हठीलो राजस्थान-35 वीर रस के राजस्थानी दोहे

अमलां हेलो आवियौ, कांधे बाल लियांह |
केरो केरो झाँकतो, ढ़ेरी हाथ लियांह ||२०८||

जब अमल लेने के लिए आवाज हुई तो अमलदार (अफीमची) जिसके कन्धों तक बाल थे,अमल की ढ़ेरी हाथ में लिए टेढ़ा-टेढ़ा देखता हुआ पहुंचा |

लालां सेडो झर झरै, अखियाँ गीड अमाप |
जीतोड़ा भोगै नरक, अमली माणस आप ||२०९||

जिसके मुंह से लार टपकती रहती है,नाक से सेडा(गन्दा पानी) बहता रहता है और आँखों में अपार गीड भरे रहते है | एसा अमल का नशा करने वाला मनुष्य इस संसार में जिन्दा रहकर नरक ही भोग रहा है |

मीठा माथै मन रमै, बेगो बावड़ीयोह |
बंदाणी जूवां चुगै, तपतां ताबड़ीयोह ||२१०||

प्रतिदिन अमल खाने वाला (बंदाणी) धूप में बैठा अपने कपड़ों से जुएँ निकाल रहा है | नशा करने का समय नजदीक आता जा था व पास में अफीम नहीं था | इसलिए किसी को अमल लाने के लिए भेजता है व निर्देश देता है कि मुंह में मिठास आने लगा है (अर्थात नशा पूरी तरह उतरने वाला है)अत: तू अफीम लेकर के जल्दी आना |

कर लटकायाँ उरणियो, कांधे दीवड डाल |
दलपत आगै हालियो, एवड रो एवाल ||१२१||

हाथ में उरणिया (भेड़ का बच्चा) लटकाए हुए और काँधे पर दीवडी (चर्म से बना जल पात्र) डाले हुए रेवड़ के आगे-आगे गडरिया चल रहा है |

गल टोकर टण टण बजै, सांपै रांभ सजीव |
अलगोजां री तान बिच, उछरी छांग अजीब ||२१२||

पशुओं के गले में टोकरे टण-टण करते हुए बज रहे है | पशुओं के रंभाने की आवाजें गूंज रही है | अलगोजों की तान के बीच पशुओं का समूह अजीब चाल से चला आ रहा है |

बाजै घंटी देहरां, गल ढ़ोरां गरलाय |
भव-सागर तैरावणी, बेतरणी तैराय ||२१३||

मंदिरों में बजने वाली घंटी की आवाज जिस प्रकार वैतरणी नदी को पार करा देती है उसी प्रकार पशुओं के गले से बंधी घंटी की आवाज संसार-सागर से पार उतार देती है |(पशुपालन से अर्थ व्यवस्था व भगवान् के भजन से परलोक गमन की बाधाएं दूर होती है )

स्व.आयुवानसिंह शेखावत

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