यूँ स्थानीय होते जा रहे हैं राष्ट्रीय अख़बार

यूँ स्थानीय होते जा रहे हैं राष्ट्रीय अख़बार

प्रदेश के दो बड़े अख़बार हम अपने घरों में इसलिए मंगवाते हैं ताकि हमें देश विदेश की ख़बरें पढने को मिल सके| लेकिन आजकल इन कथित बड़े अख़बारों में देश विदेश तो छोड़िये प्रदेश की राजधानी तक की पूरी ख़बरें नहीं पा रही है| यदि कल ही राजधानी जयपुर के पत्रकारों से जुड़ी एक बड़ी घटना की चर्चा करूँ तो मुझे अपने गांव में उस घटना की खबर भास्कर जैसे बड़े अख़बार में पढने को नहीं मिली| मैं बात कर रहा हूँ कल विधानसभा में पत्रकारों पर कुछ पाबंदियां लगाने को लेकर पत्रकारों द्वारा विधानसभा की कवरेज का बहिष्कार करने की खबर का|

यह खबर मुझे कल सोशियल मीडिया और जयपुर के कुछ पत्रकार मित्रों के माध्यम से मिल चुकी थी, अत: सुबह अख़बार आते ही पूरा अख़बार छान मारा लेकिन पत्रकारों द्वारा विधानसभा का बहिष्कार करने की खबर मुझे पढने को नहीं मिली| जबकि यह खबर कोई छोटी खबर नहीं थी, पत्रकारों द्वारा बहिष्कार करने के बाद विधानसभा की कार्यवाही दिखाने के लिए यूट्यूब का सहारा लिया गया, फिर भी हम तक ख़बरें पहुँचाने वाले पत्रकारों की खबर मुझे सीकर जिले में पढने को नहीं मिली, जबकि यह खबर जयपुर जिले के संस्करणों में छपी बताई|

जो जाहिर करती है कि जिन अख़बारों को हम राष्ट्रीय समझकर खरीदते है, घर में मंगवाते हैं उन अख़बारों में हमें जब प्रदेश स्तर की महत्त्वपूर्ण खबर ही पढने को नहीं मिली तो समझिये कि ये अख़बार मात्र स्थानीय हो चुकें हैं या फिर इनमें वही ख़बरें छपती है जो सरकार को खुश कर सके| चूँकि उक्त घटना सीधे प्रदेश सरकार से जुड़ी है और पत्रकारों के सम्बन्ध में विधानसभा अध्यक्ष का आदेश बड़े अख़बारों के पत्रकारों को ज्यादा प्रभावित नहीं करता, अत: हो सकता है छोटे अख़बारों को अपना प्रतिद्वंदी समझ बड़े अख़बारों ने सिर्फ स्थानीय संस्करणों में खबर छाप कर इतिश्री करली ताकि छोटे अख़बारों के पत्रकारों का मुद्दा प्रदेशव्यापी नहीं बने|

इस घटना से आप अख़बारों की निष्पक्षता और उनकी सामाजिक सरोकारों के प्रति सोच को आसानी से समझ सकते है कि जब पत्रकारों से जुड़ी महत्त्वपूर्ण खबर हमें राजधानी जयपुर से बाहर पढने को नहीं मिली तो सरकार के खिलाफ सामाजिक सरोकारों वाली कई महत्त्वपूर्ण ख़बरें हम तक नहीं पहुँचती होगी|

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