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हठीलो राजस्थान-39, वीर रस के सौरठे

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veer ras ke rajasthani dohe

गरम धरा, गरमी गजब, गरम पवन परकास |
सूरां तणों सभाव ओ, इला तणों उछवास ||२३२||

यहाँ (राजस्थान)की धरती गर्म है, यहाँ गजब ढाने वाली गर्मी पड़ती है | हवाएं भी गर्म चलती है | उपरोक्त गर्मी यहाँ बसने वाले शूरवीरों के उग्र स्वभाव का प्रभाव है अथवा यहाँ की धरती द्वारा छोड़ी गए उच्छवासों के कारण है |

बादल डरपै बरसतां, बीजल डरै खिवंत |
रगतां प्यासी आ धरा, पांणी कम पिवन्त ||२३३||

बादल यहाँ पर जल बरसाते हुए डरता है तथा बिजली यहाँ चमकते हुए भय खाती है ,क्योंकि उसे संकोच है कि यहाँ धरती जिसकी प्यास शूरवीरों ने अपने रक्त से बुझाई है वह जल कैसे पीयेगी |

खग झल डरती नीसरी, रूप बदल जल धार |
नरां, तुरंगा , नारियां, निपजै पाणी दार ||२३४||

उपरोक्त दोहे के सन्दर्भ में कहा गया है कि यहाँ शूरवीरों की तलवार की चमक से डरते हुए यहाँ पर वर्षा नहीं होती लेकिन जल इस प्रदेश को छोड़ना भी नहीं चाहता, अत: वह पराक्रम का रूप धारण करके यहाँ के मनुष्यों, नारियों व घोड़ो में निवास करता है |

जल धर रूठा नित रहै. धर-जल उण्डी धार |
नारी न्हावै अगन में, नर न्हावै खगधार ||२३५||

बादल यहाँ सदैव रूठे रहते है और धरती में जल भी बहुत गहरा है | फलत: यहाँ की नारियां तो अग्नि में स्नान (जौहर)करती है और पुरुष खड्ग धार में (शाका करके)|

अंतर सुलगै आग सूं, अजै न पूरी आस |
अधूरा अरमान री, लूवाँ नित उछवास ||२३६||

यहाँ के लोगों के हृदय में जब तक उद्देश्य की सिद्धि नहीं हो जाती पीड़ा की आग सुलगती रहती है | जब तक अरमान पूरे नहीं हो होते उच्छ्वास उठते रहते है जिसके परिणाम स्वरूप ही इस धरती पर हवा गर्म होकर बहती है |

आज अमुजो आकरो, नंगो बदन बणाय |
लुवां रुखाली लाजरी, फिर गाबा पहराय ||२३७||

आज दम घोटू गर्मी के कारण सबने शरीर के कपडे उतार दी व इस निर्लज्जता को देखकर लज्जा की रक्षा हेतु गर्म हवाएं बहने लगी जिसके परिणाम स्वरूप लोगों को स्वत: ही पुन: वस्त्र पहनने पड़े |

स्व.आयुवानसिंह शेखावत द्वारा लिखित

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