मायरा व भात भरने की परम्परा में भी जुड़ा है पर्यावरण प्रेम

मायरा यानी भात भरने की परम्परा में भी जुड़ा है पर्यावरण प्रेम : हमारे देश में बहन की पुत्री या पुत्र की शादी में मायरा भरने की परम्परा सदियों पुरानी है | मायारा भरने को भात भरना भी कहते हैं | कोई भी महिला अपने पुत्र या पुत्री की शादी तय होते ही गुड़ की भेली व चावल लेकर मायके जाती है और गुड़ की भेली अपने भाई को देते हुए उसे शादी में आने के लिए आमंत्रित करती है | भाई अपने आर्थिक स्थिति के अनुसार उपहार आदि लेकर जाता है, इसी को भात भरना या मायरा भरना कहा जाता है | इस अवसर पर बहन शादी में आये अपने भाई का स्वागत करती है और भाई चुनड़ी ओढा कर बहन का सम्मान करता है |

लेकिन भात भरने की इस परम्परा में भी राजस्थान के लोगों का पर्यावरण प्रेम जुड़ा है | भाई जब भात लेकर बहन की ससुराल जाता है तब सबसे पहले गांव की सीमा में घुसते ही खेजड़ी के पेड़ को चुनड़ी ओढाता है | आपको बता दें भात भरने में सबसे महत्त्वपूर्ण रस्म बहन को चुनड़ी ओढाना होता है और ठीक यही रस्म गांव की सीमा जिसे स्थानीय भाषा में कांकड बोलते है, में प्रवेश करते ही भाई खेजड़ी के पेड़ को चुनड़ी ओढा कर उसे सम्मान देता है जो प्रदेश के लोगों के मन में पर्यावरण के प्रति प्रेम और जागरूकता को प्रदर्शित करता है |

राजस्थान में खेजड़ी के पेड़ को पर्यावरण की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण समझा जाता है | भात भरने के समय खेजड़ी को चुनड़ी ओढा कर उसके प्रति भी वही सम्मान प्रदर्शित किया जाता है जो भाई द्वारा बहन के प्रति किया जाता है | जो भाई खेजड़ी वृक्ष को अपनी बहन के समान समझता है, जाहिर है वह उसका संरक्षण ही करेगा और खेजड़ी वृक्ष का संरक्षण मतलब पर्यावरण का संरक्षण | इस तरह राजस्थान में सदियों पहले यह परम्परा बनाई गई और खेजड़ी के वृक्ष को बहन का दर्जा दिया गया ताकि कोई भी व्यक्ति उसे नुकसान पहुँचाने की ना सोचें | राजस्थान में ऐसी और भी कई परम्पराएं है जो सीधे सीधे पर्यावरण से जुड़ी है |

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