राजिया रा सौरठा -2

अपने सेवक राजिया को संबोधित करते कवि कृपाराम जी द्वारा लिखित नीति सम्बन्धी दोहे |

खळ धूंकळ कर खाय, हाथळ बळ मोताहळां |
जो नाहर मर जाय , रज त्रण भकै न राजिया ||

सिंह युद्ध में अपने पंजों से शत्रु हाथियों के मुक्ताफल-युक्त मस्तक विदीर्ण कर ही उन्हें खाता है | वह चाहे भूख से मर जाय,किंतु घास कभी नही खायेगा |

नभचर विहंग निरास, विन हिम्मत लाखां वहै |
बाज त्रपत कर वास , रजपूती सूं राजिया ||

आकाश में लाखों पक्षी हिम्मत के बिना (भूख के मारे) उड़ते रहते है,किंतु हे राजिया ! बाज अपने पराक्रम से ही पक्षियों का शिकार कर तृप्त जीवन जीता है |

घेर सबल गजराज , कहर पळ गजकां करै |
कोसठ करकम काज, रिगता ही रै राजिया ||

सिंह बलवान हाथी को घेर कर और मार कर उसके मांस का आहार करता है किंतु हे राजिया ! उसी वक्त गीदड़ हड्डियों के ढांचे के लिए ही ललचाते रहते है |

आछा जुध अणपार, धार खगां सनमुख धसै |
भोगे हुवे भरतार ,रसा जिके नर राजिया ||

जो लोग अनेक बड़े युद्धों में तलवारों की धारों के सन्मुख निर्भीक होकर बढ़ते है,वे ही वीर भरतार बनकर इस भूमि को भोगते है |

दांम न होय उदास, मतलब गुण गाहक मिनख |
ओखद रो कड़वास, रोगी गिणै न राजिया ||

गुणग्राहक मनुष्य अपनी लक्ष्य-सिद्धि के लिए किसी भी कठिनाई से निराश नही होता , ठीक उसी तरह, जिस तरह हे राजिया ! रोगी व्यक्ति औषध के कड़वेपन की परवाह नही करता |

गह भरियो गजराज, मह पर वह आपह मतै |
कुकरिया बेकाज, रुगड़ भुसै किम राजिया ||

मस्त गजराज तो अपनी मर्जी से प्रथ्वी पर हर जगह विचरण करता है किंतु हे राजिया ! ये मुर्ख कुत्ते व्यर्थ ही उसे देखकर क्यों भोंकते है |

असली री औलाद, खून करयां न करै खता |
वाहै वद वद वाद, रोढ़ दुलातां राजिया ||

शुद्ध कुल में जन्म लेना वाला तो अपराध करने पर भी झगडा नही करता,जबकि अकुलीन व्यक्ति अकारण ही झगडे करता रहता है ठीक उसी तरह जिस तरह हे राजिया ! खच्चर व्यर्थ ही बढ-बढ कर दुलत्तियाँ झाड़ता रहता है |

ईणही सूं अवदात, कहणी सोच विचार कर |
बे मौसर री बात, रूडी लगै न राजिया ||

सोच-समझकर कही जाने वाली बात ही हितकरणी होती है, हे राजिया ! बिना मौके कही गई बात किसी को अच्छी नही लगती है |

बिन मतलब बिन भेद, केई पटक्या रांम का |
खोटी कहै निखेद, रांमत करता राजिया ||

कई राम के मारे दुष्ट लोग ऐसे होते है, जो बिना मतलब और बिना विचार किए हँसी-ठिठोली में ही किसी अप्रिय एवं अनुचित बाते कह देते है |

पल-पल में कर प्यार,पल-पल में पलटे परा |
ऐ मतलब रा यार, रहै न छाना राजिया ||

जो लोग पल-पल में प्यार का प्रदर्शन करते है और पल-पल में बदल भी जाते है, हे राजिया ! ऐसे मतलबी यार दोस्त छिपे नही रह सकते वे तुंरत ही पहचाने जाते है |

सार तथा अण सार, थेटू गळ बंधियों थकौ |
बड़ा सरम चौ भार, राळयं सरै न राजिया ||

परम्परा के रूप में जो भी सारयुक्त अथवा सारहीन तत्व हमारे गले बंध गया है, पूर्वजों की लाज-मर्यादा के उस भार को फेंकने से काम नही चलता उसे तो निभाना ही पड़ता है |

पहली कियां उपाव, दव दुस्मण आमय दटे |
प्रचंड हुआ विस वाव , रोभा घालै राजिया ||

अग्नि,दुश्मन और रोग तो आरंभ में ही दबाने से दब जाते है ,लेकिन हे राजिया ! विष (शत्रुता एवं रोग) और वायु प्रचंड हो जाने पर सदा कष्ट देते है |

एक जतन सत एह , कुकर कुगंध कुमांणसां |
छेड़ न लीजे छेह, रैवण दीजे राजिया ||

कुत्ता,दुर्गन्ध और दुष्टजन से बचने का एक मात्र उपाय यही है कि उन्हें छेड़ा न जाय और ज्यों का त्यों पड़ा रहने दिया जाय |

नरां नखत परवाण, ज्याँ उंभा संके जगत |
भोजन तपै न भांण, रावण मरता राजिया ||

मनुष्य की महिमा उसके नक्षत्र से होती है, इसलिय उसके जीते जी संसार उससे भय खाता है | रावण जैसे प्रतापी की मृत्यु होते ही सूर्य ने उसके रसोई घर में तपना (भोजन बनाना) बंद कर दिया था |

हीमत कीमत होय, विन हीमत कीमत नही |
करै न आदर कोय, रद कागद ज्यूँ राजिया ||

हिम्मत से ही मनुष्य का मूल्यांकन होता है,अतः पुरुषार्थहीन व्यक्ति का कोई महत्व नही होता | हे राजिया ! साहस रहित व्यक्ति रद्दी कागज की भांति होता है जिसका कोई भी आदर नही करता |
डा. शक्तिदान कविया द्वारा लिखित पुस्तक “राजिया रा सौरठा” से साभार |
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