वर्ण-व्यवस्था कि उत्पत्ति और पतन

कुँवरानी निशा कँवर नरुका
जैसा कि आदरणीय श्री देवी सिंह जी महार साहब ने “हमारी भूलें” के जरिये यह समझाने का सफल प्रयत्न किया है कि सभी धर्म शास्त्र जोकि वर्तमान में प्रचलित है| यह मूल ,संस्करण नहीं है | मूल संस्करणों को जानबूझकर बुद्धिजीवीयों(जो केवल बुद्धि को व्यवसाय बना बैठा हो ) ने ओझल कर दिया था क्योंकि उनमे ब्राह्मणों को कोई स्थान नहीं दिया गया था |इसी धारा को आगे बढ़ाते हुए श्री क्षत्रिय युवक संघ के साधक इस नतीजे पर पहुंचे है कि विश्व की अति प्राचीन-काल से दो ही विचार धाराए थी एक “जगत झूंठा है केवल ब्रह्म (अकाल,अविनाशी ,परब्रह्म,ईश्वर ) ही सत्य है |” इस विचार धारा को मानने वाले ब्रह्मण कहलाये किन्तु यह केवल सत्व गुण की अधिकता के कारण क्रिया शील और व्यवहारिक नहीं थी इसलिए इस सृष्टि-चक्र का पतन निश्चित था, और इसलिए जो दूसरी विचार-धारा कि “ब्रह्म सत्य है इसमें कोई संदेह नहीं किन्तु यह जगत भी झूंठा नहीं है | मेरी माता जिसने मुझे ९ माह गर्भ में रखा,पिता जिसने मुझे पैदा किया और ऐसे ही अनेको का मै ऋणी हूँ और इनके प्रति मेरा कर्तव्य है |” चूँकि सत्व के साथ ही रजो गुण भी सम्मिलित था अतः यह क्रियात्मक और व्यावहारिक होने के कारण सृष्टि-चक्र के पतन यानि विनाश यानि “क्षय” से बचाने यानि “त्राण” कराने में सफल रही |
इसलिए इस मान्यता और विचार-धारा को मानने वाले “क्षत्रिय “कहलाये | जिनके यह दोनों विचार धारा नहीं समझ बैठी और केवल अपनी छुदा यानि भूंक यानि पेट कि आग को बुझाने तक सिमित सोच के रहे वे चूँकि केवल धंधा यानि वृति करने वाले रहे तो उनके लिए वृति करने वाले के लिए एक शब्द “वैश्य” मिला |वैश्या संस्कृत का शब्द है जिसके अर्थ होता है “वैश्य की स्त्रीलिंग जैसे क्षत्रिय का क्षत्राणी और शूद्र का shudraa , किन्तु वैश्य का अर्थ वृति यानि धंधा वाला .वैसे ही वैश्या का अर्थ वृति यानि धंधे वाली |जब इन शब्दों की उत्पत्ति हुयी थी उस समय वैश्यावृति जैसे कोढ़ समाज में पैदा ही नहीं हुए थे | इसके बाद जिनका मन और चित्त बिलकुल शांत जो नितांत भोले और अबोध लोग थे जिनकी अपनी कोई भ्रान्तिया और महत्वाकांक्षा नहीं थी ,जो शीघ्र ही किसी से भी(घटना या व्यक्ति से ) प्रभावित.यानि पिघल जाये यानि द्रवित होजाये वे “आशुद्रव(शीघ्र द्रवित) ” यानि “शूद्र” कहलाये |
अब चूँकि ब्रह्म सत्य है जगत झूठा है इस विचार को केवल मुख और जिव्या और ज्यादा से ज्यादा बुद्धि की सहायता से प्रकट किया गया इसलिए इस विचार-धारा (ब्रह्मंत्त्व) का उत्पत्ति स्थल मुख है |जगत झूंठा नहीं होसकता और मेरा कर्तव्य है सृष्टि-चक्र के क्षय को रोकने के प्रति इस विचार धारा की उत्पत्ति केवल ह्रदय के मनो भावो में आत्मा की आवाज पर होती है इसलिए इस विचारधारा(क्षत्रित्त्व) की उत्पत्ति हृदय से हुयी है | शारीर को यदि समाज माने तो उसके विनाश को बचाने का नियंत्रण भी ह्रदय में स्थित प्राण ही है ,प्राण के शारीर से निकल जाने के बाद शारीर का अंत होजाता है ऐसे ही क्षत्रित्त्व के समाप्त होजाने के बाद समाज की भी वही दशा होजाती है जो आज है | छुदा यानि भूंक यानि शरीर में प्राण और बुद्धि टिके रहे के विचार पेट से ही उत्पन्न होते है इसलिए वैश्यों की उत्पत्ति पेट से हुयी है |
अब चूँकि शूद्र दरअसल आशुद्रव (शीघ्र पिघलने यानि प्रभावित होने वाला) है इसलिए जहाँ शारीर को लेजाने की आवश्यकता भूंक, रक्षण (प्राण) और बुद्धि को हो वह चल देता है |इसलिए शुद्रत्त्व यानि परिचर्या यानि परिपालन की उत्पत्ति चरणों से हुयी है |इसमें कोई भी किसी से भी ऊँचा या नीचा नहीं होसकता |सभी का अपना महत्व था | किन्तु रक्षण और न्याय की भावना क्षत्रित्त्व के आवश्यक अंग थे इसीलिए वैश्य और शूद्रों ने मिलकर अपने अधिकारों स्वेच्छिक समर्पण क्षत्रियों को कर दिया परिणाम हुआ क्षत्रिय को लोगो के रंजन यानि उज्ज्वन यानि निरन्तर विकास के लिए नियुक्त कर दिया गया |यानि क्षत्रिय को राजा(रंजन करने वाला) बना दिया गया |
इस प्रकार लोगों ने क्षत्रियों में जो सर्वश्रेष्ट था उसे राजा बना दिया बाकि क्षत्रिय सैनिक और व्यवस्था को बनाये रखने में कार्य करने लगे |अब ब्राह्मणों का ध्यान इस और गया कि राजा से श्रेष्ट तो कोई होता ही नहीं है तब उन ब्राह्मणों ने जिनसे ब्रह्माण-धर्म कि सात्विक प्रवृति(ब्रह्म-तत्त्व) का उपार्जन नहीं किया जारहा था | उन्होंने भारी तपस्याओं से केवल तामसिक शक्ति अर्जित कर क्षत्रियों के ऊपर बार बार आक्रमण किये और हर बार परास्त होने के बाद भी कहीं कहीं दैत्य राज्य स्थापित कर लिया करते थे| दैत्य (यानि दिति के वंशज) आसुरी ,तामसिक शक्ति वाले ब्रह्मण ही थे, हरिन्यकश्यप ,रावण,परशुराम आदि बहुत से ब्राह्मणों ने कोशिश की किन्तु महाभारत तक इनको कहीं भी सफलता नहीं मिली |किन्तु महाभारत के युद्ध में अधिकांश(लगभग सभी) क्षत्रिय ज्ञानवान,रथी और महारथियों के रुपमे और अधिकांश शूद्र ज्ञानवान लोग सारथियों के रुपमे मारे गए |और उसके बाद महाराज परीक्षित को तक्षक नाग द्वारा मृत्यु को प्राप्त हुए तो उनके पुत्र महाराज जन्मेजय ने लगभग सारी पृथ्वी नाग-सभयता विहीन करदी |और फिर युद्ध जारी रहे |और क्षत्रियों सहित पूरी प्रजा अशिक्षित (संस्कृत-ज्ञान विहीन) होगई |जब राजा ही शिक्षा की ओरसे विमुख हो गया, तो प्रजा का वही हाल होना था जो हुआ है |
ऐसे समय में श्रुति जिन्हें केवल सुनाया ही जाता था जैसे वेद और उपनिषदों तथा इतिहास, जय ग्रन्थ(महाभरत) और पौलस्त्य -वध (रामायण) के मूल तत्त्व को समाज से ओझल किया गया था क्योंकि उनमे तामसिक और आसुरी ब्राह्मणों के काले कारनामे परिलक्षित होते थे |और उनके स्थान पर वर्तमान झूंठ ,विज्ञानं और प्रकृति के सिद्दांतों के विपरीत ,पाप-पुण्य कि अवधारणा के पाखंडो से परिपूर्ण उन्ही वेद,उपनिषद ,मनुस्मिरिती ,रामायण और महाभारत के नाम से प्रचलित कर दिए गए |जिनमे से उदहारण दे देकर हम सभी तर्क-वितर्क किया करते है जबकि इनका मौलिक ग्रंथो से बहुत कम ही समीपता है |यह सारा षड़यंत्र पूर्ण कार्य बुद्धिजीवी पंडा-वादियों ने क्षत्रियों से ईर्ष्या-वश शासन और समाज में अपने को असत्य से परिपूर्ण धर्म ग्रंथों और आडम्बर के सहारे स्थापित करने के लिए किया था |वरन तो जो श्री राम और उनके गुरु महर्षि विश्वामित्र ने जीवन भर केवल आतातायी ब्राह्मणों के विरुद्ध युद्ध किया वे कैसे कह सकते है कि “परशुरामजी आपको मरूँगा तो पाप लगेगा” जबकि इससे पहले वे मरीचि ,सुबाहु और ताड़का जैसे ब्राह्मणों का वध कर चुके थे |
बुद्धिजीवी पन्डावादियों की इन काली करतूतों का भंड़ा-फोड़ सर्वप्रथम क्षत्रिय राजकुमारों (गौतम बुद्ध और वर्धमान ) ने भरी तपस्या कर सत्य को जानकर किया था |किन्तु उनके अनुयायियों ने में जो पाखंड घुसा तो कालांतर में वे भी इसी ब्रह्मण-वाद के चंगुल में जकड गए |
अधिकांश निम्न जातियों में राजपूतों के गोत्र क्यों मिलते है,और उनका क्षत्रिय समाज से क्या सम्बन्ध है ?? इसका विवरण अगले अंक में दिया जायेगा |

“जय क्षात्र-धर्म”
कुँवरानी निशा कँवर नरुका
श्री क्षत्रिय वीर ज्योति

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