बिरखा बिंनणी वर्षा वधू

मानसून पूर्व की वर्षा की बोछारें जगह-जगह शुरू हो चुकी है | किसान मानसून का बेसब्री से इंतजार करने में लगे है | और अपने खेतो में फसल बोने के लिए घास,झाडियाँ व अन्य खरपतवार काट कर (जिसे राजस्थान में सूड़ काटना कहते है ) तैयार कर वर्षा के स्वागत में लगे है | बचपन में सूड़ काटते किसानो के गीत सुनकर बहुत आनंद आता था लेकिन आजकल के किसान इस तरह के लोक गीत भूल चुके है |

जटक जांट क बटक बांट क लागन दे हब्बिडो रै,
बेरी धीडो रै , हब्बिडो |

इस गीत की मुझे भी बस यही एक लाइन याद रही है | जिन गांवों के निवासी पेयजल के लिए तालाबों,पोखरों व कुंडों पर निर्भर है वहां सार्वजानिक श्रमदान के जरिए ग्रामीण गांव के तालाब व पोखर आदि के जल संग्रहण क्षेत्र (केचमेंट एरिया ) की वर्षा पूर्व सफाई करने में जुट जाते है व जिन लोगों ने अपने घरों व खेतो में व्यक्तिगत पक्के कुण्ड बना रखे है वे भी वर्षा पूर्व साफ कर दिए जाते है ताकि संग्रहित वर्षा जल का पेयजल के रूप में साल भर इस्तेमाल किया जा सके |
शहरों में भी नगर निगमे मानसून पूर्व वर्षा जल की समुचित निकासी की व्यवस्था के लिए जुट जाने की घोषणाए व दावे करती है | ताकि शहर में वर्षा जल सडको पर इक्कठा होकर लोगों की समस्या ना बने हालाँकि इनके दावों की पहली वर्षा ही धो कर पोल खोल देती है |
कुल मिलाकर चाहे किसान हो या पेयजल के लिए वर्षा जल पर निर्भर ग्रामीण या शहरों की नगर पलिकाए या गर्मी से तड़पते लोग जो राहत पाने के लिए वर्षा के इंतजार में होते है , सभी वर्षा ऋतु के शुरू होने से पहले ठीक उसी तरह वर्षा के स्वागत की तैयारी में जुट जाते है जैसे किसी घर में नई नवेली दुल्हन के स्वागत में जुटे हो | शायद इसीलिए राजस्थान के एक विद्वान कवि रेवतदान ने वर्षा की तुलना एक नई नवेली दुल्हन से करते हुए वर्षा को बरखा बिन्दणी ( वर्षा वधू ) की संज्ञा देते हुए ये शानदार कविता लिखी है :

लूम झूम मदमाती, मन बिलमाती, सौ बळ खाती ,
गीत प्रीत रा गाती, हंसती आवै बिरखा बिंनणी |

चौमासै में चंवरी चढनै, सांवण पूगी सासरै,
भरै भादवै ढळी जवांनी, आधी रैगी आसरै
मन रौ भेद लुकाती , नैणा आंसूडा ढळकाती
रिमझिम आवै बिरखा बिंनणी |

ठुमक-ठुमक पग धरती , नखरौ करती
हिवड़ौ हरती, बींद पगलिया भरती
छम-छम आवै बिरखा बिंनणी |

तीतर बरणी चूंदड़ी नै काजळिया री कोर
प्रेम डोर मे बांधती आवै रुपाळी गिणगोर
झूंटी प्रीत जताती , झीणै घूंघट में सरमाती
ठगती आवै बिरखा बिंनणी |

घिर-घिर घूमर रमती , रुकती थमती
बीज चमकती, झब-झब पळका करती
भंवती आवै बिरखा बिंनणी |

आ परदेसण पांवणी जी, पुळ देखै नीं बेळा
आलीजा रै आंगणै मे करै मनां रा मेळा
झिरमिर गीत सुणाती, भोळै मनड़ै नै भरमाती
छळती आवै बिरखा बिंनणी |

14 Responses to "बिरखा बिंनणी वर्षा वधू"

  1. डॉ. मनोज मिश्र   June 17, 2009 at 1:51 am

    हमारी तरफ तो गीत सावन की फुहारों के बीच गाये जातें हैं .

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  2. Udan Tashtari   June 17, 2009 at 2:40 am

    आभार इस प्रस्तुति का.

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  3. रिमझिम बरसने लगी बूंदे यहाँ ब्लोग की दुनिया में भी। सर आनंद आ गया। वैसे कुछ शब्द के अर्थ नही पता हमें। पर भारतीय भाषाओं के गीतों के लय कानों को सकुनू मिलता है।

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  4. ताऊ रामपुरिया   June 17, 2009 at 4:31 am

    सही है, जैसे घर गृहस्थी को आगे बढाने के लिये नई बिंदणी की जरुरत होती है बैसे ही जीवन को आगे बढाने के लिये वर्षा की आवश्यकता होती है. हमारे कवियों ने बहुत ही सुंदरता से वर्षा की अगवानी के गीत लिखे हैं. बहुत आभार आपका इस कविता को पढवाने के लिये.

    रामराम.

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  5. P.N. Subramanian   June 17, 2009 at 5:20 am

    कविता तो सुन्दर ही है. वर्षा का स्वागत तो poore देश में ही होता है parantu rajasthan के लिए तो वह amrit है.

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  6. डॉ .अनुराग   June 17, 2009 at 8:18 am

    उम्मीद करते है बादल इसे सुन लेगे ……

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  7. Mired Mirage   June 17, 2009 at 9:28 am

    बहुत सुन्दर कविता है। यह बिंनणी शब्द पहली बार प्रभा खैतान के उपन्यास में पढा था। शायद बंनणा शब्द भी ऐसे ही बना होगा।
    घुघूती बासूती

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  8. Science Bloggers Association   June 17, 2009 at 12:32 pm

    वर्षा वधु का बडा सुंदर चित्रण है।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  9. रंजन   June 17, 2009 at 1:21 pm

    ठुमक-ठुमक पग धरती , नखरौ करती
    हिवड़ौ हरती, बींद पगलिया भरती
    छम-छम आवै बिरखा बिंनणी |

    बहुत अच्छा… लोक गीतों के साथ बारीश का मजा.. थोडे़ पकोडे़ हो जाये..:)

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  10. अतनो सुहाणो गीत आप नँ परोस्यो छे कअ आणंद होग्यो। आप क य्हाँ तो बौछाराँ आबा लागगी, पण य्हाँ तो म्हाँ हाल बाट ही न्हाळ रियाँ छाँ। आस तो छे के बेगी ई आवेगी बरखा बीन्दणी।

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  11. महेन्द्र मिश्र   June 17, 2009 at 4:08 pm

    रोचक प्रस्तुति .

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  12. राज भाटिय़ा   June 17, 2009 at 5:47 pm

    बहुत सी सुंदर शव्दो से आप ने यह लेख लिखा,जब मै भारत मै था तो बरसात वाले दिन अगर छुट्टी होती थी तो मां पुडे ओर पकोडे बनाती थी, हम बाहर से बरसात मै नहा कर आते थे, ओर फ़िर गर्मा गर्म पकोडे ओर पुडे खाने को मिलते थे….
    धन्यवाद

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  13. नरेश सिह राठौङ   June 18, 2009 at 2:42 pm

    बहुत सुन्दर कविता है । बरसात यहाँ आ चुकी है फसल भी बोयी जा चुकी है ।

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  14. Bhati1   July 29, 2012 at 11:00 am

    उत्कृष्ट प्रस्तुति।

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