राजस्थान में अंगरेजों का दखल

मुग़ल साम्राज्य के पतन के बाद भारत की राजनीति में जिस मराठा शक्ति का तेजी से प्रादुर्भाव हुवा उस शक्ति ने एक बार मुगलों के विरुद्ध प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए समस्त भारत को झकझोर दिया | यधपि राजस्थान के राजवाडे मुगलों का मुकाबला करते करते ही शक्तिहीन हुए थे पर मराठो की धन लोलुपता ने उन रजवाडो की अस्क्तत्ता से अब लाभ उठाने का अवसर हाथ से नही जाने दिया और एक धूमकेतु की तरह उन्होंने यहाँ की राजनीति में प्रवेश किया | रजवाडों की आपसी फूट से लाभ उठाकर उन्होंने कभी इस पक्ष का साथ दिया तो कभी उस पक्ष का | उदेश्ये हीन लूटपाट और बड़ी बड़ी सेनाओं का खर्च जुटाने में व्यस्त मराठा सरदारों ने यहाँ की बची खुची शक्ति को प्रायः समाप्त कर दिया और ऐसे अवसर पर अंग्रेजों की नजर जब राजस्थान पर पड़ी तो शान्ति के लिए लालायित रजवाडों ने उन्हें संधि करने में विशेष सेन्ये शक्ति खपाने की आवश्कता नही पड़ी | केवल भरतपुर पर जनरल लेक के हमले ने ही यहाँ के शासकों के सामने यह प्रमाण प्रस्तुत कर दिया की अंग्रेजों की व्यवस्थित शक्ति से अब मुकाबला करना कठिन है अतः थोडी बहुत टालमटोल और राजनेतिक दावं पेच के बाद सभी रजवाडों ने अपने आंतरिक मामलों को सुरक्षित रखने और अंग्रेजों द्वारा बाह्ये हमलों के निवारण की शर्त पर संधि कर ली |
धीरे धीरे अंगरेजों ने जब यहाँ के रजवाडों की अस्त व्यस्त आर्थिक स्थिति ,घातक रुढियों द्वारा प्रशासन में दखल और असंतुष्ट जागीरदारों के बखेड़ों का अध्येयन किया तो राज्ये में सुव्येव्स्था कायम करने के बहाने से आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने को वे तत्पर हुए | यह यहाँ के शासकों और अनेक स्वतंत्र चेता जागीरदारों को सह्ये नही हुवा था | उनकी शक्ति बहुत क्षीण हो चुकी थी पर उनके व्यक्तित्व में स्वाधीनता की जो चिंगारी शेष थी वह रह रह कर दमक उठती थी | इसी चिंगारी के फल स्वरुप यहाँ के वीरों ने गुलामी के नकाब को दूर फेंकने के लिए अपनी शक्ति खुल कर परिचय दिया | इन वीरों में शेखावाटी के ठाकुर डूंगर सिंघ शेखावत और जवाहर सिंघ शेखावत का नाम सर्वोपरि है |उनकी गौरव गाथा आज भी राजस्थान की जनता की जबान पर है |
डॉ . नारायण सिंघ भाटी
(“स्वतंत्रता सेनानी डुंग जी जवाहर जी” में )
संकलन :- कु. राजुल शेखावत

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