युवराज जगतसिंह आमेर जो नहीं बैठ सके सिंहासन पर

युवराज जगतसिंह आमेर के राजा मानसिंहजी के ज्येष्ठ पुत्र थे | इनका जन्म कार्तिक सुदी १ वि.सं. 1625 (ई.सं. 1568) को आमेर की रानी कनकावती की कोख से हुआ था | रानी कनकावती जैतारण के राठौड़ रतनसिंह उदावत की पुत्री थी | कुंवर जगतसिंह 12 वर्ष की उम्र में ही मुग़ल दरबार में जाने लगे थे | इसी समय में ही इन्होंने विद्रोही खानजादों का दमन कर शौर्य प्रदर्शित किया | कांगड़ा के राजा मलूकचंद को परास्त करने पर बादशाह अकबर ने इन्हें नागौर की जागीर दी | कुंवर जगतसिंह ने अपने से बड़ी व विशाल भट्टी नबाब की सेना पर आक्रमण कर उसे परास्त किया था |

युवराज जगतसिंह ने अपने पिता राजा मानसिंहजी के साथ काबुल, कंधार, बिहार, बंगाल, उड़ीसा, आसाम आदि स्थानों के सैनिक अभियानों में भाग लिया और पिता द्वारा सौंपी महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई | राजा मानसिंहजी ने अफगानों कबीलों के दमन अभियान में भी कुंवर जगतसिंह को अकेले जिम्मेदारियां दी थी, जिन्हें उन्होंने बड़ी कुशलता से निभाया | बिहार में जब राजा मानसिंहजी पठानों को दबाने के अभियान में लगे थे तब बंगाली विद्रोहियों ने पटना पर आक्रमण किया, तब 22 वर्षीय कुंवर जगतसिंह ने पटना की रक्षा की | सुल्तान कुली कलमक और ककेना जो शक्तिशाली शासक थे, बंगाल में मोरघाट से बढे और ताजपुर तथा पूर्णिया के भागों को लूट लिया | उन्होंने दरभंगा नगर को घेर लिया तब दरभंगा का जागीरदार फर्रुख खान डर के मारे भाग कर जगतसिंह की शरण में पटना चला आया था | उत्तरी बिहार की रक्षा का दायित्व जगतसिंह ले पास था, जो उन्होंने बखूबी निभाते हुये वहां हुए विद्रोहों को सफलतापूर्वक दबा दिए |

कुंवर जगतसिंह ने शाहपाल, खारगढ़, कुलापुरा, कहनान, लोनगढ़ और भीनमाल आदि किलों पर भी सैन्य कार्यवाही की थी | जलेसर, रायपुर, विष्णुपुर आदि स्थानों पर आक्रमण कर विद्रोही पठानों के ठिकाने नष्ट किये | हाजीपुर का विद्रोही सुल्तान जगतसिंह से डर कर भाग गया था | ई.सं. 1590 में राजा मानसिंहजी ने उड़ीसा के अफगान नबाब कुतुल खां के खिलाफ कुंवर जगतसिंह के नेतृत्व में एक सेना भेजी | इस युद्ध में कुंवर जगतसिंह बुरी तरह घायल होकर बेहोश हो गये और उनकी सेना परास्त हुई | घायल कुंवर को नबाब कुतुलखां की पुत्री ने उठवाया और अपने पिता को बिना बताया, उनका उपचार करवाया | कुंवर के ठीक होने पर मरियम नाम की उस लड़की ने कुंवर जगतसिंह को विष्णुपुर के राजा हमीर के पास भेज दिया |

कुछ समय बाद कुतुलखां की मृत्यु हो गई और उसके पुत्र ने राजा मानसिंहजी की अधीनता स्वीकार कर ली | अपनी सेवा से प्रभावित कुंवर जगतसिंह ने कुतुल खां की पुत्री मरियम को अपनी पासवान बना लिया | उसे पासवान बनाने को लेकर राजा मानसिंहजी कुंवर से खासे नाराज हो गये, बेगम मरियम को आमेर के महलों में प्रवेश नहीं दिया गया, उसके लिए महलों से दूर एक अलग महल बनवाया गया जो बेगम मरियम के महल से जाना गया | सन 1598 में राजा मानसिंहजी अपने पुत्र हिम्मतसिंह की मृत्यु और बंगाल की ख़राब जलवायु से खिन्न होकर अजमेर आ गये | तब बादशाह ने कुंवर जगतसिंह को बंगाल का सूबेदार बनाकर भेजा | जहाँ किसी सैन्य अभियान में कार्तिक सुदी 1 वि.सं. 1655 (6 अक्टूबर सन 1599 ई.) को उनकी मृत्यु हो गई |

युवराज जगतसिंह की मृत्यु राजा मानसिंहजी के लिए गंभीर आघात था, क्योंकि वे उनके सबसे योग्य व ज्येष्ठ पुत्र व आमेर के युवराज थे | इस तरह आमेर के युवराज कुंवर जगतसिंह आमेर की गद्दी पर बैठने से पहले ही इस दुनिया से विदा हो गये | आमेर में  प्रसिद्ध जगत शिरोमणि मंदिर युवराज जगतसिंह की स्मृति में ही बना है |

सन्दर्भ पुस्तक : “पांच युवराज” लेखक : छाजूसिंह, बड़नगर

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