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मलिक मुहम्मद जायसी के अनुसार ऐसे छुड़ाया था गोरा बादल ने रत्नसिंह को कैद से

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जायसी ने गोरा बादल का चित्रण कुछ यूँ किया
जायसी ने गोरा बादल का चित्रण कुछ यूँ किया

भंसाली सहित वामपंथी गैंग फिल्म पद्मावती के बारे में दुष्प्रचार कर रही है कि फिल्म इतिहास पर नहीं जायसी की रचना पर आधारित है| पर जैसा कि हमने पिछले लेख में आपको बताया कि फिल्म में रत्नसिंह को खिलजी की बेगम द्वारा रहम कर कैद से छुड़वाना दर्शाया गया है| जबकि जायसी ने “गोरा बादल युद्ध खण्ड” में दोहों के रूप में जो वर्णन किया है, उसकी डा. कन्हैया सिंह द्वारा की गई हिंदी व्याख्या के कुछ अंश प्रस्तुत कर रहे है, जो भंसाली गैंग की पोल खोलने में काफी होगी-

“बादशाह की आज्ञा हुई कि “एक घड़ी के लिए राजा के पास जाओ| जो क्षण व्यर्थ का था, वह सार्थक हो गया| विमान (डोली) चलकर राजा के पास आया| पदुमावती के बहाने जो लुहार था, वह निकला और राजा की बेड़ी काटकर उसने प्रार्थना की| बंधन से छूटते ही राजा क्रोध से भर गया| घोड़े पर चढ़कर उसने सिंह जैसी गर्जना की| गोरा-बादल ने खड़ग निकाल लिया| राजकुमार पालकियों से निकलकर अपने अपने घोड़ों पर चढ़कर खड़े हो गए| वे तेज घोड़े आकाश छूने लगे| किस युक्ति से कौन उनकी बागडौर पकड सकता था? जब कोई प्राण पर खेलकर खड्ग संभालता है तो मरने वाला हजारों को मार डालता है|

बादशाह के यहाँ सन्देश आया- “वे चाँद और तारे (पदुमावती और सखियाँ) नहीं है| छल से जिनको हमने पकड़कर दबोच लिया था| उनपर ग्रहण लगा दिया था| वे अब हमें ग्रहण लगाकर यानी तेजहीन बनाकर जा रहे है|

वे राजा को छुड़ाकर चितौड़ के लिए चल पड़े| शाह के शूरमाओं में ऐसे हलचल मची जैसे मृग के छूटने से सिंह में होती है| बादशाह ने चढ़ाई की और चढ़ाई करने की गुहार मच गई| उसकी अपार सेना से संसार में कालिमा छा गई|

खिलजी की सेना से गोरा का सामना होने का चित्रण करते हुए जायसी लिखता है- “तब गोरा ने आगे घूमकर हुंकार भरी- “आज रण का खेल खेलूँगा और साका करूँगा|” मैं गोरा हूँ, धौलगिरि के समान अटल हूँ| ऐसा खेल खेलूँगा कि टालने से न टलूंगा और घोड़े की बाग़ भी नहीं मोडूंगा| मैं साहिल नक्षत्र, जो इंद्र के ऊपर रहता है, की भाँती सबसे ऊपर रहूँगा| मुझे देखकर सेना रूपी मेघ नष्ट हो जाएगी|

सेना की घटा चारों ओर से छा गई| खड्ग-वाण चमक रहे थे और उनकी झड़ी लगी थी| गोरा आदिदेव की भाँती अटल था| तुर्क सैनिक शत्रु को ललकारते पहुँच गए| वे हाथों में हिरवानी (हेरत की बनी) तलवार लिए थे| उनके हाथों में बर्छे बिजली की तरह चमक रहे थे| वाण जो सजे थे वे मानों गाज (बज्र) थे| वासुकि नाग डर रहा था कि मुझे भी हिन्दू समझकर प्रहार न दें| गोरा ने अपने सभी साथियों को लिया जो बिना सूंड के मतवाले हाथी जैसे वीर थे| सबने मिलकर पहला आक्रमण किया और आती हुई सारी सेना को उन्होंने हांक लिया-पीछे हटा दिया|

रुण्ड (धड़) बख्तर के साथ और मुंड सिर के कुण्ड या टोप के साथ टूट कर गिरने लगे| घोड़े बिना स्कन्ध के और हाथी बिना सूंड के होने लगे|

बाकी अगले लेख में ………..

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