वो बूढी जाटणी दादी

चेहरे पर झुर्रियां ,थोड़ी झुकी हुई कमर और लाठी के सहारे चलती, लेकिन कड़क आवाज वाली उस बूढी जाटणी दादी की छवि आज वर्षों बाद भी जेहन में ज्यों कि त्यों बनी हुई है | गांव से बाहर लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित अपने खेत में बनी ढाणी के बाहर हाथ में लाठी लिए टहलती वह जाटणी दादी उधर से गुजरते हर राहगीर को आवाज लगाकर अपने पास बुलाती ,कुशल क्षेम पूछती व अनजान राहगीर से परिचय पूछती और फिर उसे ढाणी में चलकर खाना खाने के लिए कहती | शायद ही कोई राहगीर होगा जिसे बिना खिलाये पिलाये उस जाटणी दादी ने जाने दिया हो |
बूढी जाटणी दादीजाटणी दादी के खेतों व उसकी ढाणी के आसपास के खेतों में बैर की छोटी-छोटी झाड़ियाँ बहुतायत से थी साथ ही जाटणी दादी के खेत में बने कुँए से उन दिनों बैलों से पानी खिंच कर सिंचाई होती थी सो जाटणी दादी के बेटे अपने खेत में अन्य फसलों के साथ गाजर, मुली, पालक आदि भी उगाया करते थे अतः बचपन में बेर खाने के लिए खेतों में जाना हो या गाजर मूलियाँ लाने के लिए हमारा पसंदीदा खेत उस बूढी जाटणी दादी का ही हुआ करता था|
बेर तोड़कर खाते व इक्कठा करते बच्चो के झुण्ड पर वह जाटणी दादी दूर से ही पूरी निगाह रखती थी जैसे ही हम बेर इक्कठे कर जाने को होते थे जाटणी दादी का कड़क आवाज में वात्सल्य भरे बुलावे के साथ आदेश आ जाता था कि सभी खाना खाकर ही जायेंगे | ढाणी में पहुँचते ही सभी के लिए बाजरे की रोटी दही ,छाछ व प्याज के साथ तैयार मिलती थी , जिसे भूख हो या नहीं थोडा बहुत तो खाना जरुरी था किसी के मना करने या बहाना करने पर कि खाना घर जाकर खा लेंगे तभी नाराज होकर दादी की कड़क आवाज गूंजती “क्यों मेरे यहाँ के खाने में जहर मिला हुआ है क्या ? जो नहीं खायेगा , चल कुछ खा ले या फिर भूख नहीं भी है तो थोडा दही ही खाले |

आखिर उम्र बढ़ने के साथ ही जाटणी दादी को परलोक जाना ही था और वो चली गयी और उसके साथ ही सिमट गया वह वात्सल्य भरा आवभगत का प्रेम जो उसने अपनी ढाणी के चहुँ ओर राहगीरों के लिए बिखेर रखा था | जब तक वह जाटणी दादी जिन्दा रही उसकी ढाणी दूध ,दही व धन-धान्य से परिपूर्ण खुशहाल थी , उसके रहते कोई राहगीर कभी उसकी ढाणी के पास से भूखा प्यासा नहीं गया पर उसके जाते ही मानों उस ढाणी पर भी ग्रहण लग गया , ढाणी की खुशहाली उसके साथ ही जाती रही | उसके बेटे पोते कर्ज में डूब गए , खेतों में अनाज पैदा होना कम हो गया |

वात्सल्य और ममता की प्रतिमूर्ति जाटणी दादी को तो यमराज परलोक ले गए ओर बेरों की झाड़ियों को ट्रेक्टरों ने खोद खोदकर ख़त्म कर दिया , रह गयी तो सिर्फ याददाश्त उन बेरों के मिठास की व जाटणी दादी के वात्सल्य भरे प्यार की |
ढाणी आज भी वहीँ स्थित है राहगीर आज भी उधर से गुजरतें है पर न तो उन राहगीरों को आज कोई बुलाकर कुशलक्षेम पूछकर पानी तक पिलाने वाला है ओर ना ही उधर से गुजरने वाले राहगीरों के पास समय है कि वे उस ढाणी की तरफ झांक कर भी देखें |

कभी उस ढाणी के चहुँ और उस बूढी जाटणी दादी का सभी के लिए समान वात्सल्य भरा प्रेम बिखरा पड़ा रहता था ओर आज उस ढाणी के चारों ओर दादी के पोते- पड़पोतों द्वारा देशी मदिरा पीने के बाद उनके फैंके हुए मदिरा के खाली प्लास्टिक के पाउच बिखरे पड़े रहतें है |

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