यहाँ के वीरों के आगे भी भागी थी हुमायूँ की सेना

यहाँ के वीरों के आगे भी भागी थी हुमायूँ की सेना

मुग़ल शासकों ने भारत में अपने राज्य की जड़ें ज़माने व उसे मजबूत करने के उद्देश्य से हर छोटे-बड़े राज्य को अधीन करने के लिए सेनाएं भेजी| इसी श्रंखला में हुमायूँ की नजर राव शेखाजी द्ववारा स्थापित नवराज्य शेखावाटी पर पड़ी| हुमायूँ ने शेखावाटी के शासक राव रायमल जी के अपने सन्देश वाहक भेजकर कहलाया कि- “उसकी चाकरी करो और बादशाह से मिलो|”  जोधपुर के राजा जसवंतसिंह के दीवान रहे फौजचंद भंडारी ने किसी पुराणी ख्यात की नक़ल की थी, उस ख्यात में यह घटना दर्ज है| ख्यात के अनुसार- राव रायमल जी के बड़े भाई दुर्गाजी के पुत्र जैता जी ने इन सन्देश वाहकों को बादशाह के नाम यह सन्देश देकर टरका दिया कि- “हमारे पास कोई बड़ा देश नहीं है, फिर भी बादशाह कहेंगे वैसा कर लेंगे|”

बादशाह समझ गया कि शेखावाटी के ये स्वाभिमानी वीर आसानी से अधीनता स्वीकार नहीं करेंगे, अत: उसने मुग़ल महाबेग को दस हजार घुड़सवारों के साथ शेखावटी के शेखावतों को रोंद कर अधीनता स्वीकार करने भेजा| महाबेग ने फिर राव रायमल जी को कहलाया कि बादशाह की चाकरी करो, नहीं तो तुम्हारा देश उजाड़ दिया जायेगा| राव रायमल जी ने सभी स्वजातियों से सलाह कर फैसला करने का समय माँगा ताकि समय पाकर सैन्यबल एकत्र किया जा सके| राव रायमल जी ने एक तरफ वार्ता जारी रखी, दूसरी तरफ सैन्य सहायता के लिए घुड़सवारों को चारों और भेज दिया| शीघ्र ही शेखावत वीर युद्ध के लिए एकत्र हो गए और मुग़ल महाबेग पर अचानक आक्रमण कर दिया|

अचानक हमले में मुग़ल सेना के 200 सैनिक मारे गए और महाबेग भाग खड़ा हुआ| इस हार के बाद हुमायूँ ने मेवात से अपने भाई हिंदाल को सेना देकर भेजा| 1533 ई. में हिंदाल ने राव रायमल के शिखरगढ़ को घेर लिया| रायमल को इस संभावित हमले का शायद अंदेशा था अत: किले में युद्ध सामग्री पहले से एकत्र की जा चुकी थी| बड़ी सेना का मुकाबला का करने के लिए आमेर सहायता का सन्देश भेज दिया गया| आमेर के राजा चन्द्रसेन जी ने अपने कुंवर कुम्भा जी के नेतृत्व में सेना भेजी| दोनों पक्षों के मध्य युद्ध हुआ| कुंवर कुम्भा जी अप्रत्याशित वीरता का प्रदर्शन करते हुए शहीद हो गए| हिंदाल को पराजित होकर भागना पड़ा|

सन्दर्भ : शेखावाटी प्रदेश का राजनैतिक इतिहास; रघुनाथसिंह कालीपहाड़ी

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