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Tuesday, January 25, 2022

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रिश्ते : कल्पना जड़ेजा

रिश्तों को न थामों तुम मुट्ठी में रेत की तरह …
सरक जायेंगे वो भी वक़्त की तरह ..
महसूस करो तुम उनको हर एक साँस की तरह …
रिश्ते जब बंधते है तो ख़ुशी देते है …
टूटते है तो कांच की तरह.
अनगिनित परछाई में बंट जाते है …
आसान है बिखरे मोती इकट्टे करना …
रिश्ता तो रहता है बंद मुठी में पानी की तरह …
पानी बह जाता है ..हथेली गीली छोड़ कर ..
और रिश्ते भी दे जाते है अपनी नरमी पानी की तरह |
कल्पना जड़ेजा

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18 COMMENTS

  1. एक बार फिर 'वही खुशी, वही गम।' वर्तनी की अशुध्दियॉं सुन्‍दर भावाभिव्‍यक्ति का सारा आनन्‍द नष्‍ट कर देती हैं।

  2. @ विष्णु बैरागी जी
    आपको पिछली पोस्ट की टिप्पणी में भी वर्तनियों की अशुद्धियाँ बताने का अनुरोध किया था पर न तो आपने पिछली पोस्ट की अशुद्ध वर्तनियाँ बतायी न इस पोस्ट पर उन वर्तनियों का जिक्र किया जो अशुद्ध है!!
    आपसे एक बार फिर अनुरोध है कि कृपया बताएं इस पोस्ट में कौन कौनसी वर्तनियाँ अशुद्ध है ताकि उन्हें सुधारा जा सके|

  3. @ विष्णु बैरागी जी

    पोस्ट में अशुद्ध वर्तनियाँ बताने के लिए कॉपी करने की कहाँ जरुरत है ? आप तो वे वर्तनियाँ लिख दीजिए जो इस रचना में आपको अशुद्ध दिख रही है|

  4. रतन सिंह शेखावत जी,
    मुझे आपकी मदद चाहिए.
    क्या आप यह बता सकेंगे की आपने अपने ब्लॉग को कॉपी होने से रोकने के लिए किस ट्रिक का इस्तेमाल किया है.
    मैं भी यह ट्रिक अपनाना चाहता हूँ.
    क्योंकि मेरी कई पोस्टे हुबहू कॉपी हो रही है.
    मैं बहुत उदास हूँ इस कारण.
    कृपया मेरी मदद करे और जो ट्रिक आपने लगाईं है अपने पोस्टो में उस ट्रिक को हमें भी बताये

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