ओजस्विता से भरपूर राजस्थानी दोहे हिंदी अनुवाद सहित

केसर निपजै न अठै,
नह हीरा निकलन्त |
सिर कटिया खग झालणा,
इण धरती उपजंत ||

यहाँ केसर नहीं निपजती,और न ही यहाँ हीरे निकलते है | वरन यहाँ तो सिर कटने के बाद भी तलवार चलाने वाले वीर उत्पन्न होते है |

धोरां घाट्यां ताल रो,
आंटीलो इतिहास |
गांव गांव थरमापली,
घर घर ल्यूनीडास ||

यहां के रेतिले टीलों,यहां की घाटियों और मैदानों का बडा ही गर्व पुरित इतिहास रहा है |यहां का प्रत्येक गांव थरमापल्ली जैसी प्रचण्ड युद्ध स्थली है तथा प्रत्येक घर मे ल्यूनीडास जैसा प्रचण्ड योद्धा जन्म चुका है |

सीतल गरम समीर इत,
नीचो,ऊँचो नीर |
रंगीला रजथान सूं ,
किम रुड़ो कस्मीर ? ||

राजस्थान वैविध्य युक्त है | यहाँ कभी ठंडी तो कभी गर्म हवा चलती है तथा पानी भी कहीं उथला तो कहीं गहरा है | ऐसे में रंगीले (हर ऋतू में सुहावने)राजस्थान से कश्मीर (जहाँ सिर्फ शीतल पवन और भूमि की उपरी सतह पर पानी है)किस प्रकार श्रेष्ट कहा जा सकता है ?

उबड़ खाबड़ अटपटी,
उपजै थोड़ी आय |
मोल मुलायाँ नह मिलै,
सिर साटे मिल जाय ||

उबड़-खाबड़,बेढंगी व कम उपजाऊ होते हुए भी यह धरती किसी मोल पर नहीं मिल सकती | परन्तु जो इसके अपने मस्तक का दान करते है उसको यह धरती अवश्य मिल जाती है | अर्थात राजस्थान की यह उबड़-खाबड़ अनुपजाऊ भूमि किसी मुद्रा से नहीं मिलती इसे पाने के लिए तो सिर कटवाने पड़ते है |

लेवण आवे लपकता,
सेवण माल हजार |
माथा देवण मूलकनै,
थोडा मानस त्यार ||

मुफ्त में धन लेने के लिए व धन का संग्रह करने के लिए तो हजारों लोग स्वत: ही दौड़ पड़ते है ,किन्तु देश की रक्षा के लिए अपना मस्तक देने वाले तो बिरले ही मनुष्य होते है |

माल उड़ाणा मौज सूं,
मांडै नह रण पग्ग |
माथा वे ही देवसी ,
जाँ दीधा अब लग्ग ||

मौज से माल उड़ाने (खाने) वाले लोग कभी रण क्षेत्र में कदम नहीं रखते | युद्ध क्षेत्र में मस्तक कटाने तो वे ही लोग जायेंगे जो अब तक युद्ध क्षेत्र में अपना बलिदान देते आये है |

दीधाँ भासण नह सरै,
कीधां सड़कां सोर |
सिर रण में भिड़ सूंपणों,
आ रण नीती और ||

सड़कों पर नारे लगाने व भाषण देने से कोई कार्य सिद्ध नहीं होता | युद्ध में भिड़ कर सिर देने की परम्परा तो शूरवीर ही निभाते है |

रण तज घव चांटो करै,
झेली झाटी एम ||
डाटी दे , धण सिर दियो,
काटी बेडी प्रेम ||

कायर पति रण-क्षेत्र से भाग खड़ा हुआ | इस पर उसकी वीर पत्नी ने उसे घर में न घुसने देने के लिए किवाड़ बंद कर दिए तथा पहले तो पति को कायरता के लिए धिक्कारा व बाद में अपना सिर काट कर पति को दे दिया | इस प्रकार उस कायर पति के साथ जो प्रेम की बेड़ियाँ पड़ी हुई थी उनको उस वीरांगना ने हमेशा के लिए काट दिया |

कटियाँ पहलां कोड सूं,
गाथ सुनी निज आय |
जिण विध कवि जतावियो,
उण विध कटियो जाय ||

वीर कल्ला रायमलोत ने युद्ध-क्षेत्र में जाने से पूर्व कवि से कहा कि -आप मेरे लिए युद्ध का पूर्व वर्णन करो ,ताकि मैं उसी अनुसार युद्ध कर सकूँ |
और उसने कवि द्वारा अपने लिए वर्णित शौर्य गाथा चाव से सुनी और जैसे कवि ने उसके लिए युद्ध कौशल का वर्णन किया था,उस शूरवीर ने उसी भाँती असि-धारा का आलिंगन करते हुए वीर-गति प्राप्त की |

नकली गढ़ दीधो नहीं ,
बिना घोर घमसाण |
सिर टूटयां बिन किम फिरै,
असली गढ़ पर आण ||

यहाँ के वीरों ने बिना घमासान युद्ध किए नकली गढ़ भी शत्रु को नहीं दिया , फिर बिना मस्तक कटाए असली गढ़ शत्रु को भला कैसे सौंप सकते है |

ये थे स्व.आयुवान सिंह शेखावत,हुडील द्वारा लिखे कुछ चुनिन्दा “हटीलो राजस्थान” नामक राजस्थानी दोहे | ओजस्विता से भरपूर राजस्थान के वीरों की वीरता व राजस्थान के जनजीवन ,मौसम,त्योंहारों,मेलों आदि का सुन्दर चित्रण किये ये ढेरों दोहे राजपूत वर्ल्ड पर यहाँ चटका लगाकर पढ़े जा सकते है |

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