विलुप्त प्राय: ग्रामीण खेल : झुरनी डंडा

आज से कोई तीन दशक पहले तक गांवों में तरह -तरह के खेल खेले जाते थे | कब्बड्डी,खो खो,फूटबाल,बोलीबोल आदि के साथ रात के अँधेरे में छुपा छुपी तो दिन में गुल्ली डंडा,गुच्या दडी,सोटा दडी,कांच की गोलियों के कंचे तो दोपहर में किसी पेड़ के ऊपर झुरनी डंडा खेल खेला जाता था | गर्मियों में दोपहर में गांव के बच्चे अलग-अलग समूह बनाकर अलग -अलग पेड़ों पर यह झुरनी डंडा नाम का खेल खेला करते थे | पेड़ पर खेले जाने वाले खेल में पेड़ पर तेजी से चढ़ना और डालों पर दौड़ना और जरुरत पड़े तो पेड़ से कूदना भी इन खेलों में शामिल रहता था इस तरह के खेल बच्चों में चुस्ती फुर्ती लाकर शारीरक क्षमता बढ़ाने में बहुत उपयोगी रहते थे | लेकिन जब से गांवों में क्रिकेट व टेलीविजन का पर्दापण हुआ है ये ग्रामीण खेल लगभग लुप्तप्राय: ही हो गए है | और हमारी वर्तमान पीढ़ी इन खेलो के बारे में अनजान है हो सकता है आने वाले दिनों में बच्चे इन खेलों का नाम भी भूल जाये |
आईये इन्ही ग्रामीण खेलों में कभी लोकप्रिय रहे बच्चो द्वारा खेले जाने वाले एक खेल झुरनी डंडा के बारे में चर्चा करते है –

इस खेल में संख्या की कोई बंदिश नहीं होती है जितने खिलाडी उपलब्ध हो सभी इस खेल में हिस्सा ले सकते है | इस खेल में एक खिलाडी बाहर होता है जिसे बाकि पेड़ पर चढ़े खिलाडियों के पीछे भागकर उन्हें पकड़ना होता है जो सबसे पहले पकड़ में आता है अगली पारी के लिए वह बाहर होता है |
इस खेल को शुरू करते समय एक खिलाडी अपने पैर के नीचे से एक डंडा फैंकता है और दौड़कर पेड़ पर चढ़ जाता है और जो खिलाडी बाहर है उसे दौड़कर पहले डंडा लाकर पेड़ के नीचे एक जगह गाड़ना पड़ता है उसके ऐसा करने तक अन्य सभी खिलाडी पेड़ पर चढ़ जाते है | बाहर वाला खिलाडी डंडा लाकर पेड़ नीचे एक जगह गाड़ कर पेड़ पर चढ़कर पेड़ पर चढ़े खिलाडियों के पीछे दौड़कर उन्हें पकड़ने की कोशिश करता है और पेड़ पर चढ़े खिलाडी उससे बचने के लिए एक डाल से दुसरे डाल पर बंदरों की तरह भागते है जब कोई दूसरी डाल पर जाने का मौका नहीं मिलता तो वहीँ से नीचे कूद जाते है या ज्यादा ऊंचाई होने पर पेड़ की टहनियों को पकड़ कर फिसलते हुए नीचे आ जाते है व भागकर उस डंडे को पैर के नीचे से निकालकर कान पर छुआ लेते है लेकिन यह प्रक्रिया उसके पीछे भागते हुए बाहर वाले खिलाडी के छूने से पहले होनी चाहिए होती है | पेड़ पर चढ़े सभी खिलाडी यही प्रतिक्रिया दोहराते है और बाहर रहा खिलाडी उन्हें पकड़ने की कोशिश करता रहता है जो खिलाडी उसके सबसे पहले पकड़ में आ गया अगली पारी में वह बाहर रहकर अन्य खिलाडियों को पकड़ने के लिए पीछे भागेगा | पर हर बाहर वाले खिलाडी को पेड़ पर चढ़े हर एक खिलाडी को पेड़ से नीचे उतारना जरुरी होता है |
पेड़ की डाली पकड़कर नीचे की और फिसलने को हमारी स्थानीय भाषा में झुरना कहते है इसलिए इस खेल को हमारे यहाँ झुरनी डंडा कहा जाता है हो सकता है अलग-अलग जगह इस खेल को किसी अन्य नामों से जाना जाता हो |

गांव के बाहर एक पीपल का बड़ा पेड़ था जो बचपन में गर्मियों में गर्मी से बचने व दोपहर में झुरनी डंडा खेलने का हमारा मनपसन्द स्थल हुआ करता था अपने समूह के सभी बच्चे दोपहर में अपनी अपनी जेब में कांदा (प्याज) ,गुड़ ,भूंगडे व धाणी लेकर उस पीपल के पेड़ पर चढ़कर जमा हो जाते थे और फिर पूरी दोपहरी वहीँ झुरनी डंडा खेलना व धमा-चौकड़ी करते रहते थे | आज न तो वहां वो पीपल का पेड़ रहा और ना ही वैसी धमा-चौकड़ी करने वाले बच्चे | जब कभी उधर से गुरना होता है पीपल के पेड़ की वह खाली जगह देख बचपन की वे यादें चलचित्र की भांति मन मस्तिष्क में छा जाती है |

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ताऊ डाट इन: ताऊ पहेली – 84 (बेलूर मठ, प. बंगाल])

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