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Friday, May 27, 2022

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बारिश का मौसम और बचपन के वे दिन

राष्ट्रिय राजधानी क्षेत्र में शनिवार रात्री से ही बारिश का मौसम बना हुआ है क्षेत्र के कभी इस हिस्से में तो कभी उस हिस्से में बारिश हो रही है दो दिन से सुहावना मौसम होने के चलते बिजली की खपत कम होने के कारण कट भी कम ही लग रहे है आज दिन भर बारिश की हल्की-हल्की फुहारों के बीच सुहावने मौसम में बाइक पर घूमना बड़ा सुखद लग रहा है

आज की फुहारों ने बचपन के बारिश के मौसम की याद दिला दी | हालाँकि राजस्थान में हमारे यहाँ बारिशे कम होती थी पर आज कल के मुकाबले तो ज्यादा ही थी | सावन के महीने में तो सात सात दिन की झड़ी लगती थी | बचपन में बारिश का मौसम शुरू होने के पहले ही वर्षा के स्वागत हेतु घर की छते झाड पोंछकर साफ़ करदी जाती थी ताकि छत के नाले से गिरने वाली वर्षा जल की मोटी धार के नीचे नहाने का लुफ्त लिया जा सके | उन दिनों बच्चों के शरीर पर घमोरियां भी खूब निकलती थी जिनसे निजात पाने के लिए मुसलाधार वर्षा का इंतजार रहता था ताकि वर्षा जल से नहाकर घमोरियों से छुटकारा पाया जा सके |

उन दिनों रसोई गैस के बारे में तो सुना भी नहीं था ,घर पर इंधन के तौर पर लकड़ी व उपलों का ही प्रयोग होता था ,लकड़ी में खेजड़ी नामक पेड़ से कटी सूखी टहनियां जिसे स्थानीय भाषा में छड़ियाँ कहा जाता ही बहुतायत से प्रयोग की जाती | वर्षा ऋतू के प्रारंभ होने से पहले इन छड़ियाँ के ढेर सारे छोटे-छोटे टुकड़े कर भीगने से सुरक्षित कर लिए जाते थे ताकि वर्षा की झड़ी लगने पर रसोई में इंधन की दिक्कत ना रहे |

कितने ही दिन की वर्षा झड़ी लगे हमारे स्कूलों की छुट्टी कम ही होती थी अत : स्कूल जाना अनिवार्य था | छतरी का हवा में उड़ने का डर रहता है और उसे साथ रखना भी उतना आसान नहीं होता जितना पोलीथिन की बनी घूग्गी होती है | यह पोलोथिन वाली घुग्घी भी बड़ी मजेदार होती थी पांव से लेकर सिर तक पूरा शरीर ढक कर वर्षा से भीगने से बचा देती थी | हालाँकि वर्षा में भीगने का आनंद तो बहुत आता था पर स्कूल जाते समय भीगने से बचना होता था जो घुग्घी बड़ा आसानी से कर देती थी | वर्षा की झड़ी लगने वालें दिनों स्कूल से वापसी के समय सबसे ज्यादा मजा आता था | घुग्घी में पुस्तकों का थैला लपेट कर पूरे चार किलोमीटर के रास्ते सड़क पर पैदल पानी पर छपाक छपाक करते हुए वर्षा जल से नहाते, खेलते , सड़क के साइड के गड्ढों में भरे पानी में एक दुसरे साथी को धक्का मारकर गिराते घर पहुँचते |

गांव के आस-पास दो तीन वर्षा पोखर भी थे जिनमे सिर्फ वर्षा ऋतू में पानी भरता था अत: रविवार के दिन सारा समय उन पोखरों में नहाने में ही बीतता था | इन पोखरों की वर्षा ऋतू शुरू होने से पहले ही श्रमदान द्वारा खुदाई करवा दी जाती थी ताकि वहां संचित होने वाला पानी पूरी वर्षा ऋतू तक व बाद में पशुओं की प्यास बुझाने में इस्तेमाल लाया जा सके | पानी सूखने के बाद इन पोखरों में सूखी गाद निकालने के लिए पंचायत बोली लगवाती थी जो ज्यादा रकम देता वही पोखर की गाद निकालकर अपने खेतों में खाद के रूप में इस्तेमाल करता | पोखर के जल संग्रहण क्षेत्र में पशुओं के गोबर का खाद जो वर्षा जल के साथ बहकर पोखर की गाद बन जाता है खेतों के लिए बहुत उपजाऊ होता है |

ऐसा नहीं है कि बचपन में वर्षा के सिर्फ मजे ही लिए जाते थे | वर्षा झड़ी लगने पर खेतों में सबको काम भी करना पड़ता था हालाँकि वर्षा में खेतों में और काम तो रुके रहते थे पर उस जगह जहाँ बाजरे की फसल के पौधे पास-पास ज्यादा संख्या में यानी घने होते थे को उखाड़ कर ऐसी जगह लगाया जाता था जहाँ पौधों की कमी होती थी और यह काम सिर्फ वर्षा झड़ी में ही संभव होता है कारण वर्षा झड़ी में ये पौधे तुरंत जड़ पकड़ लेते है यही नहीं इस तरह रोपे गए पौधे फसल की पैदावार भी बढ़िया देते है |

पर अब न तो उतनी बारिशे ही होती है और न उतनी लम्बी वर्षा झड़ियाँ लगती है गांव में आजकल के बच्चों को तो पता ही नहीं होता कि वर्षा झड़ियाँ क्या होती है और कभी वर्षा की झड़ी लग भी जाए तो आज की जनरेशन दुखी हो उठती क्योंकि उन्हें वर्षा के मौसम का सही मायने में लुफ्त उठाना ही नहीं आता | आजकल के माता -पिता भी बच्चो को वर्षा में नहाने के लिए मना कर देते है उन्हें यह खतरा सताता रहता है कि उनका बच्चा बारिश में भीगने से कहीं बीमार न पड़ जाये |

मेरी शेखावाटी: आकाल को आमंत्रित करते है ये टोटके
उड़न तश्तरी ….: संसाधन सीमित हैं, कृपया ध्यान रखें
ताऊ डाट इन: ताऊ पहेली – 81 (बेकल दुर्ग ,कासरगोड, केरल)
बन गए भुलक्कड़राम–क्या आप भी भूलते हैं?

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12 COMMENTS

  1. बारिश का मौसम और बचपन की यादों का जन्म-जन्मान्तर का नाता है. बारिश बड़े-बड़ा भी बच्चा बन जाता है…

    बाहर मानसून का मौसम है,
    लेकिन हरिभूमि पर
    हमारा राजनैतिक मानसून
    बरस रहा है।
    आज का दिन वैसे भी खास है,
    बंद का दिन है और हर नेता
    इसी मानसून के लिए
    तरस रहा है।

    मानसून का मूंड है इसलिए
    इसकी बरसात हमने
    अपने ब्लॉग
    प्रेम रस
    पर भी कर दी है।

    राजनैतिक गर्मी का
    मज़ा लेना,
    इसे पढ़ कर
    यह मत कहना
    कि आज सर्दी है!

    मेरा व्यंग्य: बहार राजनैतिक मानसून की

  2. what a memorable comments by you and supported by all respondents.
    waakai aaj apne bachpan ke voh din evam yaden kafi taja kar di hai, sab khuch vaisa hi hota tha, jaisa apne likha hai.
    aaj kal barish ka matlab pahle wala to raha hi nahi hai isse chahe aap global warming ka naam de do ya kucch or, pahle barish ka matlab tha lagaatar saat- ath din barsat hoti thi or log use kabhi din ya salo tak yaad karte the, ki wah kya barish hui hai ,jamaana bhi accha hota tha, is sab ke liye hum indra devata se kafi sifaris bhi karte the, use sayad hum khadi puja bolte the jo char se panch din ya jab tak chalti rahti thi jab tak barish na ho jahe. bacche ya bude sabhi isme jos se sarik hote the,or ant mei barish bhi bahut hoti thi, iise ap prakarti ka sahyog kahe ya khuch or.
    aap ka sansmarn jo "buland chhatisgarh"mei panch tarik ko chhapa hai bahut hi accha laga ki koi "gyan darpan" ko hindi mei hote hui bhi itna aage bada raha hai. wakai kabile tarif hai, hum saare hindustaani angreji ke picche itni teji se bhag rahe hai ki humne hamari sanskriti ya hindi bhasa ko itna piche chhod diya hai ki hame khud bhi aaj dhundali najar aane lagi hai,your efforts in gyan darpan are very commendable,is koshis mei hum sab apke sath ekjut hai,jai hind
    chain singh shekhawat

  3. हमें तो हमारे बडों ने कभी भी बारिश में भीगने से नहीं रोका और ना ही हम अपने बच्चों के रोकते हैं।
    हम भी स्कूल बस्ते को पालीथीन में लपेट कर भीगते हुये आते थे। और आज भी ऐसा ही करते हैं।

    प्रणाम

  4. बचपन के वो सुहाने दिन काश लोट आते | आपने तो सचमुच घुघी में लिपटने का मूड बना दिया है | लेकिन आजकल बाजार से घुघी भी गायब हो गयी है |आज भी बारिश जम कर हुई है |

  5. बहुत ही अच्छी प्रस्तुति..आज से १५-२० साल पहले भी बारिशों का जो लुत्फ़ हम उठा पाते थे वह आज की पीढ़ी नहीं उठा सकती..एक तो अब इतनी बारिशें नहीं होतीं.दूसरे शायद उनमें वो क्रेज भी नहीं है.और बाकी आप ने भी कहा खुद माता पिता ही बच्चों को भीगने से मना करते हैं.
    अच्छा लगा यह संस्मरण .

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