यदि राजपूतों का ये सामाजिक ढांचा बरक़रार रहता तो…

यदि राजपूतों का ये सामाजिक ढांचा बरक़रार रहता तो…

राजपूत कुलों का सामाजिक ढांचा कमोवेशी अपने पूर्वजों के संघीय ढांचे पर ही आधारित था। डा. वासुदेव शरण अग्रवाल ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘पाणिनि कालीन भारत’ में लिखा है कि गणतंत्री कुलों में संघ रूप से शासन में भाग लेने का सभी को अधिकार था। पिता की मृत्यु पर उसके पुत्र का विधिवत अभिषेक होता था। वे सभी मूद्र्धाभिषिक्त राजन्य होते थे। जन्म और कुल – इन दोनेां बातों में सब एक दूसरे के सर्वथा समान होते थे। कोई भी किसी प्रकार की विशिष्टता का दावा नहीं कर सकता था। उनके आधार केवल उनके कुल थे।

मध्ययुगीन राजपूत कुलों का सामाजिक संगठन या जातीय ढांचा भी प्रायः अपने पूर्वजों की भांति समानता के नियमों पर ही आधारित था। जन्म और कुल के हिसाब से राजपूतों में राजा और साधारण राजपूत में कोई भेद नहीं माना जाता था। साधारण श्रेणी का राजपूत भी उसी कुल का होने पर राजगद्दी का हकदार निःसंकोच बनाया जा सकता था। राज्य – राजा अकेले की बपौती न मानी जाकर सारे कुल का पैतृक राज्य माना जाता था। उनके राज्य उनके  कुलों के नामों पर पुकारे जाते थे, नाकि राजाओं के नाम पर। राठौड़ का राज्य,कछवाहो का राज्य, चैहानों का राज्य आदि नाम उसी तथ्य के द्योतक हैं। उन कुलों के पूर्व पुरुषों ने उन राज्यों की स्थापना की थी। वस्तुतः वे राज्य उन कुलों की ही बपौती थे। राजा तो उन कुल के मुखिया या प्रतिनिधि के रूप में प्रतिष्ठित था। ‘रिड़मलां थापिया तिका राजा’ – जिसे कुल वाले मान्यता देते वही राजा बनाया जाता था। शिशोदियों, कछवाहों, राठौड़ों और भाटियों के इतिहासों में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं।

मुस्लिमकाल में राजपूतों के उस संघीय ढांचे में अनेक बदलाव आए, किन्तु तब भी उनका मूल ढांचा, संघीय प्रणाली के समानता वाले सिद्धान्तों पर ही ज्यादा आधारित रहा। अपने कुलों का गर्व और अभिमान राजपूतों में अपने राजाओं की अपेक्षा अधिक मात्रा में विद्यमान था। राज्य-गद्दी से अति दूर का रक्त सम्बन्ध होते हुए भी- वे अपने कुल के नाम पर – उसके गौरव की रक्षार्थ प्राणों की आहुतियां देने में किसी से पीछे नहीं रहे। यह उस प्राचीनकाल से चले आते हुए संघीय ढांचे की विशेषता थी। यही वह संजीवनी औषधी थी, जिससे अनुप्राणित होकर उस काल के राजपूत देश, धर्म और कुल गौरव की रक्षार्थ बलिदानों की परम्परा स्थापित करते आए थे।

 गत पिछली शताब्दियों में मुगलों के सम्पर्क में आने पर – मुगल दरबार की शानोशौकत, तड़क-भड़क और तौरतरीकों ने उन्हें अवश्य प्रभावित किया। उनकी देखादेखी एक छत्र निरंकुश शासक बनने की लालसा उनमें जागृत हुई। उनके पुराने संघीय ढांचे में विकृति पैदा हुई, जिसके परिणामस्वरूप राजा और उसके भाई बांधवों के मध्य संघर्ष शुरू हुए देश में अराजक स्थिति का निर्माण हुआ। अन्त में ब्रिटिश शासनकाल (सन् 1818 ई.) में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ हुई सुरक्षा संधियों ने राजाओं को सुरक्षा की गारण्टी देकर उन्हें उनके कुलों के मूल ढांचे और संगठन से अलग थलग बना दिया। उपर्युक्त स्थिति के निर्मित होने के बाद भी, राजा तो नहीं – किन्तु राजपूत, उन राज्यों को अपने पूर्वजों से चली आ रही बपौती मान कर गर्व करते रहे और राज्य गद्दी पर आरूढ होने वाले मुखिया के प्रति वफादार बने रहे। किन्तु उनकी उक्त भावना को समझने और उसका आदर करने का प्रयत्न उस काल के राजाओं ने कभी नहीं किया।

अब राज्यतंत्र समाप्त हो चुका है। राजपूत कुलों के – संघीय ढांचे पर आधारित राज्य भी इतिहास की चर्चा के विषय बन कर रह गए हैं। किन्तु जब तक उनके कुलों के राज्य कायम थे – उनमें उनके पूर्वजों के संघीय ढांचे के अनुरूप अनेक गुण विद्यमान थे।

लेखक : ठाकुर सुरजनसिंह शेखावत, झाझड़

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