राव शेखाजी व अखनखां के मध्य ढोसी नारनोल युद्ध वि.सं. 1530

ढोसी नारनोल का नवाब अखनखां एक वीर, गर्वीला और उद्भट वहादुर योद्धा था | उसके पास शक्तिशाली व सुसंगठित सेना थी | उसकी शक्ति से दिल्ली का सुल्तान बहलोल लोदी भी खौफ खाता था, जिसका उदाहरण एक घटना से पता चलता है- बहलोल लोदी ने ईराक से बड़ी अच्छी नस्ल के, बड़ी संख्या में घोड़े मंगवाये थे |  घोड़ों के इस कारवाँ ने नारनोल के पास विश्राम के लिए डेरा डाला था | अखनखां ने उनमें से नौ घोड़े चुनकर अपने पास रख लिए और कीमत भी नहीं चुकाई | बहलोल लोदी ने इस पर नाराज होते हुए घोड़े वापस नहीं करने पर परिणाम भुगतने की धमकी दी | अखन ने उत्तर भेजा – मेरे पास तुमसे अच्छी नस्ल के घोड़े हैं पर मैंने तो आपसे युद्ध करने की इच्छा से ही आपके घोड़े रखे हैं, अंत: निसंकोच अपनी सेना लेकर युद्ध के लिए चले आओ| पर लोदी चाहते हुए भी अखन पर आक्रमण का साहस नहीं कर सका |

पर उसी अखनखां को राव शेखाजी ने अपनी छोटी सी सेना के बल पर निपटा दिया, जिसे कोई हरा भी नहीं सका| आपको बता दें अखनखां बहुत अभिमानी व्यक्ति था और उसे अपनी रगों में दौड़ रहे चौहानी खून पर बड़ा अभिमान था | उसके पूर्वज कायम खान चौहान राजपूत थे, अंत: वह चाहता था कि राजपूत उसे एक राजपूत मानते हुए सम्मान दें पर राजपूत उसे अपने से अलग समझते थे अंत: वह राजपूतों से मन में द्वेष रखता था और मौका पड़ने पर आस-पास के राजपूत शासकों को तंग करता और उनके क्षेत्र में लूटमार करता था | उसके राज्य की सीमा के साथ तंवर, चौहान, निरबाण राजपूतों द्वारा शासित भूभाग की सीमाएं लगती थी, जो इससे काफी परेशान थे|

ये छोटे छोटे राजपूत भोमिय अखनखां से अरावली की तंग घाटियों में युद्ध कर उसे नुकसान तो पहुंचाते थे पर उसकी सेना से प्रत्यक्ष युद्ध लड़ने में असर्मथ थे| अखनखां के साथ जाटू तंवर भी थे जो दुर्दान्त योद्धा थे, उनकी वजह से अखनखां की ताकत और भी बढ़ी हुई थी, यही कारण था कि कभी कोई उसे हरा ना सका| अखनखां से पीड़ित तंवर, चौहान, निरबाण आदि राजपूत राव शेखाजी के निकट सम्बन्धी भी थे | अंत: उनके आग्रह पर राव शेखाजी ने अखनखां को निपटाने की योजना बनाई | साथ ही अखनखां ने राहगीर राजपूत के साथ दुर्व्यवहार किया था, जिसकी शिकायत भी शेखाजी तक पहुँच चुकी थी|

राव शेखाजी ने अपनी व इन राजपूतों की सेना को एकत्र किया जिसकी संख्या 6500 थी, जो अखनखां की सेना से काफी कम थी | चूँकि ढोसी नारनोल अमरसर से दूर थी अंत: राव शेखाजी ने सबसे पहले सेना की रसद व घोड़ों का चारा वहां बंजारों की बालद के रूप में पहुँचाया और अखनखां की सैन्य रणनीति का अध्यन किया |

अखनखां एक सिद्धहस्त योद्धा था और कुछ विशेष युद्ध व्यूह रचनाओं में माहिर था| “बाज व्यूह रचना” उसकी प्रिय युद्ध प्रणाली थी, जिसके माध्यम से वह कई बड़ी बड़ी सेनाओं को धूल चटा चुका था| उसकी इस व्यूह रचना पर “अदम्य योद्धा महाराव शेखाजी” पुस्तक में लेखक कर्नल नाथूसिंह शेखावत ने विस्तृत प्रकाश डाला है | कर्नल साहब के अनुसार इस युद्ध प्रणाली के अनुसार वह अपनी सेना के संरचना बाज पक्षी द्वारा शिकार को पंजों में दबाये हुए, पंख फैली हुए आकृति में करता था | इस प्रणाली के द्वारा वह किसी भी दिशा से आने वाले आक्रमण का सामना करने के लिए अपनी सेना को इसके केंद्र बिंदु पर घुमाव प्रदान कर सकता था | उसे यह भी पता था कि शेखाजी का आक्रमण व उसकी दिशा सदैव अनिश्चित होती है अंत: अखनखां ने अपनी रणनीति में पैंतरा बदलना भी शामिल कर रखा था |

शेखाजी के पुत्र रतनाजी ने पिता को सुझाव दिया कि हमें सर्वप्रथम व्यूह के निर्बल स्थान पर अग्नि प्रहार करने चाहिए और दुर्बल स्थान पंखों की संधि है | अंत: अग्नि प्रहार से बाज को उसके पंखों यानी मुख्य शक्ति केंद्र को अलग कर देना चाहिए जिससे उसका केन्द्रीय नियन्त्रण अस्त व्यस्त हो जायेगा और वह पुनर्गठन के लिए पीछे हटेगा तब पीछे से भी हमें आक्रमण कर देना चाहिए | शेखाजी ने ऐसा ही किया, उन्होंने अपनी सेना को चार भागों में बांटा- एक केन्द्रीय स्थल पर एक पीछे से और दो दोनों पार्श्वों की और से हमला करने के लिए और बहुत सवेरे कूच कर तीव्र वेग से अपनी योजनानुसार आक्रमण किया | उनकी योजना सफल रही और अगनखां की उनसे बड़ी और शक्तिशाली सेना छिन्न भिन्न हो गई | शेखाजी ने उसे सेना के पुनर्गठन के मौका ही नहीं दिया |  और कुछ ही देर में अगनखां राव शेखाजी से लड़ते हुए रणखेत रहा | यह देख उसका भाई मोहनखां अर्थात मैमनखां शेखाजी पर क्रोध से भरकर युद्ध करने लगा, पर वह भी शेखाजी के वार से थोड़ी ही देर में वीरगति को प्राप्त हुआ |

अपनी पुस्तक में कर्नल नाथूसिंह जी ने युद्ध के दौरान दोनों सेनाओं की स्थिति का एक चित्र बना रखा है जिसमें लाल रेखाओं में बाज के पंजों की आकृति दिखाई दे रही है वहीं ब्लू लाइन्स में शेखाजी की सेना की स्थिति दर्शाई गई है इसमें दिख रहा है कि सेना का एक दल पीछे गया और दो भागों में विभक्त होकर हमला किया | सामने से गई सेना भी पांच विभागों में बंट कर तीव्र आक्रमण करती नजर आ रही है |

इस तरह राव शेखाजी ने नारनोल युद्ध में अपने से बड़ी व शक्तिशाली अखनखां की सेना को धूल चटा दी | जबकि अखनखां अपने सामने शेखाजी को एक साधारण योद्धा समझता था और उसके पास शेखाजी से ज्यादा बड़ी सेना भी थी |

ढोसी नारनोल युद्ध की व्यूह रचना पर कर्नल नाथूसिंह शेखावत जो खुद भारतीय सेना में एक योद्धा रह चुके ने काफी विस्तार से प्रकाश डाला है और वर्णन किया है जिसे आप उनकी पुस्तक अदम्य योद्धा महाराव शेखाजी नामक पुस्तक में पढ़ सकते हैं | हमने जो जानकारी ली है उसी पुस्तक से साभार ली है |

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.