मेवाड के आराध्‍य सगसजी बावजी

Bhupendra Singh Chundawat
बलिदानों की धरती मेवाड में वीरों के पूजन की परंपरा रही है। उदयपुर में सगसजी सुल्तानसिंहजी से लेकर अन्य कई क्षत्रिय वीरों को सगसजी के रूप में पूजा जाता है। ये लोक देवता के रूप में मान्य हैं। श्रावण के शुक्ल पक्ष के पहले शुक्रवार को एक साथ सगसजी के जन्मोत्सव मनाया जाता है। सगसजी के स्थान आस्था के केंद्र तो हैं ही, मानवीय स्वार्र्थों, धोखाधडी, षडयंत्रों बिना सोचे-समझे किए गए जानलेवा फैसलों के घातक परिणामों से नसीहत लेने की बात भी कहते हैं। उदयपुर में सगसजी का सबसे प्राचीन व बड़ा स्थान सर्वऋतु विलास है। यहां सगसजी सुल्तानसिंह हैं। वे महाराणा राजसिंह (1652-1682) के ज्येष्ठ पुत्र थे जिनकी झूठी शिकायत, एक षडयंत्र के कारण खुद राजसिंह ने ही उनकी हत्या कर दी। सर्वऋतुविलास में प्रत्यक्ष में तो सुल्तानसिंह ही सगसजी के रूप में पूजे जाते हैं, किन्त अप्रत्यक्ष रूप में तीन भाई बिराजित है। इन तीनों के चबूतरे महासतिया में पास-पास बने हैं। सगसजी सरदारसिंह की स्थापना मंडी स्थित जोगपोल के दाताभवन में है। गुलाबबाग स्थित बावड़ी के समीप विराजित अर्जुनसिंह महाराणा जयसिंह के साले थे जिन्हें उदयपुर की एक गणगौर सवारी के दौरान नाव में शराब के साथ जहर देकर षडयंत्रपूर्वक मारा गया। करजाली हाउस स्थित स्थानक के सगसजी भैरूसिंह
की गोखड़े से गिराकर हत्या की गई। कंवरपदा स्कूल स्थित स्थानक के सगसजी कारोई ठिकाने से संबध्द हैं, जिनकी कवंरपदा की हवेली में धोखे से हत्या की गई। वारियों की घाटी स्थित रणसिंह, अस्थल मंदिर के पीछे वाले सगसजी, आयड़ तथा रामदास कॉलोनी वाले सगसजी भी मेवाड़ के मान्य ठिकानों से जुड़े हुए हैं। पीछोली स्थित सगसजी सर्वऋतुविलास वाले सगसजी है। सगसजी शब्द सगत या शख्स का तद्भव रूप है। शौर्य एवं शक्ति से जीवंत प्रतीक होने के कारण ही नाम सगत हुआ। सगत का अर्थ शक्ति से है। आदरसूचक ‘जी’ लगाने के कारण ही इन्हें सगसजी कहा जाने लगा। वे लोकदेव के रूप में लोक जीवन के दु:ख-दर्दों का निवारण करते हुए कल्याण कार्यों में लगे हुए हैं।

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