राम प्यारी रो रसालो – भाग -2

पिछला का शेष…..
बाईजीराज चिंता में पड़ गए- “किसको ओळ में रखूं ? और किसी को ओळ में रखे बिना सिंधी मानने वाले नहीं|”
बाईजीराज के पास ही उनके छोटे पुत्र भीमसिंघजी जो उस समय मात्र छ: वर्ष के थे बैठे ये सब सुन रहे थे| उनके दूध के दांत भी नहीं टूटे थे| उन्होंने मां के गले में हाथ डालकर कहा- “मुझे ओळ में भेज दीजिये|”
भोले भाले मुंह से ये लफ्ज सुनते ही बाईजीराज की आँखों में आंसू आ गए| बेटे को सीने से लगा रामप्यारी को सौंप दिया- “ले जा इसे ओळ में सिंधियों को सौंप दे|”रामप्यारी भीमसिंहजी को गोद में उठाकर ले गयी और सिंधियों को सौंप दिया| अर्जुनसिंह चुण्डावत भी उनके पीछे हो गए| सिंधियों ने दो वर्षों तक दोनों को अपने पास ओळ (गिरवी) में रखा| भीमसिंहजी दो वर्ष ओळ में रहकर वापस आये उसके कुछ दिनों बाद ही राणा हमीरसिंह का कम उम्र में ही निधन हो गया| अब मेवाड़ की गद्दी के हकदार भीमसिंहजी ही थे| पर बाईजीराज ने उन्हें गद्दी पर बैठाने से मना कर दिया बोले-
“मुझे राज्य नहीं चाहिए| मेरा बेटा कुशल रह जाए यही मेरे लिए राज्य है| इस राज्य के पीछे मेरे पति भरी जवानी में धोखे से मार दिए गए,मेरे पुत्र को कम उम्र में जहर देकर मार दिया गया| मुझे तो राज से नफरत हो गयी है|राज के लालच में इंसानों में इंसानियत तक नहीं रहती,रात दिन धोखा,फरेब | मैंने मेवाड़ की स्वामिनी बनकर भी कौनसा सुख देखा? दुःख ही दुःख भोगा है| मैं चाहती हूँ मेरा बेटा कुशल पूर्वक रहे| राजा के बजाय तो दुसरे व्यक्ति आराम से रहते है|”

पंचों,सरदारों,सामंतों व प्रधान ने ड्योढ़ी पर जाकर अर्ज करवाई – “आप इन्हें गद्दी पर नहीं बैठाएंगे तब भी इनकी जान को खतरा तो रहेगा ही| जो भी गद्दी पर बैठेगा वो भला गद्दी के असली हकदार को जिन्दा रहने देगा?

भीमसिंहजी साढ़े नौ बरस की उम्र में मेवाड़ की गद्दी पर बैठे| मेवाड़ राज्य की पूरी पंचायती चुण्डावतों हाथों में थी, चुण्डावतों और शक्तावतों के बीच अनबन चल रही थी सो शक्तावतों के पाटवी महाराज मोहकमसिंहजी रूठकर मिंडर जा बैठे| राज्य की पंचायती अर्जुनसिंहजी चुण्डावत के हाथ में रही| राणा भीमसिंहजी की सालगिरह आई| रामप्यारी ने मुसाहिबों को जाकर कहा- ” हुजुर की सालगिरह आई है सो उसे मनाने के लिए धन का प्रबन्ध करो|”
मुसाहिब बोले- ” धन का प्रबंध कहाँ से करें? खाजाना तो खाली पड़ा है|

रामप्यारी बोलने में जरा तेज थी गुस्सा होकर बोली- “धन का प्रबंध तो आपको करना पड़ेगा| प्रबंध नहीं कर सकते तो मुसाहिबी क्यों कर रहे हो? छोड़ दो इसे|

रामप्यारी की तीखी बात सुन एक मुसाहिब ने चिढ़ते हुए कहा- “हमसे तो रुपयों का प्रबंध नहीं होता,तूं करले|”
रामप्यारी बहुत बड़ी ज़बानदराज औरत थी बाईजीराज उसके कहने में ही चलते थे| झट से बोली -” आपके भरोसे मुसाहिबी नहीं पड़ी है| राज्य में काम करने वालों की कोई कमी नहीं| आप चुण्डावतों के जोर पर खा रहे हो| कह देना अर्जुनसिंहजी को हुजुर की वर्षगाँठ तो मनाई जाएगी वो धूम धाम से| रुपयों का इंतजाम तो आपको करना ही पड़ेगा| यदि आप लोगों से प्रधानी नहीं संभलती तो छोड़ दीजिये |”

जनाना ड्योढ़ी पर एक अलंकार सोमचंद गांधी रहता था उसने इस मौके का फायदा उठाने की सोची और रामप्यारी के पास जाकर बोला- ” भुवाजी, अर्जुनसिंहजी को बाईजीराज बहुत काबिल समझते है| यदि प्रधानी मुझे दिलवा दें तो वर्षगाँठ मनाने में क्या है ? राज्य के सभी कार्य भली भांति सही तरीके से कर बताऊँ|”
रामप्यारी ने बाईजीराज किसी तरह मनाकर प्रधानी सोमचंद को दिलवा दी| सोमचंद ने झट से चुण्डावतों के खजांची से ही रूपये लाकर बाईजीराज के नजर किये|

सोमचंद ने राजनीती खेली| चुण्डावतों के विरोधियों को उसने अपने साथ मिला कर अपना पक्ष मजबूत कर लिया| कोटा के जालिमसिंहजी को भी अपने साथ मिला लिया| राणा जी को मिंडर साथ ले जाकर शक्तावतों के पाटवी महाराज मोहकमसिंहजी को मनाया जो वर्षों से मेवाड़ से रूठे बैठे थे| राणाजी खुद उन्हें मनाने गए तो वे राजी होकर उनके पीछे पीछे उदयपुर आ गए| अब प्रधानी मोहकमसिंह जी को सौंपी गयी| अब प्रधानी चुण्डावतों के हाथ से निकलकर सक्तावातों के हाथ में आ गयी| सोमचंद गाँधी और रामप्यारी की सलाह से राज्य कार्य चलने लगा| शक्तावतों के हाथ प्रधानी आते ही चुण्डावत अपने अपने ठिकानों पर चले गए| शक्तावतों ने चुण्डावतों को नुकसान पहुँचाने की सोची तो चुण्डावतों ने शक्तावतों को|

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One Response to "राम प्यारी रो रसालो – भाग -2"

  1. ताऊ रामपुरिया   July 10, 2017 at 5:39 am

    जो बातें इतिहास की जन सामान्य को मालूम नही हैं और खासकर नई पीढी को, उनकी सुंदर जानकारी दी आपने, आभार.
    रामराम
    #हिन्दी_ब्लॉगिंग

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