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Tuesday, January 25, 2022

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वो बूढी जाटणी दादी

चेहरे पर झुर्रियां ,थोड़ी झुकी हुई कमर और लाठी के सहारे चलती, लेकिन कड़क आवाज वाली उस बूढी जाटणी दादी की छवि आज वर्षों बाद भी जेहन में ज्यों कि त्यों बनी हुई है | गांव से बाहर लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित अपने खेत में बनी ढाणी के बाहर हाथ में लाठी लिए टहलती वह जाटणी दादी उधर से गुजरते हर राहगीर को आवाज लगाकर अपने पास बुलाती ,कुशल क्षेम पूछती व अनजान राहगीर से परिचय पूछती और फिर उसे ढाणी में चलकर खाना खाने के लिए कहती | शायद ही कोई राहगीर होगा जिसे बिना खिलाये पिलाये उस जाटणी दादी ने जाने दिया हो |
बूढी जाटणी दादीजाटणी दादी के खेतों व उसकी ढाणी के आसपास के खेतों में बैर की छोटी-छोटी झाड़ियाँ बहुतायत से थी साथ ही जाटणी दादी के खेत में बने कुँए से उन दिनों बैलों से पानी खिंच कर सिंचाई होती थी सो जाटणी दादी के बेटे अपने खेत में अन्य फसलों के साथ गाजर, मुली, पालक आदि भी उगाया करते थे अतः बचपन में बेर खाने के लिए खेतों में जाना हो या गाजर मूलियाँ लाने के लिए हमारा पसंदीदा खेत उस बूढी जाटणी दादी का ही हुआ करता था|
बेर तोड़कर खाते व इक्कठा करते बच्चो के झुण्ड पर वह जाटणी दादी दूर से ही पूरी निगाह रखती थी जैसे ही हम बेर इक्कठे कर जाने को होते थे जाटणी दादी का कड़क आवाज में वात्सल्य भरे बुलावे के साथ आदेश आ जाता था कि सभी खाना खाकर ही जायेंगे | ढाणी में पहुँचते ही सभी के लिए बाजरे की रोटी दही ,छाछ व प्याज के साथ तैयार मिलती थी , जिसे भूख हो या नहीं थोडा बहुत तो खाना जरुरी था किसी के मना करने या बहाना करने पर कि खाना घर जाकर खा लेंगे तभी नाराज होकर दादी की कड़क आवाज गूंजती “क्यों मेरे यहाँ के खाने में जहर मिला हुआ है क्या ? जो नहीं खायेगा , चल कुछ खा ले या फिर भूख नहीं भी है तो थोडा दही ही खाले |

आखिर उम्र बढ़ने के साथ ही जाटणी दादी को परलोक जाना ही था और वो चली गयी और उसके साथ ही सिमट गया वह वात्सल्य भरा आवभगत का प्रेम जो उसने अपनी ढाणी के चहुँ ओर राहगीरों के लिए बिखेर रखा था | जब तक वह जाटणी दादी जिन्दा रही उसकी ढाणी दूध ,दही व धन-धान्य से परिपूर्ण खुशहाल थी , उसके रहते कोई राहगीर कभी उसकी ढाणी के पास से भूखा प्यासा नहीं गया पर उसके जाते ही मानों उस ढाणी पर भी ग्रहण लग गया , ढाणी की खुशहाली उसके साथ ही जाती रही | उसके बेटे पोते कर्ज में डूब गए , खेतों में अनाज पैदा होना कम हो गया |

वात्सल्य और ममता की प्रतिमूर्ति जाटणी दादी को तो यमराज परलोक ले गए ओर बेरों की झाड़ियों को ट्रेक्टरों ने खोद खोदकर ख़त्म कर दिया , रह गयी तो सिर्फ याददाश्त उन बेरों के मिठास की व जाटणी दादी के वात्सल्य भरे प्यार की |
ढाणी आज भी वहीँ स्थित है राहगीर आज भी उधर से गुजरतें है पर न तो उन राहगीरों को आज कोई बुलाकर कुशलक्षेम पूछकर पानी तक पिलाने वाला है ओर ना ही उधर से गुजरने वाले राहगीरों के पास समय है कि वे उस ढाणी की तरफ झांक कर भी देखें |

कभी उस ढाणी के चहुँ और उस बूढी जाटणी दादी का सभी के लिए समान वात्सल्य भरा प्रेम बिखरा पड़ा रहता था ओर आज उस ढाणी के चारों ओर दादी के पोते- पड़पोतों द्वारा देशी मदिरा पीने के बाद उनके फैंके हुए मदिरा के खाली प्लास्टिक के पाउच बिखरे पड़े रहतें है |

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27 COMMENTS

  1. इब तो किसी ने फ़ुरसत कोनी
    अपणो ही पेट भर लेवे ओ ही घणो हे।

    प्रेरणादायक कहाणी बुढी जाट्णी दादा की
    राम राम सा

  2. पुराने लोगों की बात ही कुछ और होती थी .. नया युग बहुत स्‍वार्थी होता जा रहा है .. इसलिए लोगों को कष्‍ट भी झेलना पडता है !!

  3. वात्सल्यपूर्ण बूढी जाटनी दादी के बारे में जानना सुखद लगा परन्तु उनके बाद अब स्थिति का बदलाव दुखद है.
    दादी जैसे स्नेहमय व्यवहार ,राहगीरों को सहयोग,भूखों को खाना खिलाना… इन सब से ही बरकत होती है यह शाश्वत सत्य है.

  4. इसे कहते हैं शीर्षक। बूढी जाटणी।
    अगर शीर्षक कुछ और होता तो शायद मैं इधर ना भी आता।
    चलो खैर, कम से कम पन्द्रह साल पहले हमारे घर के पास आडू का बाग था। उस पर जब आडू आते तो एक मुसलमान बाब्बा उसकी रखवाली करता था। आडू इसी मौसम में पकने शुरू हो जाते हैं। हम रोज जाया करते थे आडू लेने। बाब्बा हमारी बनियान निकालकर उसी में आडू भर देता था। जब बरसात होती तो बाग का रास्ता भी हम चार-पांच साल के बच्चों के लिये दुर्गम हो जाता। कीचड और कन्धे तक घास। ऐसे में वो बाब्बा शाम को बाल्टी भरकर आडू हमारे घर पर पहुंचा देता था, जहां से पूरे आसपास के बच्चों को सप्लाई होती थी।
    समय बदला।
    आज आडू के पेड खत्म। बाब्बा अभी जिन्दा है, लेकिन खाट पर पडा रहता है। याद आते हैं वे दिन।

  5. राजस्थान के आतिथ्य सत्कार का परंपरा दर्शन "वो बूढी जाटणी दादी"
    शीर्षक भी "जाटण डोकरी" बढ़िया जचता।
    ऐसे हेत और नेह से भरे लोग बस कहानियाँ भर है।
    शबरी तो केवल राम के लिए शबरी थी,जाटण तो जगत शबरी हुई।
    रतनसिंह जी,वात्सल्य का यह संस्मरण स्तुत्य है। धन्यवाद!

  6. राहगीर आज भी उधर से गुजरतें है पर न तो उन राहगीरों को आज कोई बुलाकर कुशलक्षेम पूछकर पानी तक पिलाने वाला है ओर ना ही उधर से गुजरने वाले राहगीरों के पास समय है कि वे उस ढाणी की तरफ झांक कर भी देखें |

    संस्मरण यहां मार्मिक मोड़ लेता है ।
    सच है… बखत बह जावै , बात रह जावै
    अच्छा है जी !
    – राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

  7. महान आत्मा थीं वे जो आपको आज भी याद हैं , उनकी ढाणी का फोटो और लगा देते तो आनंद आ जाता …आपका वर्णन सुन्दर ओर नेह माय है ! हार्दिक शुभकामनायें !

  8. पुराने समय में कुछ ऐसे वात्सल्यपूर्ण व्यक्तित्व होते थे, अब तो दुनिया बदल गयी है।

  9. अब वो प्यार व रिश्तों में मिठास कहाँ?अब तो हर जगह स्वार्थ व जातिवाद हावी हो गया…..

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