राणोली फोर्ट का इतिहास History of Ranoli Fort

राणोली फोर्ट का इतिहास : शेखावाटी आँचल के सीकर जिले मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर है राणोली गांव | यह गांव सीकर जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग व रेलवे लाइन पर पड़ता है | रणोली शिशु के नाम से यहाँ रेलवे स्टेशन है | गांव में जाने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग के पास रेलवे लाइन के अंडर ब्रिज से होकर जाना पड़ता है | गांव के मध्य ही बना है रियासती काल की यादें तरोताजा करता यह खुबसूरत गढ़ | जिसकी नींव आज से लगभग साढ़े चार सौ वर्ष पूर्व रखी गई थी | खंडेला के राजा सवाई सिंह जी के लघु पुत्र शम्भूसिंह को राणोली गांव की जागीर आजीविका में मिली थी|

शम्भूसिंह जी ने ही इस जगह को उपयुक्त और शुभ समझकर यहाँ गढ़ की नींव रखी और निर्माण कराया | शम्भूसिंह जी ने गढ़ में एक मंदिर का भी निर्माण कराया था, जिसमें आज भी पूजा अर्चना होती है | शम्भूसिंह जी के उनके वंशजों ने समय समय पर इस गढ़ को विस्तार दिया, जो एक खुबसूरत विरासत के रूप में आज आपके सामने विद्यमान है | शम्भूसिंह जी का निधन वि,सं. 1817 पौष सुदी नवमी को हुआ था |

शम्भूसिंहजी के निधन के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र पृथ्वीसिंह जी राणोली फोर्ट के स्वामी हुए | पृथ्वीसिंह जी बुद्धिमान व पटु कार्य सरदार थे | वि.सं. 1818 में पृथ्वी सिंह जी को जयपुर के महाराजा सवाई माधोसिंहजी ने अपनी सेना में नियुक्त किया और वेतन के बदले तीन गांवों की जागीर दी, जिनकी वार्षिक आय 17000 रूपये थे | इसके बदले पृथ्वीसिंह जी को दो बन्दुक धारी, बारह घुड़सवार और कुछ पैदल सैनिक रखने थे |

चूँकि पृथ्वीसिंह जी अपने पैतृक राज्य खंडेला के अधीन थे, पर उन्होंने जयपुर दरबार में अपनी कार्य कुशलता के बल पर खंडेला से अलग पूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया था | इसलिए उन्हें भी राणोली राजा कहा जाने लगा | राजा पृथ्वीसिंह जी के तीन पुत्र थे जिनमें उनके ज्येष्ठ पुत्र सेवईसिंह जिन्हें इतिहास में शिवसिंह भी लिखा है ने अपने पिता के जीवनकाल में ही मावंडा मंडोली युद्ध लड़ा और वीरगति को प्राप्त हुए | आपको बता दें मावंडा मंडोली युद्ध जयपुर व भरतपुर की सेनाओं के मध्य वि.सं. 1824 में लड़ा गया था | इस युद्ध में सेवईसिंह जुझार हुए यानी वे सिर कटने के बाद भी लड़े और वीरगति प्राप्त की | उनके जुंझार होने के बाद उनकी पत्नी कुंवरानी चाम्पावतजी ने उनके साथ सहगमन किया और वे सती हो गई | गिरधर वंश इतिहास पुस्तक में कुंवरानी चाम्पावतजी का नाम गुमानकुंवरी चाम्पावत लिखा है और उनके पिता का नाम चांपावत ठाकुर गिरधारीसिंह लिखा जो हरसोलाव गांव के थे | ज्ञात हो हरसोलाव में इतिहास प्रसिद्ध बल्लू जी चांपावत के वंशज निवास करते हैं |

राजा पृथ्वीसिंहजी का निधन वि.सं. 1846 में हुआ | उनकी याद में भी राणोली गांव में स्मारक रूपी छतरी बनी है | राजा पृथ्वीसिंहजी के बाद भी राणोली राजपरिवार ने जयपुर दरबार के लिए मामला गुजार सामंत यानी ट्रिब्यूट चीफ के रूप में कार्य किया | खंडेला इतिहास के अनुसार राणोली वाले 2100 रूपये वार्षिक मामले के जयपुर राजकोष में जमा करवाते थे |

वर्तमान में इस शानदार व खुबसूरत राणोली फोर्ट में यहाँ के आखिरी राजा आनन्दसिंहजी के तीन पुत्रों का परिवार निवास करता है | गढ़ के मुख्य दरवाजे में प्रवेश करते ही, एक बड़ा दालान है और सामने ही जनानाखाना का द्वार नजर आता है | मुख्य द्वार के बाजू में बड़े बरामदे व ऊपर झरोखों से सुसज्जित बड़ा हाल बना है, जिसमें बैठकर राणोली के मुख्य बाजार को निहारा जा सकता है | मुख्य द्वार की प्राचीर के एक पर एक शानदार झरोखेदार गोल आकृति वाली वुर्ज बनी है और इसी बुर्ज में यह शानदार और विशाल कक्ष बना है |  किले के बाहर से इस गोलाकार बुर्ज का मनोरम दृश्य देखते ही बनता है |

राणोली फोर्ट के जनाना महल के बाहर भी दोनों ओर बड़े बरामदे व उनमें कक्ष बने है | दरवाजों व खिड़कियों पर आज भी पुराने ज़माने के खुबसूरत व मजबूत किंवाड़ लगे हैं | जनाना महल के प्रांगण में प्राचीन मंदिर बना है | जनाना महल में भी कई बड़े बड़े कक्ष दर्शनीय है | राणोली के पूर्व राजपरिवार की यह विरासत बेशक छोटी है पर है बहुत ही खुबसूरत | सबसे अच्छी बात यह है कि इस हैरिटेज धरोहर की सार संभाल बहुत अच्छी तरह से की गई है जिससे इसका मूल रूप आज भी बरक़रार है |

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