महनसर फोर्ट का इतिहास | Mahansar Fort

शेखावाटी का महनसर क़स्बा विश्व के पर्यटन मानचित्र पर प्रसिद्ध है | प्रतिवर्ष यहाँ हजारों देशी विदेशी पर्यटकों का आना जाना लगा रहता है | आजादी से पूर्व यह क़स्बा कछवाह राजवंश की शेखावत शाखा का महत्त्वपूर्ण ठिकाना था | महनसर ठिकाना प्रदेश की राजनीति में जितना महत्त्वपूर्ण था, वहीं व्यापार जगत में भी उतना ही महत्त्वपूर्ण व प्रसिद्ध था | यहाँ के सेठों का दूरदराज के प्रदेशों तक व्यापार फैला था | आज भी उन सेठों की खुबसूरत व बड़ी बड़ी हवेलियाँ उनके वैभव की कहानियां बयां करती है | महनसर का किला, मंदिर, हवेलियाँ, स्मारक रूप में बनी छतरियां विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है |
महनसर के इस गढ़ का निर्माण सन 1768 में हुआ था | इतिहासकार रघुनाथसिंहजी काली पहाड़ी की पुस्तक के अनुसार इस गढ़ का निर्माण नवलगढ़ के ठाकुर नवलसिंह जी ने करवा कर 12 गांवों सहित महनसर का ठिकाना अपने पुत्र नाहर सिंह को दिया था | नाहरसिंह जी ने यहाँ ठिकाना कायम किया अत: नाहरसिंह जी को हम इस ठिकाने के संस्थापक कह सकते हैं | ठाकुर नाहरसिंहजी के बाद उनके पुत्र लक्ष्मणसिंहजी ठिकाने के उतराधिकारी बने | ठाकुर लक्ष्मणसिंहजी ने मेवाड़ की राजकुमारी कृष्णा कुमारी के प्रसंग को लेकर जयपुर व जोधपुर के मध्य हुए युद्ध में भाग लिया था | यह युद्ध परबतसर के पास गीगोली की घाटी में हुआ था |
लक्ष्मणसिंह जी के बाद शिवनाथसिंहजी यहाँ के शासक बने | शिवनाथसिंहजी के बाद यह ठिकाना उनके तीन पुत्रों में बंट गया और आजादी से पूर्व तक उनके अधिकार रहा | आज भी यहाँ का गढ़ शिवनाथसिंह जी के तीन पुत्रों के परिवार के स्वामित्व में है | इन परिवारों को बड़ा पाना, बिचला पाना और छोटा पाना के नाम से जाना जाता है | गढ़ के अलग अलग हिस्से अलग अलग पानों के स्वामित्व में है और वर्तमान में गढ़ में हैरिटेज होटल संचालित है जहाँ देशी विदेशी पर्यटक राजसी अंदाज में रहने का आनन्द लेते हैं |
गढ़ के सामने बने एक बड़े रेतीले टीले ने गढ़ के मुख्य द्वार को छुपा रखा है | घूमकर टीले के दूसरी ओर जाते ही गढ़ का द्वार नजर आता है, इस द्वार के बाद आगे फिर एक द्वार पार करना पड़ता है | दूसरे द्वार को पार करते ही दर्शक अपने आपको चारों ओर बनी महलों की अट्टालिकाओं से घिरा पाता है | सामने ही होटल में आने वाले पर्यटकों के लिए दो स्वागत कक्ष नजर आते हैं | गढ़ के विभिन्न भागों में पर्यटकों के रुकने हेतु कमरे बने है |  यहाँ जितने भी कमरे बने हैं उनकी खिड़की दरवाजों पर आज भी पुराने ज़माने के किंवाड़ लगे हैं |  छत व दीवारें सुन्दर फ्रेस्को पेंटिंग से सुशोभित है | इस तरह की चित्रकारी यहाँ के कमरों में आम बात है, जिधर नजर जाती है उधर शानदार चित्रकारी नजर आती है और मन में उमड़ आता है उन चित्रकारों व उनकी कला के प्रति सम्मान |
पर्यटकों के लिए ठहरने हेतु गढ़ के पुराने निर्माण को यथावत रखते हुये आधुनिक सुविधाओं का समावेश किया गया है | कमरों में पुराना फर्नीचर आज भी रखा है जिनका प्रयोग कभी यहाँ के शासक ठाकुर व ठकुरानीयां किया करती थी | दीवारों की पूर्व में की गई चित्रकारी आज भी यथावत सहेज कर रखी गई है |
सोने चांदी की दूकान के अलावा महनसर की शाही शराब भी विख्यात है | हैरिटेज वाइन के नाम से प्रसिद्ध इस शाही शराब का निर्माण शेखावाटी के झुंझुनू जिले के महणसर ठिकाने के ठाकुर साहब ने १८ वीं सदी में विभिन्न आसव व फलों का उपयोग करते हुए वैद्यों के दिशानिर्देश में शुरू किया था | जिसका उपयोग बीकानेर, कश्मीर ,नेपाल आदि के महाराजा करते थे ठाकुर साहब ने सोंफ इलायची, गुलाब, पान, पुदीना, सेव, मौसमी, अंगूर, मतिरा (तरबूज) आदि के उपयोग से शाही शराब निर्माण की विभिन्न विधियाँ इजाद की | वर्तमान में इन विधियों से गंगानगर शुगर मिल्स शाही शराब का उत्पादन कर उसका व्यापारिक विपणन करती है | इस शाही हैरिटेज शराब को भी जो दवा का महत्त्व रखती है का किसी भी मौसम में उपयोग किया जा सकता है |
गढ़ के सामने कुछ दूर एक मंदिर बना है, जिसकी विशालता और भव्यता देखकर ही कस्बे के लोगों की आर्थिक स्थिति का आभास हो जाता है कि आजादी पूर्व यह क़स्बा आर्थिक तौर पर सुदृढ़ था | यहाँ के सेठ दिल खोलकर जनहित के कार्य करते थे | किले से कुछ दूर बनी इस हवेली का भी अपना इतिहास है | इस हवेली में रहने वाले सेठों का कभी दूर दूर तक व्यापार फैला था, क्षेत्र के धनाढ्य व्यक्तियों में उनकी गिनती होती थी, लेकिन स्थानीय निवासी बताते हैं कि अब उस परिवार की वो स्थिति नहीं है जो पहले हुआ करती थी | यही कारण है कि यह हवेली जीर्णोद्धार की राह देख रही है | कस्बे के बाहर बनी यह भव्य व विशाल छतरी किसी सेठ का स्मारक है, इस स्मारक को देखकर ही दर्शक उक्त सेठ के व्यापारिक साम्राज्य का अंदाजा लगा सकता है कि जब सेठजी का स्मारक इतना बड़ा है तो व्यापार तो पता नहीं कितना बड़ा होगा |

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