राजपूत स्त्रियों की सामाजिक स्थिति और उनके गुण

शत्रु से अपने सतीत्व की रक्षा के निमित हजारों राजपूत महिलाएं निर्भयता के साथ जौहर की धधकती हुई आग में जलकर भस्मीभूत हो गई, जिनके ज्वलंत उदाहरण चित्तौड़ की राणी पद्मनी और कर्मवती,चांपानेर के पताई रावल (जयसिंह) की राणियां, जैसलमेर के रावल दूदा की रमणियां आदि अनेक हैं,

राजपूत स्त्रियों की सामाजिक स्थिति और उनके गुण

राजपूत समाज में स्त्रियों का बड़ा आदर होता रहा और वे वीर पत्नी और वीरमाता कहलाने में अपना गौरव मानती थी। उन वीरांगनाओं का पातिव्रत धर्म, शूरवीरता और साहस भी जगद विख्यात है। इनके अनेक उदाहरण इतिहास में पाये जाते हैं, उनमें से थोड़े से यहां उद्धृत करते हैं-
चौहान राजा पृथ्वीराज ने जब महोबा के चंदेल राजा परमर्दिदेव पर चढ़ाई की तो उसके संबंध में यह प्रसिद्ध है कि उस समय उक्त राजा के सामंत आल्हा व ऊदल वहां उपस्थित नहीं थे, वे पहले किसी बात पर स्वामी की अप्रसन्नता हो जाने के कारण कन्नौज के राजा जयचंद के पास जा रहे थे। पृथ्वीराज की सेना से अपनी प्रजा का अनिष्ट होता देख चंदेल राजा की राणी ने आल्हा ऊदल को बुलाने के लिए दूत भेजे। उन्होंने अपने साथ किये हुए पूर्व के अपमान का स्मरण कर महोबे जाना स्वीकार नहीं किया। उस समय उनकी वीर माता ने जो वचन अपने पुत्रों को सुनाये उनसे स्पष्ट है कि राजपूत कुलांगना किस प्रकार स्वामी के कार्य और स्वदेश रक्षा के निमित अपने प्राणों से प्यारे पति और पुत्रों को भी सहर्ष रणांगण में भेजती थी। आल्हा ऊदल की माता अपने पुत्रों का हठ छुड़ाने के हेतु बोली- ‘हे विधाता ! तूने मुझको बांझ ही क्यों न रखी। क्षत्रिय धर्म का उल्लंघन करने वाले इन कुपुत्रों से तो मेरा बांझ रहना ही अच्छा था। धिक्कार है उन राजपूत पुत्रों को, जिनका स्वामी संकट में पड़ा हो और आप सुख की नींद सोवें। जो क्षत्रिय मरने-मारने से डर कर संकट के समय स्वामी की सहायता के लिए सिर देने को प्रस्तुत न हो जाय वह असल का बीज नहीं कहलाता है। हाँ ! तुमने बनाफर वंश की सब कीर्ति डुबो दी।”

 महाराणा रायमल के पाटवी पुत्र पृथ्वीराज की पत्नी तारादेवी का अपने पति के साथ टोडे जाकर पठानों के साथ युद्ध में पति की सहायता करना प्रसिद्ध ही है। रायसेन का राजा सलहदी पूरबिया (तंवर) जब सुल्तान बहादुरशाह गुजराती से परास्त हो मुसलमान हो गया और सुल्तान सुरंगें लगाकर उसके गढ़ को तोड़ने लगा, तोपों की मार से दो बुर्जे भी उड़ गई, तब सलहदी ने सुलतान से कहा कि आप मेरे बाल बच्चों और स्त्रियों को न सताइये, मैं गढ़ पर जाकर लड़ाई बन्द करवा दूंगा। सुल्तान ने मलिकअली शेर नामक अफसर के साथ उसको गढ़ पर भेजा। उसकी राणी दुर्गावती ने, जो राणा सांगा की पुत्री थी, अपने पति को देखते ही धिक्कारना शुरू किया और कहा- “ऐसी निर्लजता से तो मर जाना ही अच्छा है, मैं अपने प्राण तजती हूं, यदि तुमको राजपूती का दावा हो तो हमारा वैर शत्रुओं से लेना। ‘राणी के इन वचन वाणों ने सलहदी के चित्त पर इतना गहरा घाव लगाया कि वह तुरन्त अपने भाई लोकमल (लोकमणि) और 100 संबंधियों समेत खङ्ग खोलकर शत्रुओं से जूझ मरा। राणी ने भी सात सौ राजपूत रमणियों और अपने दो बच्चों सहित प्रचण्ड अग्निज्वाला में प्रवेश कर तन त्याग दिया।

मारवाड़ के महाराजा जसवन्तसिंह जब औरंगजेब से युद्ध में हारकर फतिहाबाद के रणखेत से अपनी राजधानी जोधपुर को लौटा तब उसकी पटराणी ने गढ़ के द्वार बंद कर पति को भीतर पैठने से रोका था।
इसी प्रकार शत्रु से अपने सतीत्व की रक्षा के निमित हजारों राजपूत महिलाएं निर्भयता के साथ जौहर की धधकती हुई आग में जलकर भस्मीभूत हो गई, जिनके ज्वलंत उदाहरण चित्तौड़ की राणी पद्मनी और कर्मवती,चांपानेर के पताई रावल (जयसिंह) की राणियां, जैसलमेर के रावल दूदा की रमणियां आदि अनेक हैं, जो आगे इस इतिहास में प्रसंग-प्रसंग पर बतलाये जायेंगे। परदे की रीति भी राजपूतों में पहले इतनी कड़ी नहीं थी जैसे कि आज है। धर्मोत्सव, युद्ध और शिकार के समय में भी राणियां राजा के साथ रहती थी और राज्याभिषेक आदि अवसरों पर पति के साथ आम दरबार में बैठती थी। पीछे से मुसलमानों की देखा-देखी परदे का कड़ा प्रबन्ध राजपूतों में होने लगा और उन्हीं का अनुकरण पीछे से राजकीय पुरुषों तथा धनाढय वैश्य आदि जातियों में भी होने लगा।

लेखक : रायबहादुर गौरीशंकर हीराचंद ओझा अपनी पुस्तक “राजपूताने का प्राचीन इतिहास” में

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