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Thursday, September 29, 2022

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राजपुरोहित मोड़सिंह : स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा

राजपुरोहित मोड़सिंह खरवा राजघराने के राज पुरोहित थे। पढ़े लिखे साधारण, बिल्कुल छठी सातवीं कक्षा तक। परन्तु गजब की स्मरण शक्ति और वाक्चातुरी प्रभु ने उन्हें दी। पुरानी ख्यातों और बातों के जानकार, सभाचतुर हर विषय पर विशेषज्ञ की भांति बोलने वाले, देश की तत्कालीन राजनैतिक गतिविधियों के दृष्टा व समीक्षक और ठिकानों में चलते रहने वाले प्रपंचों में दिलचस्पी लेने वाले थे पुरोहित मोड़सिंह । भारत सेवा संघ के अध्यक्ष रामनारायण चौधरी ने अपनी पुस्तक “वर्तमान राजस्थान” में पुरोहित मोड़सिंह, खरवा के संबंध में लिखा है कि वे राव गोपालसिंह जी के विश्वस्त आदमी थे। पथिक जी के पुराने साथी और सहयोगी थे। बहुत कम पढ़े-लिखे, परन्तु बड़े साहसी और होशियार थे। दरअसल बेगूं किसान आन्दोलन की जाजम शुरू में उन्होंने ही जमायी थी। बिजोलिया किसान आन्दोलन की भांति बेगूं ठिकाने के किसानों ने भी आन्दोलन किया था। उसके प्रथम संचालक के रूप में राजपुरोहित मोड़सिंह ने ख्याति प्राप्त की थी। अपने समय के वे ही एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें खरवा राजघराने की पिछली कई पीढ़ियों का दन्तकथाएँ-मिश्रित इतिहास ज्ञात था।

प्रथम भेंट में ही आगन्तुक व्यक्ति पर अपनी बुद्विमता और कार्यकुशलता की छाप डालने में वे माहिर थे। जिन्दादिली उनमें कूट-कूट कर भरी थी। अपनी अस्सी वर्ष की अवस्था में भी वे कभी गंभीर तथा उदास नहीं देखे गए। वे बालकों के साथ बालक, जवानों के साथ जवान, वृद्धों में वृद्ध और सन्यासियों में सन्यासी थे। पाली (मारवाड) जिले की राजपुरोहित सभा के मानीता अध्यक्ष थे। जीवन के अन्तिम वर्षों में अपने उन्हीं अद्भुत गुणों और कार्यकलापों के कारण जोधपुर के तत्कालीन महाराजा हनुवन्तसिंह तक उनकी पहुँच हो गई थी। महाराजा ने प्रसन्न होकर भ्रमणार्थ उन्हें एक जीप प्रदान (Jeep) की थी। खरवे का (पिछले शासकों का) इतिहास तैयार करने में उनसे सुनी हुई परम्परागत अनेक बातों से लेखक को काफी सहायता मिली थी, जिसके लिए उनका आभार प्रदर्शित करना आवश्यक है। 88 वर्ष की दीर्घायु प्राप्त करके 6 अप्रेल सन् 1961 ई. में उस ज्ञानी व बहुश्रुत पुरोहित मोड़सिंह का देहान्त हो गया।

ठाकुर सुरजनसिंह शेखावत, झाझड़ द्वारा लिखित पुस्तक “राव गोपालसिंह खरवा” से साभार

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1 COMMENT

  1. राजपुरोहित नही ठाकुर थे, राजपूत थे, राठौड़ थे राजपुरोहित तो पंडित होते है पंडितो में इतना दम नहीं होता हैं कि ट्रेन को काट डाले, पंडे सिर्फ लड़वाना और लोगो से कर्म कांडो और अंधविश्वासी बनाकर पैसे हड़पना आता है

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