महार कलां का इतिहास History of Mahar Kalan

आमेर के युवराज कुम्भाजी के पुत्र उदयकरणजी ने महार गांव बसाया था | युवराज कुम्भाजी के वंशज कुम्भावत कछवाह कहलाते हैं | आजादी पूर्व महार  कुम्भावत कछवाहों का प्रमुख ठिकाना रहा है | वर्तमान में महार कलां के नाम से जाना जाने वाला यह गांव जयपुर से 42 किलोमीटर और चौमू से 15 किलोमीटर दूर है | आमेर के युवराज कुम्भाजी वि.सं. 1545 में अमरसर की रक्षार्थ सुल्तान बहलोल लोदी की सेना से युद्ध करते हुए झुझार हो गये थे | जब वे अमरसर की सहायतार्थ सेना लेकर जा रहे थे, तब खेत में काम कर रही एक गूजर जाति की महिला ने अपने पति से कहा कि –हमारा राजा कितना बेवकूफ है, परिवार के सभी सदस्यों को युद्ध में भेज दिया, शकुन जानने वाली उस महिला ने आगे कहा कि इस युद्ध में राजा की विजय तो होगी, पर सेना में शामिल उसके सभी पारिवारिक सदस्य शहीद होंगे |

उसकी यह बात एक सैनिक ने सुनी और युवराज को बताई तब युवराज कुम्भाजी ने अपने छोटे पृथ्वीराज व अपने पुत्र उदयकरण को वापस आमेर भेज दिया और भाई से वचन लिया कि मेरी मृत्यु के बाद आमेर का आधा राज्य मेरे पुत्र को देगा | उस युद्ध में आमेर की सेना विजय हुई पर कुम्भाजी काम आये | कुम्भाजी के पिता आमेर नरेश चंद्रसेनजी ने कुम्भाजी के पुत्र उदयकरणजी को बरवाड़ा की जागीर दी | चूँकि बरवाड़ा पहले शेखावतों के पास था और दो ही पीढ़ी उनके पास रहा अत: उदयकरणजी ने बरवाड़ा में रहना शुभ नहीं समझकर अरावली की पहाड़ी की तलहटी में महार गांव बसाया |

जहाँ महार गांव बसाया गया, वहां पूर्व में नाथ सम्प्रदाय के संत सालगनाथजी रहते थे, उन्हीं के आशीर्वाद व सलाह पर यहाँ गांव बसा कर उसे अपनी राजधानी बनाया गया| संत के आदेश पर चंद्रसेनजी की राणी, जो कुम्भाजी की माता थी ने एक छोटा सा शिव मंदिर बनवाया | जिस पर बाद में रावत रामजी ने बड़ा सा गुंबद बनवाया और पास में पानी के कुण्ड व तिबारियों का निर्माण कराया | संत सालगनाथजी ने इस शिव मंदिर का नाम मालेश्वरनाथ धाम रखा और यहाँ कछवाहों के कुलदेवता अम्बिकेश्वर महादेव की प्राण प्रतिष्ठा की|

महार के शासकों में लूणकरणजी को बादशाह अकबर ने रावत की उपाधि दी थी | लूणकरणजी ने हाजी पठान को बादशाह के समक्ष पेश किया था, दरअसल हाजी पठान शेरशाह सूरी का समर्थक और सूरी की मौत के बाद भी अकबर के लिए खतरा बना था | उसका सामना लूणकरणजी की सेना से हुआ | लूणकरणजी ने हाजी खां के सामने प्रस्ताव रखा कि खून खराबा करने के बजाय हम आपस में मल्ल युद्ध कर लेते हैं यदि मैं हारा तो तुम्हारा साथ दूंगा और तुम हारे तो मेरे साथ चलकर बादशाह के समक्ष प्रस्तुत हो जाना | हाजी खां बलिष्ठ था, सो उसने शर्त स्वीकार कर ली, मल्ल युद्ध हुआ और लूणकरणजी विजय हुये | कहा जाता है कि लूणकरणजी पर संत की असीम कृपा थी | जब हाजी खां को अकबर के सामने पेश किया तो उसने प्रसन्न होकर लूणकरणजी को रावत की उपाधि दी |

इसी तरह संत की कृपा से कुम्भाजी के पौत्र कर्मचंदजी ने सिर्फ एक आटे की बोरी से पूरी मुग़ल सेना को भोजन की आवश्यकतानुसार आटे की आपूर्ति कर दी | इस बात का पता अकबर को चला तो उसने कर्मचंदजी को बोदला की उपाधि दी और कोटड़ी आदि की सवा लाख रूपये आमदनी वाली जागीर दिलवाई | कोटड़ी में कर्मचंदजी ने किला बनवाया और उनकी वहीँ मृत्यु हुई | आज भी किले में उनका देवालय बना है जहाँ लोग उन्हें पूजते हैं|

रावत रामजी ने शिव मंदिर के साथ ही रहने के लिए महल बनवाये, कुँए खुदवाये और कृषि के लिए पानी की व्यवस्था करवाई | महार के शासक परिवार के कई सदस्यों ने युद्धों में वीरता प्रदर्शित की और अपने प्राणों उत्सर्ग किया, यही कारण है कि महार गांव में जगह जगह झुझारों के स्थान बने हैं और लोग उनकी पूजा करते हैं | महार की भूमि ने योद्धा ही नहीं पैदा किये, यह संतों की भी भूमि है | यहाँ अनेक संत हुए हैं, स्थानीय लोगों का कहना है कि आज भी महार में सदियों पुराने संत सूक्षम शरीर के रूप में मौजूद में है और वे कई बार ग्रामीणों को दर्शन देते हैं | संत सालगनाथजी ने भी गांव में आबादी बढ़ने के बाद पहाड़ी पर अपना स्थान छोड़ गांव के बाहर अपना आसन जमाया था, वहीं उन्होंने समाधी की | जहाँ आज भी लोग उनकी पूजा करते हैं |

आमेर नरेश कुम्भाजी के पुत्र को आधा राज्य देने का वचन निभाने के लिए आधा राज्य देने के बजाय आमेर की आधी प्रजा को महार भेज दिया | अब एक साथ इतने लोगों की व्यवस्था के लिए महार में बारह कुँए खुदवाये गये, जिनमें खारा पानी निकला | अत: पहाड़ी से निकलने वाले नालों का पानी रोकने के लिए एक छोटा बाँध बनवाया गया | इस एनिकट निर्माण से पानी रुका और भूमिगत जल स्तर रिचार्ज हुआ, जिससे कुओं का पानी भी मीठा हो गया | यह एनिकट आज भी विद्यमान है पर पानी रोकने के स्थान पर लोग खेती करते हैं | महार के परकोटे में घुसते ही यहाँ के शासकों की स्मारक रूपी छतरियां बनी है | गांव के मध्य से पहाड़ी नाला भी निकलता है | वर्तमान में यहाँ का महल न्यायालय में मामला लंबित होने के कारण बंद पड़ा है | पहाड़ी पर किला भी बना है पर वह भी उजाड़ पड़ा है |

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