मंदिरों में दलित प्रवेश रोकने का आरोप लगाने वालों के मुंह पर तमाचा

मंदिरों में दलित प्रवेश की ख़बरें अक्सर अख़बारों व टीवी मीडिया में सुर्खियाँ बनती है| पर वर्तमान में हकीकत कुछ और ही है| यदि हम मंदिरों में दलित प्रवेश का जायजा लें तो लगता है कि ये ख़बरें किसी ख़ास उद्देश्य के लिए जानबूझकर बनाई जाती है और प्रचारित की जाती है| इसी तरह की फर्जी यानी फैक ख़बरों की हकीकत उजागर करने के लिए आज हम भगतपुरा गांव के देवी मंदिर में दलित प्रवेश के बारे में बताएँगे| भगतपुरा राजस्थान के सीकर जिले का गांव है जो जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर है| इस गांव में प्रवेश करते ही एक देवी मंदिर नजर आता है| यह मंदिर गांव के राजपूत परिवारों द्वारा बनवाया गया है| मंदिर में पूजा अर्चना का काम बनवारी लाल नामक एक ब्राह्मण के जिम्मे है| यानि इस मंदिर से वे दोनों जातियां जुडी है जिनपर अक्सर मंदिरों में दलित प्रवेश से रोकने के आरोप लगते है|

लेकिन इस मंदिर के बनने से लेकर आजतक किसी भी दलित के प्रवेश पर रोक नहीं है| सुबह-शाम आरती के समय दलित बच्चे बहुतायत से इस मंदिर में आते है और आरती बोलने के बाद परिक्रमा कर प्रसाद पातें है मंदिर में दलित प्रवेश को लेकर पुजारी बनवारी लाल ने बनाया कि मंदिर बनते ही गांव के लोगों ने निर्णय लिया था कि मंदिर सभी जातियों के लिए खुला रहेगा, किसी का प्रवेश निषेध नहीं होगा और उस निर्णय की पूरी पालना की जाती है| हमने पुष्टि के लिए दलित जाति के ही बाबूलाल बावरी से बात की| बाबूलाल बावरी पिछले नौ वर्ष से ग्राम पंचायत के निर्वाचित वार्ड पंच है और मंदिर से कुछ ही दूर उनका घर व दूकान है| इस मंदिर में दलित प्रवेश पर वार्ड पंच बाबूलाल ने बताया कि यहाँ किसी के प्रवेश पर कोई रोकटोक नहीं है| दलित जातियों के लोग मंदिर की प्रतिमा तक जाकर पूजा कर सकते हैं| वीडियो में आप स्वयं बाबूलाल को देवी की प्रतिमा के पास देख सकते हैं और उनका बयान सुन सकते हैं|

इस तरह इस गांव में राजपूतों द्वारा बनवाये मंदिर में किसी भी दलित के लिए प्रवेश खुला है, इस मंदिर में दलितों को पूजा अर्चना करने की खुली छूट है| यही नहीं इस गांव के शिव मंदिर व केसरिया कँवर जी महाराज, लोकदेवता रामदेवजी महाराज के मंदिर में भी दलित प्रवेश पर कोई रोक टोक नहीं है| लोकदेवता केसरिया कँवर जी महाराज व रामदेवजी के मंदिर में तो दलित पुजारी तक रह चुके हैं|  भगतपुरा गांव के इस देवी मंदिर की व्यवस्था देखने वाले ठाकुर दीपसिंह जी ने बताया कि मंदिर में दलित प्रवेश शुरू करने के बाद दलित इस मंदिर के रखरखाव, मरम्मत आदि कार्यों में बढ़ चढ़कर भाग लेते हैं और पुजारी की आय भी बढ़ी है| राजपूत परिवारों द्वारा राजपूत बहुल गांव के मंदिरों में दलित प्रवेश का यह मामला जहाँ सेकुलर गैंग द्वारा फैलाये दुष्प्रचार के मुंह पर तमाचा है वहीं अन्य लोगों के भी प्रेरणास्पर्ध है|

आपको बता दें गांव में हर व्यक्ति एक दूसरे से परिचित है और वह जानता है कि यह किस जाति का है मतलब जातीय पहचान होने के बावजूद मंदिरों में दलित प्रवेश पर कोई रोक नहीं है, जबकि शहरों में जातीय पहचान कोई मायने नहीं रखती और बड़े मंदिरों में प्रवेश के लिए किसी की जाति नहीं पूछी जाती है, तो फिर मंदिरों में दलितों को रोकने का तो कहीं कोई सवाल भी नहीं बचता, पर हमारे देश का महान मीडिया सनसनी फ़ैलाने के लिए किसी छोटी-मोटी घटना को तिल का ताड़ बनाकर पेश करने के लिए कुख्यात है|

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