हठीलो राजस्थान-48, दोहों में जनजीवन का चित्रण

हठीलो राजस्थान-48, दोहों में जनजीवन का चित्रण

बरसालो बरसै भलो, हवा न बाजै लेस |
धोरां में धापा करै, मोरां हंदो देस ||२८६||

बरसात में अच्छी वर्षा हो व हवा न चले तो रेगिस्तानी इलाके में भरपूर पैदावार होती है | ऐसा यह मरुप्रदेश है जहाँ मोर-पक्षी अधिक होते है |

बिन बादल आकाश नित, खै खै पवन चलाय |
काल पड़न्तां इण धरा, मऊ मालवै जाय ||२८७||

आकाश में कहीं बदल दिखाई नहीं देते और सनन सनन हवाएं चल रही है | स्पष्ट ही ये अकाल के पड़ने के लक्षण है | अकाल पड़ने पर यहाँ के लोग पशुओं को लेकर मऊ-मालवे (मध्य-प्रदेश) की और चल देते है |

धर ऊपर सुरंगी धरा, जिण विध देखो आय |
काल पड़न्तां कामणि, धन बालक रुल जाय ||२८८||

वर्षा होने पर यह धरती स्वर्ग सी दिखाई देती है ,परन्तु अकाल पड़ने पर यहाँ के नर,नारी,बालक तथा पशुधन सब अन्य प्रदेशों में पलायन करने को विवश हो जाते है |

बाजै सीली बायरी, ऊपर गाजै मेह |
सीयालो आयो सखी, कऊं हथाई नेह ||२९३||

ठंडी हवा चल रही है और ऊपर से वर्षा के बादल गरज रहे है | हे सखी ! शीत ऋतू आ गई है | इसमें तो अलाव पर तपते हुए आपसी बातचीत करना ही प्रीति वर्धक होता है |

पीणों, पचणों , पैरणों , सरदी साथै आय |
खाणों , रैणों खेलणों , सीयालै सुख दाय ||२९४||

पानी,पचना और पहनना ये सर्दी के साथ आते है | साथ ही भोजन ,रहना और खेलना ये सब शीत ऋतू में ही सुखदायी होते है |

स्व.आयुवान शेखावत

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