हठीलो राजस्थान-37

हठीलो राजस्थान-37

ओडे चूँखै आंगली, खेलै बालो खेल |
बिणजारी हाँकै बलद, माथै ओडो मेल ||२२०||

बालक टोकरे में अपनी अंगुली चूसता हुआ खेल रहा है व उसकी माता (बिणजारी) टोकरे को सिर पर लिए हुए अपने बैलों हांकती हुई चली जा रही है|

देखो जोड़ी हेत री, हित हन्दो बरताव |
इक मरतां बीजो मरै, सारस रोज सभाव ||२२१||

परस्पर प्रेम में बंधी और नेह को निभानी यह सारस की जोड़ी कैसी अनूठी है कि जो एक के मरने पर दूसरा भी अपने प्राण त्याग देता है |

जाणी मोर न जगत में, वाणी , रूप अनूप |
आई धरती ऊपरै, सुन्दरता धर रूप ||२२२||

मोर ने कभी यह नहीं जाना कि उसकी वाणी और रूप संसार में दोनों ही अनुपम है | एसा लगता है ,जैसे सुन्दरता सदेह पृथ्वी पर अवतरित हुई है |

मालाणी घोडा भला, पागल जैसाणेह |
मदवा नित बीकाण, नारा नागाणेह ||२२३||

मालाणी प्रदेश के घोड़े श्रेष्ठ होते है तथा जैसलमेर के ऊंट | बीकानेर की गाय तथा नागौर के बैल श्रेष्ठ होते है |

बिन पाणी बाढ़े धरा, पाणी धर तेलोह |
पाणी हिलै न पेटरो, पाणी रो रेलोह ||२२४||

थली(मरुस्थल) का ऊंट रेगिस्तानी भूमि पर बिना पानी के ही जल के प्रवाह की तरह चलता हुआ धरती को पार करता रहता है व उसकी गति इतनी सुस्थिर होती है कि सवार के पेट का पानी भी नहीं हिलता |

डक डक नालियां बाजतां, चालै मधरी चाल |
हवा न पूगै भगतां, ताव पड़न्तां ताल ||२२५||

पैरों की हड्डियाँ के जोड़ों से डक-डक की आवाज करते हुए थली का ऊंट मंद गति से चलना पसंद करता है ,किन्तु समय की मांग का दबाव पड़ने पर इतनी तेज गति से दौड़ता है कि हवा भी उसे नहीं पहुँच सकती ||

हानै चमकै गोरबन्द, पग नेवर झणकार |
पाछै झुमै कामिणी, ओटी राग मलार ||२२६||

ऊंट के अगले भाग पर गोरबंद व पैरों में नेवर की झंकार हो रही है | ऊंट पर अगले होने में सवार बैठा मल्हार गा रहा है व पिछले हाने में बैठी उसकी पत्नी मस्ती से झूम रही है |

स्व.आयुवानसिंह शेखावत

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