राजिया रा सौरठा -8

कवि कृपाराम जी द्वारा लिखित नीति के राजिया के दोहे भाग-8

विष कषाय अन खाय, मोह पाय अळसाय मति |
जनम अकारथ जाय, रांम भजन बिन राजिया ||

विषय- वासनाओं मे रत रहते हुए अन्न खाकर मोह मे पड़ कर आलस्य मत कर | यह मानव जन्म ईश्वर भजन के बिना व्यर्थ ही बिता जा रहा है |

जिण तिण रौ मुख जोय, निसचै दुख कहणौ नहीं |
काढ न दै वित कोय, रीरायां सूं राजिया ||

हर किसी के आगे अपना दुख: नही कहना चाहिय, क्योंकि गिड़गिड़ाने से कोई भी व्यक्ति धन निकाल कर नही दे देगा |

जका जठी किम जाय, आ सेज्यां हूंता इळा |
ऐ मृग सिर दै आय, रीझ न जाणै राजिया ||

वीर भोग्या वसुन्धरा सूत्र के अनुसार भूमि रुपी भार्या शूरवीरों की शय्या छोड़कर अन्यत्र सहज ही कैसे जा सकती है, क्योंकि ये मस्ताने तो मृगों की तरह रीझना नही जानते, बल्कि सिर देना जानते है |

रिगल तणौ दिन रात, थळ करतां सायब थक्यौ |
जाय पड़यौ तज जात, राजश्रियां मुख राजिया ||

रात दिन स्वामी के विनोद की व्यवस्था करते-करते थक गया और अपने जाति-स्वभाव को भी छोड़ दिया, क्योकि वह राजश्री लोगो (रईसों) के घेरे मे जा पड़ा | [दरबारी सेवक की विवश दशा का चित्रण ]

नारी नहीं निघात, चाहीजै भेदग चतुर |
बातां ही मे बात, रीज खीज मे राजिया ||

किसी का भेद जानने के लिये नारी की नही,बल्कि चतुर कुटनिज्ञ चाहिए,जो बातों ही बातों मे व्यक्ति को रिझा कर अथवा खिजा कर रहस्य ज्ञात कर सके |

क्यों न भजै करतार , साचै मन करणी सहत |
सारौ ही संसार, रचना झूंठी राजिया ||

मनुष्य सच्चे मन और कर्म से परमात्मा का भजन क्यों नही करता ? यह सारा संसार तो मिथ्या है, सत्य तो एकमात्र ईश्वर ही है |

घण-घण साबळ घाय, नह फ़ूटै पाहड़ निवड़ |
जड़ कोमळ भिद जाय, राय पड़ै जद राजिया ||

जो पहाड़ हथोड़ो के घने प्रहारों से भी नही टूटता, उसी मे छोटी सी दरार पड़ जाने पर पेड़ की कोमल जड़ उसे भेद देती है अर्थात फ़ूट पड़ने पर कमजोर शत्रु भी घात करने मे सफ़ल हो जाता है |

जगत करै जिमणार, स्वारथ रै ऊपर सकौ |
पुन रो फ़ळ अणपार, रोटी नह दै राजिया ||

संसार मे लोग स्वार्थ की भावना और दिखावे के लिये तो तरह-तरह के भोजों का आयोजन करते है, किन्तु पुण्य महान फ़लदयाक होने पर भी उस भावना से किसी भुखे को रोटी तक नही दी जाती है |

हित चित प्रीत हगांम महक बखेरै माढवा |
करै विधाता कांम, रांडां वाला राजिया ||

विधाता भी कभी-कभी मुर्ख कार्य कर बैठता है, वह संसार मे प्रेम,प्रसन्नता और रागरंग की मदभरी महक के दौर मे ही सहसा उस मनुष्य को मिटा देता है|

स्याळां संगति पाय, करक चंचेड़ै केहरी |
हाय कुसंगत हाय, रीस न आवै राजिया ||

गीद्ड़ों की संगति पाकर शेर भी सूखी हड्डियां चबाने लगा है | हाय री कुसंगति ! उसे तो अपने किये पर क्रोध भी नही आ रहा है|

धांन नही ज्यां धूळ, जीमण बखत जिमाड़िये |
मांहि अंस नहिं मूळ, रजपूती रौ राजिया ||

जिन लोगो मे क्षात्रवट(रजपूती) के संस्कारो का लवलेश भी नही है, उन्हे भोजन के समय खिलाया जाने वाला अनाज धूल के समान है|

के जहुरी कविराज, नग माणंस परखै नही |
काच कृपण बेकाज, रुळिया सेवै राजिया ||

कई जौहरी नगीनो को और कई कवि गुणग्राहक मनुष्यो को परख नही सकते, इसीलिए वे क्र्मश: कांच और कृपण की निष्फ़ल सेवा कर अन्त मे पछताते है है |
क्रमश:……………

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