रानी पद्मिनी ने करवाया था सर्जिकल स्ट्राइक, खिलजी को दिया था धोखे का जबाब

अलाउद्दीन खिलजी जब चितौड़ दुर्ग को सैनिक ताकत से फतह नहीं कर सका, तब उसने कपट का सहारा लिया। खिलजी ने राणा को सन्देश भेजा कि- मेरा इरादा आपसे लड़ने का नहीं है। मैं तो आपसे दोस्ती करने का इच्छुक हूँ। आपके पास सिंहल द्वीप से लाये पांच मुझे दे दें तो मैं चला जाऊंगा और फिर कभी इधर लड़ने नहीं आऊंगा। उसका चिकना चुपड़ा सन्देश सुन भोले राजपूत उसकी बातों में आ गए। उन्होंने उसे किले में आमंत्रित कर लिया और मेहमान के तौर पर खूब आवभगत की। जब खिलजी वापस अपने डेरे में आने लगा तो रावल रत्नसिंह शिष्टाचार निभाते हुए उसे किले के मुख्य द्वार तक पहुंचाने आये। रास्ते में अल्लाउद्दीन मीठी मीठी बातें करता रहा। किले के मुख्य द्वार पर आते ही खिलजी को लेने आये सैनिकों ने अलाउद्दीन का इशारा पाते ही रणनीति के अनुसार रावल रत्नसिंह को घोखे से अपनी हिरासत में ले लिया और वहीं से सन्देश भिजवाया कि रावल को तभी आजाद किया जायेगा, जब रानी पद्मिनी उसके पास भजी जाएगी।

इस तरह के धोखे और सन्देश के बाद राजपूत क्रोधित हो उठे, लेकिन रानी पद्मिनी ने धीरज व चतुराई से काम लेने का आग्रह किया। रानी ने गोरा-बादल से मिलकर अलाउद्दीन को उसी तरह जबाब देने की रणनीति अपनाई जैसा अलाउद्दीन ने किया था। रणनीति के तहत खिलजी को सन्देश भिजवाया गया कि रानी आने को तैयार है, पर उसकी दासियाँ भी साथ आएगी। खिलजी सुनकर आन्दित हो गया। रानी पद्मिनी की पालकियां आई, पर उनमें रानी की जगह वेश बदलकर गोरा बैठा था। दासियों की जगह पालकियों में चुने हुए वीर राजपूत थे। खिलजी के पास सूचना भिजवाई गई कि रानी पहले रावल रत्नसिंह से मिलेंगी। खिलजी ने बेफिक्र होकर अनुमति दे दी। रानी की पालकी जिसमें गोरा बैठा था, रावल रत्नसिंह के तम्बू में भेजी गई। गोरा ने रत्नसिंह को घोड़े पर बैठा तुरंत रवाना कर और पालकियों में बैठे राजपूत खिलजी के सैनिकों पर टूट पड़े।

अचानक हुई इस सर्जिकल स्ट्राइक रूपी कार्यवाही से खिलजी व उसके सैनिक हक्के बक्के रह गए। एक तरफ गोरा बादल अपने राजपूत सैनिकों के साथ जूझ रहे थे, दूसरी और रावल रत्नसिंह चितौड़ के किले में सुरक्षित प्रवेश कर गए। इस युद्ध के समय गोरा की उम्र महज 12 वर्ष थी। गोरा व बादल ने ही इस कार्यवाही में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और सबसे ज्यादा बहादुरी दिखाई थी।

कहने को इस कार्यवाही के बाद हुए युद्ध में दोनों वीर मातृभूमि की रक्षार्थ मर गए, लेकिन वे मरे नहीं, शहीद होकर अमर हो गए। मेवाड़ के इतिहास में दोनों वीरों की वीरता स्वर्ण अक्षरों में अंकित है और अंकित है उनके द्वारा की गई यह सर्जिकल स्ट्राइक रूपी कार्यवाही। इस कार्यवाही से रानी ने खिलजी को जैसे का जबाब तैसे दिया था।

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