वीर बड़ा या जागीर , अक्ल बड़ी या धन

पिछले दिनों ताऊ.इन पर ” अक्ल बड़ी या भेंस “शीर्षक से एक मजेदार रचना पढने को मिली जिसमे ताऊ ने साबित किया कि अक्ल ही हमेशा बड़ी होती है हालाँकि ताऊ की भेंस के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता पता नहीं ताऊ कब भेंस को अक्ल से बड़ी करदे |
अक्ल बड़ी के सन्दर्भ में प्रस्तुत है एक एतिहासिक घटना जिसमे भी एक ताऊ ने अपनी अक्ल के बूते एक गांव के छोटे से जागीरदार को एक राज्य का राजा बनवा दिया | हालाँकि राजा बनने वाले की वीरता भी उसके काम आई लेकिन बिना उस ताऊ की अक्ल के अकेली वीरता भी कुछ नहीं कर पाती |

बात अकबर कालीन है| शेखावाटी की राजधानी अमरसर के शासक राव लुनकरण जी अपने कुछ सहयोगियों के साथ चर्चा कर रहे थे कि अक्ल बड़ी या धन और वीर बड़ा या जागीर (राज्य)| राव लुनकरण जी अक्ल से बड़ा धन को मान रहे थे कि व्यक्ति के पास धन हो तो अक्ल तो अपने आप आ जाती है बिना धन अकेली अक्ल क्या कर सकती है और जागीर (राज्य) है तो वीर तो चाहे जितने नौकरी पर रखलो | वहां उनके सहयोगियों में कई ताऊ उनकी हाँ में हाँ मिला रहे थे लेकिन उनका दीवान देविदास राव लुनकरण जी के विचारों से सहमत नहीं था उसका कहना था कि बुद्धिमान व्यक्ति चाहे जितना धन कमा सकता है लेकिन एक धनी बुद्धिहीन व्यक्ति धन को संभाल नहीं सकता व एक वीर पुरुष अपनी वीरता व पुरुषार्थ के बल पर कितना भी बड़ा राज्य खडा कर सकता है जबकि एक कायर राजा अपना राज्य कभी भी किसी वीर पुरुष के आगे खो सकता है |

दीवान देवीदास की बात राव लुनकरण जी को अच्छी नहीं लगी और उन्होंने नाराज होते हुए दीवान देवीदास से कहा- मेरे पास राज्य है धन है लेकिन मेरा छोटा भाई रायसल बहुत बड़ा वीर योद्धा है उसके पास न जागीर है न धन अतः तू उसके पास चला जा और वही अपनी अक्ल दिखाना |

दीवान देवीदास भी किसी महताऊ से कम नहीं था उसे यह बात दिल तक चुभ गयी और वह वहां से चुपचाप रायसल के पास आ गया | देवीदास ने रायसल को समझाया कि आप बहुत अच्छे योद्धा है आपको यहाँ न रहकर सम्राट अकबर के पास चले जाना चाहिए सम्राट अकबर वीर पुरुषों की बहुत कद्र करता है | देवीदास की बात रायसल जी को भी जच गयी और वे अपने कुछ योद्धा साथियों के साथ देवीदास के संग अकबर से मिलने आगरा के लिए रवाना हो लिए | रास्ते में ही शाही सेना शहजादा सलीम के नेत्रित्व में कहीं युद्ध अभियान पर जाती उन्हें मिल गयी | देवीदास की सलाह पर रायसल अपने साथियों सहित शाही सेना सम्मिलित हो गए | देवीदास ने रायसल को समझा दिया था कि युद्ध के दौरान आप शहजादा सलीम के आस पास रहना आपको अपनी वीरता सलीम को दिखाकर उसे ही आकर्षित करना है | युद्ध के दौरान एक समय एसा आया कि शहजादा दुश्मन से घिर गया और घबराहट के मारे हाथी पर बैठे होने के बजाय हथियार तक नहीं चला सका | इसी मौके पर रायसल ने दुश्मन के घेरे में अपना घोड़ा कूदा सलीम को लताड़ा कि ऐ तुर्क हाथी पर बैठे होने के बावजूद तू हथियार नहीं चला पा रहा है और देखते ही देखते रायसल ने अपनी तलवार का जौहर दिखा शहजादा सलीम कि जान बचा वह युद्ध जीत लिया |

जब शहजादा ने अकबर को इस युद्ध में एक अनजान राजपूत सरदार की वीरता के बारे सुना इस युद्ध की जीत का श्रेय उस अनजान सरदार को दिया | तब अकबर ने उस वीर की तलाश की तब वहां कई ताऊ टायप सरदार श्रेय लेने आगे आगे कि हम थे हम थे | ऐसी दशा में अकबर ने सभी राजपूत सरदारों को युद्ध पौशाक में अपने व शहजादे के सामने से बारी-बारी गुजरने को कहा | बस ताऊ देवीदास तो इसी मौके के इंतजार में था उसने रायसल को उस परेड में शामिल कर दिया , रायसल के सामने आते ही शहजादा सलीम ने उन्हें पहचान लिया कि यही वह अनजान राजपूत सरदार है जिसकी वीरता व अदम्य साहस की वजह में आज जिन्दा हूँ और यह युद्ध हम जीत पाए |

बस फिर क्या था अकबर ने तुंरत रायसल को मनसब आदि देकर सम्मानित किया और अपनी सेना में महत्वपूर्ण पद दिया | आगे चलकर वही रायसल अकबर के खास चहेतों में शामिल हुए और खंडेला के राजा बने | उनके बड़े भाई लुनकरण जी को राव की उपाधि थी लेकिन रायसल को सम्राट अकबर ने राजा की उपाधि से विभूषित किया | इतिहास में रायसल “राजा रायसल दरबारी” के नाम से प्रसिद्ध हुए |
इस तरह उस ज़माने में भी उस ताऊ देवीदास ने साबित कर दिखाया कि धन से बड़ी अक्ल ही होती है और वीर पुरुष कितना भी बड़ा राज्य बना सकते है उसने अपनी बुद्धि बल से ही समय समय पर रायसल को सलाह दे उस मुकाम पर पहुंचा दिया |

10 Responses to "वीर बड़ा या जागीर , अक्ल बड़ी या धन"

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.