प्राचीन इतिहास और संस्कृति की विरासत रोहतासगढ़ दुर्ग

प्राचीन इतिहास और संस्कृति की विरासत रोहतासगढ़ दुर्ग

रोहतासगढ़ दुर्ग : राष्ट्र के प्राण उसकी संस्कृति और इतिहास में बसते हैं। संस्कृति और इतिहास के नष्ट होने से राष्ट्र भी निर्जीव और ऊर्जाहीन हो जाता है। प्राचीन दुर्ग इतिहास और संस्कृति की इसी विरासत को सहेज कर रखते हैं। राजवंशों और जन-सामान्य को समृद्धि और पतन के दौर दिखाने वाली नियति की पदचाप इन किलों में आज भी सुनी जा सकती है। इन दुर्गों ने इतिहास की धड़कनों को संजोए रखा है। रोहतासगढ़ दुर्ग ने भी चिरकाल से ऐसी ही इतिहास धड़कने आने वाली पीढ़ी के लिए संजो रखी है।
रोहतासगढ़कैमूर पहाड़ी श्रंखला में खोहों से कटे पठार पर विशाल आकार लिए रोहतासगढ़ का नाम आते ही इतिहास की अनेक स्मृतियाँ मस्तिष्क में उभर आती है। रोहतासगढ़ बिहार के सासाराम जिला मुख्यालय से लगभग 80 किलोमीटर दूर सोन नदी के किनारे ऊँचे पहाड़ पर बना है। बड़ी विषम बनावट से बने इस दुर्ग के बारे में दीनानाथ दुबे अपनी पुस्तक भारत के दुर्ग में इस दुर्ग का पूरा घेरा 40 किलोमीटर के लगभग बताते हैं। रोहतासगढ़ किसने बनाया इसके बारे में कोई स्पष्ट शिलालेख आदि प्रमाण नहीं है। पर विभिन्न इतिहास पुस्तकों में वर्णित जानकारी व जन-श्रुतियों के आधार पर इसका निर्माण राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहिताश्व द्वारा कराया माना जाता है। किले की ओर जाते समय तलहटी में रोहितासन नाम का एक मंदिर है। कभी दुर्ग में प्रवेश के लिए 20 रास्ते और चार मुख्य प्रवेश द्वार, उत्तर में घोड़ा घाट, दक्षिण में राज घाट, पूर्व में भेड़ा घाट और पश्चिम में कठौतिया घाट थे। प्रवेश द्वार पर निर्मित हाथी, प्रहरियों के कक्ष, दरवाजों के बुर्ज, दीवारों पर पेंटिंग अद्भुत है। रंगमहल, शीश महल, पंचमहल, खूंटा महल, आइना महल, रानी का झरोखा, मानसिंह की कचहरी आज भी मौजूद हैं। परिसर में अनेक इमारतें हैं, जिनकी भव्यता देखी जा सकती है। किले में ऐसे कई स्थान हैं जो पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, जैसे कि- गणेश मंदिर, हाथी दरवाजा, हैंगिंग हाउस, हाथिया पोल, आईना महल, हब्श खान का मकबरा, जामी मस्जिद, दीवान-ए-खास, दीवान-ए-आम, रोहतासन मंदिर और देवी मंदिर।

कविराज नरोत्तम कृत ‘‘मान चरित’’ में राजा मानसिंह के विस्मयकारी और व्ययसाध्य निर्माणकारी कार्यों का साहित्यिक आह्लादकारी वर्णन है। उपरोक्त वर्णित भवनों के अलावा सराय महल, बारादरी, फुलवारी, तख्त-ए-बादशाही, रबिशें, नाचघर, हब्सखां का रोजा और सैनिक बैरकें उल्लेखनीय है। देवी मंदिर के बारे में जनश्रुति है कि इस देवी मंदिर को राजा हरिश्चन्द्र ने बनवाया था। राजमहल राजा मानसिंह का कार्य केंद्र था। सोन नदी की ओर उठती, ऊँची लम्बी प्राचीर पर बने इस स्थल से प्राकृतिक छटा मनोहारी दिखती थी। रोहतासगढ़ में एक से एक बढ़कर महल, टूटे-फूटे भवनों की कतारें, मंदिर, मस्जिद और ढेरों कब्रें है। धर्मांध और क्रूर मुगल शासक औरंगजेब के समय किले के मंदिर तोड़े गए, मूर्तियाँ हटाई गई। रोहिताश्व के सुन्दर मंदिर को औरंगजेब ने तुड़वाया। ढेरों भग्नावशेष किले की परिधि में बिखरे फैले पड़े हैं। एक शिलालेख के अनुसार किले की मरम्मत 1638 में हुई थी।

मुगल काल में राजा मानसिंह का केंद्र होने के चलते अपनी बुलंदी पर रहा यह सुदृढ़ किला स्थापत्य कला की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। यहाँ बने महलों पर हिन्दू व मुगल शैली की छाप दृष्टिगोचर होती है। किले के मुख्य प्रवेश द्वार जिसे सिंह द्वार कहा जाता है का निर्माण गिरी दुर्ग के नियमों को ध्यान में रखकर ही किया गया है।