24.3 C
Rajasthan
Friday, January 21, 2022

Buy now

spot_img

युद्ध में शकूरियों के दूध ने किया था ये कमाल

युद्ध के समय दूध की बात अक्सर चर्चा में रहती है, जैसे अपनी माँ का दूध पिया है तो मुकाबला कर, मैंने शेरनी का दूध पिया है, युद्ध में छठी का दूध याद दिला देंगे आदि आदि| इस तरह युद्ध के मैदान में माँ के दूध की चर्चा होती है| लेकिन आज हम एक ऐसे युद्ध की बात कर रहे है जिसमें शकूरियों के दूध ने कमाल कर दिया था| शकूरियों के दूध से भरमाई दुश्मन सेना वर्षों से चल रहे घेरे को छोड़कर दिल्ली पलायन करने लगी| एक तरह से कहा जाय कि शकूरियों के दूध ने वर्षों से जैसलमेर किले पर घेरा डाले पड़ी बादशाही सेना को घेरा उठाने पर बाध्य कर दिया|

जी हाँ हम बात कर रहे है जैसलमेर किले पर बादशाही सेना के आक्रमण की| जैसा कि हमने इस पूर्व लेख में आपको जानकारी दी थी कि जैसलमेर के रावल दूदा और उनके भाई तिलोकसी ने इतिहास में नाम दर्ज कराने के लिए बादशाही सेना से पंगा लिया और उसके बाद बादशाही सेना ने जैसलमेर पर आक्रमण कर दिया| आपको बता दें रावल दूदा सन 1295 से 1306 ई. तक जैसलमेर के शासक रहे थे| दूदा के भाई तिलोकसी द्वारा बादशाही क्षत्रों में लूटपाट के बाद उन्हें सजा देने के लिए बादशाही सेना ने वर्षों तक जैसलमेर किले को घेरे रखा| इस पर राजस्थान के प्रथान इतिहासकार मुंहता नैणसी ने अपनी ख्यात में लिखा है-

“रावल दूदो, तिलोकसी गढ़ ऊपर है, और पादशाही फ़ौज तलहटी में, इस विग्रह के चलते बारह वर्ष बीत गए, धावे कई बार मारे परन्तु गढ़ हाथ न आया| एक दिन रावल दूदा ने रड़ी की ग्रामशकूरियों के दूध की खीर बनवाकर पत्तलों के लगवाई और वे पत्तलें तलहटी में फिंकवा दी| सैनिक जनों ने उनको ले जाकर अपने सरदार को दिखलाई, तब सेनापति ने विचारा कि बारह वर्ष बीत गए तो भी अब तक गढ़ में इतना संजय है कि अब तक दूध दही खाते हैं| अत: यह गढ़ हाथ आने का नहीं| यह समझकर तुर्कों ने अपने डेरे उठा लिए| उस वक्त जसहड़ के पुत्र आसकर्ण के बेटे भाटी भीमदेव ने उनको भेद दिया, कोई कहते है सहनाई बजवा कर कुछ रहस्य प्रकट किया और ऐसा भी कहते है कि आदमी भेजकर कहलाया कि गढ़ में संचय अब टूट गया है| तुमने जो दूध देखा सो तो भंडशूरियों का था, तुम पीछे फिरो, दो तीन दिन में रावल गढ़ के दरवाजे खोल देगा| तब तुर्क पीछे लौटकर आये| अब रावल दूदा तिलोकसी ने मरने का निश्चय कर लिया|”

इस तरह शकूरियों के दूध की खीर देखकर दुश्मन सेना भ्रमित हो गई कि वर्षों के घेरे के बाद भी किले में दूध दही खाया जा रहा है और वे जीत की आस छोड़ घेरा उठाने लगी| बेशक भेदिये द्वारा भेद देने के बाद रावल दूदा को जौहर शाका कर अपने प्राणों का उत्सर्ग करना पड़ा, लेकिन शकूरियों के दूध ने तो अपना जलवा दिखा ही दिया था, यदि भेदिया भेद ना देता तो शकूरियों के दूध से भ्रमित दुश्मन सेना पलायन कर चुकी होती और जैसलमेर किले में जौहर व साका नहीं होता|

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Stay Connected

0FansLike
3,125FollowersFollow
19,100SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles