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Thursday, September 29, 2022

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मोदी पर सटीक बैठती है ये राजस्थानी कहावत

राजस्थान में एक कहावत है “खीरां आई खिचड़ी अर टिल्लो आयो टच्च” मतलब खिचड़ी पकते ही टिल्ला खाने के लिए झटके से मौके पर आ गया| इस कहावत में टिल्ला शब्द ऐसे लोगों के लिए प्रयुक्त किया गया है जो काम के वक्त तो इधर-उधर होते है पर उनकी नजर हमेशा फायदे को ताकती रहती है दूसरों द्वारा किये काम का जब फल मिलने का अवसर आता है तब वे मौके पर काम करने वालों से पहले हाजिर होते है|

भाजपा में मोदी-आडवाणी के बीच आजकल चल रहा प्र.म. पद के उम्मीदवार की रस्सा कस्सी वाला खेल देखते हुए मुझे यह कहावत मोदी पर सटीक बैठती दिखती है|

अब देखिये ना दो सीटों पर सिमटी भाजपा को आडवाणी ने अपनी मेहनत के बल पर सत्ता के शिखर तक पहुंचाकर एक कुशल संगठनकर्ता का परिचय दिया था, यही नहीं भाजपा को उस उंचाई पर पहुँचाने के चक्कर में आडवाणी ने अपने ऊपर घोर साम्प्रदायिक होने का ठप्पा भी लगवाया, जो वर्षों से उनके साथ चिपका हुआ है और बेचारे ने जब तब इस साम्प्रदायिक ठप्पे को हटाने की कोशिश की भी तो सबसे ज्यादा आलोचना भाजपा समर्थकों से ही झेलनी पड़ी| जब जिन्ना की मजार पर प्रोटोकॉल के तहत शीश नवाते हुए अनुभवी आडवाणी ने एक तीर से तीन शिकार करने की कोशिश की तो तब भी मंद बुद्धि भाजपा कार्यकर्ताओं ने बिना उनके बयान का भावार्थ व उनकी मंशा समझे कांग्रेस की चाल में फंस कर उनकी आलोचना शुरू कर दी थी|
जबकि कोई भी आसानी से समझ सकता था कि- आडवाणी ने जिन्ना की तारीफ़ कर एक तरह से पाकिस्तानी शासकों व नेताओं पर एक व्यंग्य बाण छोड़ा था कि- जिस जिन्ना ने धर्मनिरपेक्ष पाकिस्तान की परिकल्पना की थी वो आप लोगों ने हवा में उड़ा दी और पाक को एक साम्प्रदायिक देश बना दिया| साथ ही जिन्ना की तारीफ कर आडवाणी ने मुसलमानों को अपने विचारों में उनके प्रति बदलाव का सन्देश देने की कोशिश के साथ कांग्रेस को भी घेरने की कोशिश की कि देश के बंटवारे के वक्त ऐसा क्या हुआ था कि एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति को एक अलग देश की मांग करनी पड़ी? पर उनके भावार्थ किसी ने समझने की कोशिश ही नहीं की|

खैर….मूल बात कहावत पर चल रही थी कि आडवाणी ने अपनी मेहनत, लगन व कुशल संगठन क्षमता के बल पर भाजपा को सत्ता के शिखर तक पहुँचाया पर उस वक्त अटलबिहारी वाजपेयी जो उनके वरिष्ठ थे साथ ही गठबंधन दलों में स्वीकार्य भी थे को आडवाणी ने बिना अपनी महत्वाकांक्षा प्रदशित किये वाजपेयी के लिए मैदान छोड़ दिया और उनके सहयोगी बने रहे|
आज जब उनके वरिष्ठ वाजपेयी जी राजनीति से रिटायर हो चुके है और गठबंधन दलों में आडवाणी की स्वीकार्यता बन चुकी है तब अचानक जिस तरह पकी खिचड़ी को खाने टिल्ला मौके पर आ धमकता है ठीक उसी तरह आज जब कांग्रेस के खिलाफ जनता के रोष को देखते हुए दुबारा भाजपा की सत्ता के नजदीक पहुँचने की संभावनाएं बन रही है, राष्ट्रीय स्तर पर बिना किसी प्रदर्शन के सिर्फ गुजरात विकास के प्रदर्शन को लेकर प्र.मंत्री पद के लिए मोदी अपने कुछ भाड़े के सोशियल साइट्स वर्कर्स व कुछ कट्टरपंथी युवकों के साथ माहौल बनाकर टिल्ले की तरह आ धमके है|

जबकि हकीकत यह है कि गुजरात मुख्यमंत्री की कुर्सी भी जब मोदी को टिल्ले की तरह मिली थी तब भी गुजरात विकसित था, विकास के लिए जरुरी आधारभूत ढांचा वहां उपलब्ध था, हाँ इस विकास को मोदी ने गति दी उसके लिए वे प्रशंसा के पात्र है| मैं यह भी मानता हूँ कि इन वर्षों में यदि मोदी की जगह कांग्रेस सरकार होती तो अब तक गुजरात का विकास भी रसातल में पहुँच चूका होता|

गुजरात विकास का पूरा श्रेय भी यदि मोदी को दे दिया जाय तो भी इसका मतलब यह नहीं कि कुछ कट्टरपंथी व कुछ हजार भाड़े के सोसियल साइट्स वर्कर्स युवकों द्वारा मोदी के पक्ष में चलाये अभियान के चलते पार्टी के एक ऐसे वरिष्ठ नेता जिसनें पार्टी संगठन के लिए अपना जीवन लगा दिया हो और पार्टी को आज सत्ता की दावेदार बना दिया हो, को दरकिनार कर ऐसे व्यक्ति को पार्टी का नेतृत्व सौंप दिया जाये जिसकी राष्ट्रीय स्तर पर कोई राजनैतिक उपलब्धि ना हो|

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14 COMMENTS

  1. “खीरां आई खिचड़ी अर टिल्लो आयो टच्च” बात तो सटीक है पर खीरां आई खिचडी को खाने वाला दूसरा कोई दिख भी नही रहा तो टिल्ला ही खायेगा और कौन खा सकता है?:)

    रामराम.

    • ताऊ जी
      वैसे खिचड़ी बनाने वाले के दांत अब खाने लायक रहे भी नहीं, बेचारा वैसे ही कुछ खाने की कसरत करने के बाद टिल्ले को दे देता या देनी पड़ती!
      बस टिल्ले को भी यूँ छीनकर नहीं खानी चाहिये थी 🙂

  2. Ye besak satya baat Jis Adwani ji ne BJP ko sikhar par pahuchaya parntu BJB vidambnao ka mahol hamesa bana rahata hai Jis tarah Swargiya Shri Bheru Singh ji Shekhawat ko kinare kiya v esa mahol banaya ise sabhi janate hai…

    Parantu yadi Congress ka koi bhi viklp milta hai (Marshal Low also)aaj ki parishthithiyon me manjur hai. baki bhavishya me unthh kis karawat bethata yah to samay hi bateyega ….

    Narendra Singh Champawat
    http://www.businessaccountants.blogspot.in

  3. शिखर पर पहुंचते ही उसी सीढ़ी को सबसे पहले लात मारनी चाहिए, जिस पर चढ़ कर वहां पहुंचा गया हो…

    जय हिंद…

  4. आप की बात सही है कि आडवाणी जी नें पार्टी के लिए बहुत कुछ किया लेकिन यह भी तो सच्चाई है कि आडवाणी जी सहयोगी दलों में भले ही स्वीकार्य हो लेकिन जनता नें आडवाणी जी को २००९ में स्वीकार नहीं किया ! और मोदी कार्यकर्ताओं की पहली पसंद बनकर उभरे हैं और जनता भी मोदी को बनिस्पत दूसरों के ज्यादा पसंद करती है जो तमाम सर्वेक्षणों में दिखाई भी दे रही है !!

    • बेशक मेरी भी पहली पसंद मोदी ही है पर जो तरीका अख्तियार किया गया गलत है, एक बुजुर्ग नेता जिसनें वर्षों से यह मुकाम पाया उससे आसानी से अपनी सीट नहीं छूटती, पर उसकी इस तरह फजीहत नहीं करनी चाहिये थी !!
      इस मामले में कुछ भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं ने छिछोरापन दिखाया जिससे मन आहत है !!

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