लोहागढ़ महाराजा सूरजमल के शौर्य का प्रतीक

लोहागढ़ महाराजा सूरजमल के शौर्य का प्रतीक

भरतपुर का लोहागढ़ दुर्ग जाट राजाओं की शौर्यगाथाओं का एक ऐसा किला है, जिसने मुगलों से लोहा लिया | अंग्रेजों ने इस किले पर कई बार आक्रमण किये पर जीत नहीं पाए| अंग्रेज सेनापति सर चार्ल्स मेटकाफ ने गवर्नर जनरल को लिखा था, “ब्रितानी फौजों की प्रतिष्ठा भरतपुर के दुर्भाग्यपूर्ण घेरे में दब गई| शायद इसी कारण इस दुर्ग को लौहागढ़ की संज्ञा दी गई| इस किले का इतिहास ईसा पूर्व का है पर फ़िलहाल 250 वर्ष पूर्व तक का इतिहास ही उपलब्ध है| शिल्पशास्त्र की कसौटी पर भू-दुर्ग की श्रेणी वाला यह दुर्ग असाधारण किला है| तराशे पत्थरों से स्थापत्य कला की नायाब निशानी वाला यह किला मथुरा से मात्र 30 किलोमीटर दूर है|

मौजूदा लोहागढ़ का निर्माण महाराजा सूरजमल ने कराया था| जो आयातकर आकृति में 6.4 किलोमीटर क्षेत्र की परिधि बना है| वर्तमान किला बनने से पूर्व यहाँ रुस्तम जाट के पुत्र खेमकरण की एक कच्ची गढ़ी थी, जिसे आज भी लोग चौबुर्ज्या के नाम से जानते हैं| लोहागढ़ की दो विशाल प्राचीरें – पहली मिट्टी और दूसरी ईंट-पत्थरों से बनी है| लड़ाई के समय पक्की दीवारों के तोपखानों की मार से ढहने का खतरा था, जबकि मिट्टी की प्राचीर 8.29 मीटर ऊँची, 9.14 मीटर चौड़ी है| धरातल पर चौड़ाई 61 मीटर है| इस प्राचीर पर कभी ब्रितानी तोपों के गोले भुस्स हो जाते थे| यही कारण था कि अंग्रेजी फौजों के तोपखाने का लोहागढ़ पर कोई असर नहीं हुआ|

प्राचीर में अर्ध-गोलाकार बुर्ज है और अन्दर पक्का बुर्ज है| इनमें नौ प्रमुख बुर्जें, यथा- जवाहर, फ़तेह, लालबाला, गोकुल, सिनसिना, बागड़ीबाला, नवल, मौसा बुर्ज व कालिका बुर्ज है| इनमें जवाहर बुर्ज प्रमुख है जिसे महाराजा जवाहरसिंह ने दिल्ली विजय के उपलक्ष्य में बनवाया था| फ़तेह बुर्ज अंग्रेजी सेना की पराजय के प्रतीक के तौर पर 1806 में बनवाई गई थी| सुजानगंगा की खुदाई से निकले मलबे से परकोटा बनाया गया| इसी परकोटे में दरवाजे बनाये गये जो मथुरापोल, वीरनारायणपोल, अटलबंधपोल, गोवर्धनपोल, जधीनापोल और सूरजपोल प्रसिद्ध है| इन दरवाजों के किंवाड़ अष्टधातु के बने हैं, जिनकी उंचाई, मोटी सांकलें, कुंदे व कंगूरों की बनावट दर्शनीय है| मुख्य किले की दीवारों का मोहरा (सामने वाला भाग) ईंट, पत्थरों व चुने का बना था, बाकी हिस्सा केवल मिट्टी का था, जिस पर तोपखाने की गोलीबारी का कोई असर नहीं होता था|

किले की सभी बुर्जों पर तोपें लगी होती थी| जवाहर बुर्ज किले के उत्तरी-पश्चिमी कोने पर है जिसका कई कारणों से महत्त्व है| मिट्टी से बनी इस बुर्ज की उंचाई 60.98मीटर है| यही भरतपुर राज्य का पचरंगा ध्वज फहरता है| किले में विभिन्न राजाओं द्वारा बनवाये गए कई महल देखने लायक है जिनमें कोठी खास, महल खास, रानी किशोरी और रानी लक्ष्मी के महल प्रमुख है| महलों के अलावा गंगा मंदिर, राजेश्वरी देवी, लक्ष्मण मंदिर, बिहारी जी का मंदिर, तथा जमा मस्जिद का शिल्प देखने लायक है| किले में विभिन्न जगह की गई चित्रकारी भी दर्शनीय है|

लोहगढ़ को दिसम्बर 1825 में लार्ड कंबलेर के नेतृत्व में 27000 सैनिकों वाली अंग्रेजी फ़ौज ने घेर लिया था| किले की दीवारों पर 64446 गोले बरसाये गए पर मिट्टी से बने परकोटे में ये गोले बेकार सिद्ध हुए| अंतत: 18 जनवरी 1826 को किले की प्राचीर के उत्तरी भाग में दस हजार पौंड विस्फोटक सामग्री रखवाकर विस्फोट कराया गया| यह विस्फोट इतना भयंकर था कि इसकी आवाज आगरा तक सुनी गई थी| इस तरह इस दुर्ग पर अंग्रेजों का कब्ज़ा हो गया और राजस्थान में अंग्रेजी हकुमत की नींव पड़ गई क्योंकि लोहगढ़ हारने के बाद राजस्थान के शासकों के हौसले पस्त हो गए और किसी की अंग्रेजों की खिलाफत करने की हिम्मत ही नहीं पड़ी|

सन्दर्भ : “भारत के दुर्ग” ; लेखक : दीनानाथ दुबे |

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