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राजा गिरधरदास खण्डेला का इतिहास

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राजा गिरधरदास खण्डेला

राजा गिरधरदास खण्डेला : वि.सं. 1678 में खण्डेला के राजा रायसल दरबारी के निधन के बाद उनके छोटे पुत्र गिरधरदास खंडेला की गद्दी पर बैठे | गिरधरदास राजा रायसल दरबारी की मेड़तनी रानी के पुत्र थे | अपने पिता के जीवन काल में ही वे बादशाह अकबर की सेवा में चले गए थे | वि.सं. 1659 में बादशाह अकबर ने इन्हें दक्षिण के अभियानों में भाग लेने के लिए अब्दुर्रहीम खानखाना के पुत्र मिर्जा इरीज के साथ भेज दिया था | अमर चम्पू के विरुद्ध लड़े युद्ध गिरधरदास सेना की हरावल यानी अग्रिम पंक्ति में लड़े और वीरता प्रदर्शित की, इस युद्ध में शाही सेना की विजय हुई|

जहाँगीर के समय शाहजादा खुर्रम ने नूरजहाँ की गतिविधियों से तंग आकर वि. 1679 के अंतिम समय पिता से विद्रोह कर दिया | उसने पहले आगरा पर विक्रमादित्य को भेजा पर असफल होने पर वह बिलोचपुर की तरफ बढ़ा | मार्च 1623 ई. वि. सं. 1679 में शाही सेना से खुर्रम का युद्ध हुआ | इस समय बादशाह की आज्ञानुसार दूरदराज से भी उमराव अपनी सेना लेकर आये | राजा गिरधरदास भी बुरहानपुर से अपनी सेना लेकर यहाँ पहुंचे | कई मुग़ल सेनापति खुर्रम के साथ हो गए, पर राजा गिरधरदास बादशाह जहाँगीर के पक्ष में रहे | युद्ध हुआ, शहजादे को पराजित होकर भागना पड़ा |

दक्षिण में रहते हुए बुरहानपुर में वि.सं. 1680 पोह बदी पंचमी को सैयद मुसलमानों के साथ हुए एक झगड़े में  गिरधरदास मरे गए | इस घटना पर जहाँगीर नामा में लिखा कि –“सैयद कबीर के भाई के सेवक ने तलवार की धार तेज कराने के लिए सिगलीगर को दी थी, पारिश्रमिक को लेकर सिगलीगर व सैयद के आदमी के मध्य झगड़ा हो गया और सैयद के आदमियों ने सिगलीगर के साथ पिटाई की | राजा गिरधरदास का घर सिगलीगर के पास ही था | अत: राजा गिरधरदास के राजपूतों ने सिगलीगर का पक्ष लेकर सैयदों के आदमियों को पीटकर भगा दिया |

इस घटना के बाद काफी सारे सैयद एकत्र होकर आ गए, तब गिरधरदास व उनके सैनिक हिन्दू मान्यता के अनुसार नंगे सिर बैठकर भोजन कर रहे थे | उसी वक्त सैयदों ने हमला किया और राजा गिरधरदास सहित उनके कई सैनिकों को मार दिया | इस पर मामला बिगड़ गया और राजपूत व सैयद लड़ने के लिए एकत्र होकर दुर्ग के सामने आ गए, तब महावत खां ने दोनों पक्षों को शांत किया, सैयद कबीर को कैद करवा दिया तब जाकर झगड़ा शांत हुआ |

गिरधरदास की तीन रानियों के इतिहास में नाम मिलते हैं | जिनमें किशनावती मेडतनी जो मारवाड़ के बूडसू ठिकाने की पुत्री थी | श्याम कुंवर बीकीजी जो बीकानेर की थी और अग्रादे बिदावत जो सांडवा की थी | इन रानियों से राजा गिरधरदास के द्वारकादास, हरिसिंह, किशनसिंह, गोकुल, गोरधन सिंह व सूरसिंह पांच पुत्र हुए व एक पुत्री थी जिसका विवाह अमरसिंह नागौर के साथ हुआ था |

राजा गिरधरदास का बुरहानपुर में निधन होने के बाद उनके पुत्र द्वारकादास वि.सं. 1680 में खण्डेला की गद्दी पर बैठे | गिरधरदास के वंशज “गिरधरजी का शेखावत” कहलाते हैं |

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