मृत्यु के वक्त भी कविता

मेवाड़ के महाराणा अड़सिंहजी के वक्त मेवाड़ में जबरदस्त गृह कलह फैला हुआ था| देवगढ के रावत राघोदासजी इस गृह कलह को करवाने वालों के मुखिया था राघोदासजी के कहने से माधोराव सिंधिया भी मेवाड़ के गृह कलह में शामिल हो गया और मेवाड़ पर चढ़ाई करने के लिए चल दिया| मेवाड़ के सभी सरदारों व मुसाहिबों ने आपसी सलाह कर उज्जैन में जाकर माधोरावसिंधिया से मुकाबला करने की ठानी| सिंधिया के पास ३५००० हजार सैनिक थे और उसके मुकाबले मेवाड़ की फ़ौज बहुत छोटी थी पर मेवाड़ वालों ने साहपुरा के राजा उम्मेदसिंह जी के नेतृत्त्व में मरने मारने की सोच ली थी कि जीतें या हारें पर लड़ाई आर पार की करनी है|

और मेवाड़ की सेना ने केसरिया वस्त्र धारण कर,पगड़ियों में तुलसी पत्ता दबा,रुद्राक्ष ले,भुजाओं पर गायत्री मन्त्र बाँध ये सोचकर कि उज्जैन जैसी तीर्थ स्थली,क्षिप्रा जैसी पवित्र नदी का तट एसा पवित्र स्थान देश के लिए मरने के लिए कब और कहाँ मिलेगा| उनके लिए तो ये एक अद्भुत संयोग भी था| और अपने घोड़े मराठा सेना पर दौड़ा दिए| जबरदस्त युद्ध हुआ मरने के लिए मतवाले हुओं को कौन रोक सकता है?

युद्ध में मेवाड़ की सेना के शौर्य के आगे मराठों के पैर उखड़ गए और वे भागने लगे,मेवाड़ की सेना उज्जैन शहर में घुस गयी तभी जयपुर से कोई दस हजार नागा सन्यासियों की सेना आ गयी और मेवाड़ की सेना पर टूट पड़ी| मेवाड़ी सेना खूब लड़ी| मेवाड़ी सेना के प्रधान राजा उम्मेदसिंह जी शत्रुओं को मौत की नींद सुलाते सुलाते खुद रण खेत में सो गए| वे घायल अचेतावस्था में पड़े थे कभी आँखे बंद हो जाती तो कभी खुल जाती| तभी मराठों को लाने वाले और गृह कलह करने वालों के मुखिया रावत राघोदासजी की नजर घायल उम्मेदसिंह जी पर पड़ी वे दोनों आपस में काका भतीजा थे हालाँकि इस युद्ध में दोनों एक दुसरे के दुश्मन थे|

राघोदासजी ने देखा काकाजी घायलावस्था में पड़े है कभी पलकें खुलती है कभी बंद होती है,आखिरी वक्त है इन्हें थोड़ा अम्ल (अफीम) दे दूँ तो मरते वक्त इनकी पीड़ा थोड़ी कम हो जाएगी और दूर से ही उन्होंने एक अम्ल की छोटी डली अपने भाले की नोक पर रखकर उनकी तरफ करके उनके मुंह में दी| पास जाते हुए उन्हें डर लग रहा था क्या पता घायल बुड्ढा पास जाते ही कहीं वार ना करदे| आखिर एक दुसरे के खिलाफ लड़ रहे थे|

अम्ल की डली पेट में जाते ही उम्मेदसिंह जी की आँख खुली बोले- “भतीजे जी ! थोड़ा पानी पिलाओ|”
राघोदासजी कटोरे में पानी लेकर डरते डरते पास गए| उम्मेदसिंह जी ने पानी पीया बोले- “थोड़ा अम्ल और दो|”
राघोदासजी ने तुरंत थोड़ा सा अम्ल और दिया,उम्मेदसिंह जी ने अम्ल खाया और खाते ही उनके शरीर में थोड़ी जान आई,और उठ बैठे| उम्मेदसिंह जी कभी अम्ल (अफीम) का सेवन नहीं करते थे जबकि उस ज़माने में लगभग लोग अम्ल का सेवन करते थे| अम्ल का नशा होते ही उम्मेदसिंह की पीड़ा कम हुई और शरीर में थोड़ी जान आते ही उन्होंने अम्ल के गुणों पर एक दोहा बोला-
अमल कड़ा गुण मिठड़ा, काळी कंदळ वेस|
जो एता गुण जाणतो ,तो सैतो बाळी वेस ||
और दोहा ख़त्म होते ही उम्मेदसिंह जी ने राघोदास जी की गोद में प्राण त्याग दिए|
यही है उस जमाने का भारतीय योद्धाओं का चरित्र| दो शत्रु युद्ध भूमि में तलवारों से खेल रहे है और काका भतीजा कहकर आपस में बात भी कर रहे साथ में अम्ल की मनुहार भी| भारतीय योद्धाओं का यही वो चरित्र था जो रण भूमि में घायल क्षत-विक्षत पड़े कविताओं से मृत्यु का स्वागत कर रहे है| मौत उनके गले में अटक रही है और वो शत्रु को दोहे सुना रहे है |

मौत को खेल समझने की भावना ने ही राजस्थान के योद्धाओं के चरित्र को प्राणवान बनाया|

साहपुरा के राजा उम्मेदसिंह जी ने बहुत युद्धों में भाग लेकर अपनी बहादुरी की छाप छोड़ी थी| बहादुरी के साथ वे बहुत बड़े दानी,काव्य मर्मग्य और राजनीती के जानकार थे| बादशाही सेना में वीरता दिखाने पर ही उन्हें राजा की पदवी मिली थी| उज्जैन के युद्ध में जो सफ्फरां (क्षिप्रा) के युद्ध के नाम से इतिहास में विख्यात है में वीरता दिखाने पर कवियों ने उनकी प्रसस्ती में बहुत दोहे लिखे-
समंदर पूछै सफ्फरां, आज रतंबर काह|
भारत तणे उम्मेद सी, खाग झकोळी आह||
घोड़ा पाखर-घल रही,भड़ा न पायो भेद |
आज कस्या गढ़ उपरां,आरम्भ रच्यो उम्मेद||

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