श्रीमती देवयामुतपन्ना ।
    मेहरौली एवं प्रयाग प्रशस्ति से स्पष्ट है कि चन्द्रगुप्त के विरासत लक्ष्मी पुत्र “चे –लि –कि –तो” है । जो सम्मानजनक नमक के व्यापार में लगी जाती का वंशज है । चन्द्रगुप्त की एक स्वर्णमुद्रा है जिस पर एक ओर लिच्छवियः तथा दूसरी ओर चन्द्रगुप्त तथा कुमार देवी उत्कीर्ण है एवं दोनों का चित्र उस पर अंकित है । लिच्छवियों के वैवाहिक संबंध चन्द्रगुप्त के साथ था ,इस कारण इस समुदाय के वंशज को क्षत्रिय भी माना जाने लगा था ,और उत्तर का भू-भाग तथा पश्चिम बंगाल के भू-भाग गुप्तो के अधिकार मे था एवं उत्तर बिहार (वैशाली तक )जो लिच्छवियों की राजकुमारी कुमार देवी के अधिकार मे था । दोनों वंशों का एकीकरण हो गया तथा चन्द्रगुप्त प्रथम ने प्रराक्रम से अन्य राज्यों को जीत कर पाटलीपपुत्र मे फिर से एक साम्राज्य की नींव डाली एवं शुभ अवसर पर महाराजाधिराज की पदवि धारण किया । ………वायुपुराण में ’भोक्षन्ते गुप्त –वंशजाः’ एवं अपने राज्याभिषेक की तिथि को नए संवत ‘गुप्त संवत ‘का घोषणा किए जो तिथि 20 दिसंबर 318 ई॰ अथवा 26 फरवरी 320 ई॰ निश्चित होती है । लगभग 319-320 ई॰ से गुप्त संवत का श्रीगणेश होता है । इस समय तक आते-आते भारत का नक्शा चतुर्भुज की तरह हो गया था तथा भारतवर्ष को सोने की चिड़ियाँ नाम से संबोधित किया जाने लगा था । सम्राट स्कन्ध गुप्त के समय भारत पर कई वार श्वेत हूणों का भयानक आक्रमण हुआ था ,जिसमे गुप्त वंश विजय प्रप्त किया था। इन आक्रमणों ने स्कन्ध गुप्त की शक्ति को झकझोर दिया तथा काफी धन-जन की हानी उठाना पड़ा था। (बिष्णु स्तम्भ-कंधार –हुणेयस्य समागतस्य समरे दोभर्या धरा कंम्पित भीमावर्तकस्य )सम्राट बुद्ध गुप्त तक अपने साम्राज्य की सुरक्षा में लगा रहा ,किन्तु बार-बार हूण आक्रमण जारी रहा । एरण अभिलेख बुद्ध गुप्त ने 484-85ई॰ में प्रसारित किया था। इनके मृत्यु के बाद हूणों ने कब्जा कर लिया । बुद्ध गुप्त के पश्चात उत्तराधिकारी तथागत गुप्त ,नरसिंह गुप्ता ,वैन्य गुप्त तक आते-आते अपने साम्राज्य को एक नहीं रख पायेँ । प्रायः सभी लड़ाई हारते चले गए । छोटे-छोटे राज्यों में देश का विघटन हो गया । छोटे-बड़े सामंतों ने भी कब्जा कर लिया । इस तरह से लंबे समय से गुप्त वंशों का विघटन होते चला गया । सभी लड़ाईयाँ हारते-हारते गुप्त सम्राट के वंशज को मध्यकाल आते आते रणहार (रण +हार)कहा जाने लगा । जो प्राचीन काल मे कारस्कर वंशबृक्ष का था । कारस्कर जाती नमक के व्यापारी थे,अब मध्यकाल मे इनका सम्बोधन रणहार जो काफी प्रचलित हो गया । उस समय अपमान सूचक था । मध्यकाल में सम्राट हेमचन्द्र हेमू जो 1556 में दिल्ली के साशक थे उन्हे भी हारना पड़ा था ,हेमू के बाद के समय तक आते-आते रणहार (रण +हार) शब्द का मध्य –आधुनिक काल में अपभ्रंस रौनियार ,रोनियार ,नूनियार ,नूनिया ,लानियार (सभी वैश्य वर्ग ) गुप्त वंशजों को कहा जाने लगा , जो आज उस गुप्त वंश के समुदाया का जाती सूचक हो गया है। वर्त्तमान में इस जाती का नाम हीं रौनियार हो गया है ।.( कुछ अंग्रेज़ विद्वान इस समुदाय के अधिकांश लोग को जुझारूपन ,फेरि लगाकर नमक बेचते समय चिल्लाने –गाने के कारण इसका नाम रोने –हारे ,तथा रनहार के अपभ्रंश जो बाद मे प्रचलित रौनियार ,रोनियर ,नोनियार ,नोनिया नूनियार लानियार जाती का सम्बोधन हो गया बताया है । (अर्थशास्त्र पीटरसन की डिक्शनरी ऑफ फीक पृष्ट 303-4)).

    Reply
  11. Kameshwar Gupta   October 16, 2015 at 8:09 am

    हम अपने विरासत के इतिहास की छान-बिन करने पर पाते है की शुरू में कारस्कर जाती जिसका गोत्र कश्यप थी , लिच्छवि राजकुमारी ‘कुमार देवी ‘से वैवाहिक संबंध चन्द्रगुप्त से होना ,चीनी यात्री व्हेनसांग का विवरण ,नेपाल की वंशावली ,प्राचीन तिब्ती ग्रन्थ ‘दुल्व ‘आदि से भी प्रमाणित है । उक्त वैवाहिक संबंध से लिच्छवि तथा गुप्त राज्य का एकिकारण हो सका ,उस समय उत्तर का कुछ भू-भाग तथा पश्चिमी बंगाल पर गुप्तों का अधिकार था और उत्तर बिहार लिच्छवियों के अधिकार में था ,चन्द्रगुप्त ने पराक्रम से अन्य राज्यों को भी जीत कर पाटलीपुत्र में फिर से एक साम्राज्य की नींव रखी तथा उस शुभ अवसर पर ‘महाराजाधिराज ‘की उपाधि धारण किया ,इसका प्रमाण स्वयं चन्द्रगुप्त की है ।
    परंतु यह प्रमाणित नहीं है की गुप्त वंश के आदि पुरुष क्षत्रिय थे । गुप्त वंश को जाट या शूद्र भी नहीं कहा जा सकता , क्योंकि भारतिये सांस्कृति में पुरुष के विवाह के उपरांत पुरुष के जाती से ही वंश का जाती माना जाता है ।

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