हठीलो राजस्थान-45, राजस्थानी दोहे हिंदी अनुवाद सहित

हठीलो राजस्थान-45, राजस्थानी दोहे हिंदी अनुवाद सहित

नभ लहराती बादली, बीजल रेख बणाय |
ज्यूँ काजलिया चीर पर, गोटो कोर खिंचाय ||२६८||

आकाश में घुमड़ती हुई बादली के बीच विद्युत रेखा ऐसी दिखाई दे रही है जैसे काले रंग की ओढ़नी पर गोटे की किनारी जड़ी हो |

सरवर पाल सुहावणी, की सोभा केणीह |
मृग नाचै, लटका करै, मटका मृग नैणीह ||२६९||

ऐसे सरोवर की सुन्दर पाल की शोभा का कैसे वर्णन किया जा सकता है जहाँ पर वर्षा के बाद मस्त हुए मृग क्रीड़ा करते है व मृगनयनी चंचल स्त्रियाँ जल भरने के लिए आती है |

मोर नाचवै खेत में, और ढोर मझ कीच |
छम छम करता छोकरा, नाचै नाडी तीर ||२७०||

खेतों में मोर नाच रहे है तथा कीचड़ में पशु प्रसन्न होकर लोट रहे है | इधर बालक ताल-तलैयों में जल-क्रीड़ा का आनंद ले रहे है |

कुरजां थे आकास में, कित जावो, की काम ?
इण धर रो संदेसड़ो, पहुंचावण उण धाम ||२७१||

हे कुरजां ! तुम आकाश में कहाँ तथा किस काम से जा रही हो ? क्या तुम इस धरती से किसी विरहणी का सन्देश उस स्थान उसके प्रियतम के पास पहुँचाने के लिए जा रही हो |

बूंदा साथै बरसिया , हाथ छुवां मुरझाय |
मखमल जिम मिमोलिया , वसुधा रूप बढ़ाय ||२७२||

वर्षा की बूंदों के साथ बरसने वाली तथा हाथ के छू देने भर से मुरझा जाने वाली मखमल-सी मुलायम वीर-बहती (सावन की तीज) पृथ्वी की शोभा में चार चाँद लगा रही है |

दल बादल सा उमडिया, आथूणा इक साथ |
लांघण राखो टिड्डीयां, बाँधण आवै नाथ ||२७३||

पश्चिम दिशा से टिड्डियों का दल-बादल सा उमड़ता हुआ आ रहा है | हे टिड्डियो ! तुम थोड़ी देर लंघन करलो | तुम्हे बांधने (अभिमंत्रित करने) हेतु नाथ (जोगी) आ रहा है |(नोट-राजस्थान में टिड्डी दल आने पर जोगी उसे अभिमंत्रित कर खेती को विनाश से बचा लेते थे )

लेखक : स्व. आयुवानसिंह शेखावत

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