युवराज सूरजमलजी जिन्हें इस कारण नहीं मिली आमेर की गद्दी

युवराज सूरजमलजी आमेर के राजा पूरणमलजी के पुत्र थे | राजा पूरणमलजी शिखरगढ़ युद्ध में शेखावतों की सहायतार्थ हुमायूँ के छोटे भाई मिर्जा हिंदाल के साथ युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे | मिर्जा हिंदाल ने शेखावत राज्य अमरसर पर आक्रमण किया था | राजा पूरणमलजी शेखावतों के पक्ष में युद्ध करने आये और माघ सुदी 5, वि.सं. 1590 को वीरगति को प्राप्त हो गये | उस वक्त युवराज सूरजमलजी महज दो वर्ष के थे और अपनी माता राणी राठौड़जी के साथ ननिहाल मेड़ता में थे | राणी राठौड़जी को राजा पूरणमलजी के बड़े भाई भींवजी पर शंका थी, अत: वे बाल युवराज सूरजमलजी को सुरक्षा की दृष्टि से आमेर नहीं लाई |

भींवजी राजा पृथ्वीराजजी के बड़े पुत्र थे, पर पिता की इच्छानुसार राज्य छोटे पुत्र पूरणमलजी को मिला था | युवराज सूरजमलजी को आमेर ना लाने की वजह से आमेर के सरदारों ने भींवजी को आमेर का राजा बना दिया | सूरजमलजी का बाल्यकाल मेड़ता में बीता | वयस्क होते ही सूरजमलजी ने आमेर का राज्य वापस पाने के लिए संघर्ष शुरू कर दिया | तब तक आमेर की गद्दी पर राजा भारमल का शासन हो गया था | सूरजमलजी ने मेवात के हाजी खां की सहायता लेकर आमेर पर आक्रमण किया | राजा भारमलजी की हार हुई पर चतुर भारमलजी ने हाजी खां से संधि की और सेना को लौटा दिया |

सूरजमलजी ने फिर आमेर पर हमला किया | उनके साथ शेखावत लूणकरणजी व मेवात का सूबेदार मिर्जा सरफुद्दीन था | इस सेना ने सन 1561 ई. में आमेर पर आक्रमण किया | राजा भारमल मुकाबला करने में असमर्थ थे अत: उन्होंने फिर अपनी चतुराई दिखाई और मिर्जा सरफुद्दीन से संधि कर ली | सूरजमलजी का प्रयोजन फिर सफल नहीं हुआ | सूरजमलजी के अलावा इसी परिवार के आसकरणजी ने भी आमेर के खिलाफ विद्रोह का झंडा उठा रखा था | अत: इस गृहकलह से निपटने के लिए राजा भारमलजी ने सन 1562 ई. में बादशाह अकबर से संधि कर ली | सूरजमलजी भी अकबर के पास सहायता के लिए गये, तब अकबर ने उन्हें दौसा की जागीर दे दी|

दौसा में रहते हुए सूरजमलजी ने आमेर पाने की अभिलाषा में मेड़ता व शेखावतों की सेना का साथ लेकर फिर आमेर पर चढ़ाई की | राजा भारमल ने लाला नरुका के नेतृत्व में सेना भेजी | लाला नरुका ने समझौता कराने का प्रयास किया और षड्यंत्र में माध्यम से सूरजमलजी को जहर दिलवाकर उनकी हत्या करवा दी |

सूरजमलजी को आज स्थानीय लोग भौमियाजी के रूप में लोक देवता मानते हुए पूजते हैं | दौसा किले की तलहटी में दो मंजिला छोटा गढ़ बना है इसी गढ़ में सूरजमलजी भौमिया का स्थान (मंदिर) बना है जहाँ नित्य भक्तगण दर्शनार्थ आते हैं | विशेषकर सोमवार को भक्तगण ज्यादा संख्या में आते हैं | अश्विनी मास की विजयदशमी को यहाँ मेला भरता है, जिसमें दूरदराज के लोग भौमियाजी की पूजा आराधना करने व मन्नत मांगने आते हैं | वंशावलियों में मिर्जा राजा जयसिंहजी व महाराज शिवाजी के मध्य हुई संधि में इन्हीं भौमियाजी की भूमिका व चमत्कार के बारे में लिखा है, जिसका जिक्र अगले लेख में |

सन्दर्भ : पांच युवराज, लेखक : छाजूसिंह

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