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राजपूत नारियों की साहित्य साधना

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भारतीय इतिहासकारों ने शासक जाति राजपूत नारियों के द्वारा शासन सञ्चालन में योगदान, युद्ध बेला में शत्रु सामुख्य जौहर तथा शाकों में आत्म-बलिदान और पति की मृत्यु पर चितारोहण कर प्राण विसर्जन करने आदि अति साहसिक कार्यों पर तो प्रकाश डाला है परन्तु उनके द्वारा सर्वसाधारण के हितार्थ किये गए विशिष्ट सेवा कार्यों की ओर तनिक भी विचार नहीं किया है|

राजपूत नारियों ने राजस्थान के नगरों,कस्बों और गांवों में हजारों की संख्या में मंदिरों, मठों, पाठशालाओं, कूपों, वापिकाओं, प्रपातों का निर्माण करवाया है| सर्वजन हिताय: के लिए नारियों की यह देन वस्तुत: महत्त्व की है| इसी प्रकार स्थापत्य कला के अतिरिक्त साहित्य, संगीत और चित्रकला के विकास अभिवर्धन और प्रोत्साहन के क्षेत्र में भी क्षत्रिय नारियों की समाज के लिए एक विशेष देन के रूप में विचारणीय विषय है| रियासतों में इन कलाओं के विकास और संरक्षण के लिए “गुणीजन खाने” थे और इस विभाग के अनवरत उस दशा में कार्य होते रहते थे| संगीत और चित्रकला के लिए स्थाई विभाग होते थे| सार्वजनिक त्योंहारों, पर्वों और राजा, ठाकुरों, कुमारों के जन्मोत्सव, राजसी दरबारों, दावतों और राजकीय अतिथियों के स्वागत सत्कार समारोहों पर संगीत, नृत्य और वाध्य कला के रंगारंग कार्यक्रम रखे जाते थे| प्रत्येक कला के विशारद अपनी कला का प्रदर्शन करते और दृव्य व सम्मान प्राप्त करते थे|

पुरुष समाज के लिए आयोजित समारोहों की भांति ही नारी-समाज द्वारा अंत:पुरों में भी ऐसे समारोहों तथा कार्यक्रमों के आयोजन किये जाते थे| ऐसे आयोजन राज-परिवारों और उनके पारिवारिक अतिथियों तक ही सीमित थे| राजा की पत्नियाँ जो अनेक होती थी, वे ऐसे आयोजनों पर स्वयं राजा और अन्य रानियों तथा परिवार के सदस्यों को आमंत्रित करती थी| इन अवसरों पर महारानियां, ठकुरानियाँ, और नारी गायिकाएं अपनी कला का प्रदर्शन करती थी| ग्राम्य समाज में तो गणगौर के उत्सव, पुत्र-पुत्रियों के विवाहों आदि मांगलिक अवसरों पर यह परम्परा आज भी जीवित है| यही नहीं विवाह के अवसर पर तो नारियां दामाद के मनोरंजन के लिए अनेक प्रकार के स्वांग और तमाशों, ख्यालों का भी स्वयं प्रदर्शन करती है| रानियाँ, महारानियां, ठकुरानियाँ स्वयं वाध्य-यंत्र, नृत्य और राग-रागनियों में महारत रखती थी| वे अवसरानुकूल स्वयं गीत, पद, भजन, हरजस आदि का सर्जन करती और फिर समारोहों पर उन्हें नारी गवैयों द्वारा प्रसारित करती| परन्तु ऐसे आयोजनों पर राजकीय मान-सम्मान आदि मर्यादाओं का पूर्णत: पालन होता था|

इस विस्तृत विषय की इस सामान्य भूमिका के पश्चात् नारी जाति की साहित्यिक देन पर ही यहाँ सार रूप में विचार किया जा रहा है जिससे साहित्येतिहासकारों का ध्यान इस ओर भी आकृष्ट हो सकें|

सौभाग्य सिंह शेखावत, भगतपुरा
(लेखक राजस्थान के इतिहास व राजस्थानी भाषा के मूर्धन्य साहित्यकार, इतिहासकार है|)

नोट : राजपूत नारियों की साहित्य साधना की अगली कड़ी में हिंदी साहित्य में सर्वाधिक चर्चित, स्थापित और प्रसिद्धि प्राप्त भक्त कवियत्री लोकनिधि मीरांबाई का परिचय दिया जायेगा|

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7 COMMENTS

  1. आओ फिर दिल बहलाएँ … आज फिर रावण जलाएं – ब्लॉग बुलेटिन पूरी ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से आप सब को दशहरा और विजयादशमी की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनायें ! आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है … सादर आभार !

  2. अगले आलेख की सूचना देना थोड़ा सा चकित करता है.
    यानी कि आप पहले से सोचकर चलते हैं.
    पर अच्छा लगा यह जानकार कि आप मीरा जी पर अगला आलेख ला रहे हैं.

  3. विजयादशमी की; अब यहाँ हिंदी शब्द लिखना ठीक मालूम नहीं पड़ रहा है; अतएव अंग्रेजी शब्द को ही हिंदी में लिखते हुए; "बिलेटेड" बधाई….. सुन्दर रचना

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