बदहाल लोकतंत्र : जिम्मेदार कौन ?

बदहाल लोकतंत्र : जिम्मेदार कौन ?

देश में लोकतंत्र की बदहाली पर चर्चा चलते ही इसकी बदहाली को लेकर लोकतंत्र के चार में से तीन स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका और प्रेस पर आरोपों की झड़ी लग जाती है| चर्चा चाहे किसी चौपाल पर हो या सोशियल साईट पर, निशाने पर लोकतंत्र के ये तीनों स्तंभ ही रहते है| पहले भ्रष्टाचार के मामलों में लोगों के निशाने पर राजनेता और कार्यपालिका के अफसर कर्मचारी ही रहते थे पर आजकल सोशियल साईटस पर सबसे ज्यादा निशाना प्रेस पर साधा जा रहा है और वो भी सबसे ज्यादा टीवी मीडिया पर|

पहले जब तक सोशियल मीडिया नहीं था तब तक आम लोगों तक वे ही ख़बरें व सूचनाएँ पहुँच पाती थी जो मीडिया उन तक पहुँचाना चाहता था| पर आजकल सोशियल मीडिया और ब्लॉगस के बढते चलन के चलते ऐसी सूचनाएँ जो मीडिया किसी वजह से आम जनता तक पहुंचने से रोक देता है भी आसानी से पहुंचने लगी| और इसी कारण आम लोगों को समझ आया कि मीडिया बहुत सी सूचनाएँ अपने फायदे के लिए छुपा जाता है|

पर अब मीडिया द्वारा छुपाई गई या अनदेखी की गई सूचना सोशियल मीडिया द्वारा मिल जाती है तब आम आदमी समझ जाता है कि इस मामले में मीडिया मैनेज हुआ है| और जाहिर है मीडिया मैनेज होता है तो फ्री में तो होगा नहीं| उसे किसी सूचना को दबाने या प्रतिपक्षी दल की छवि खराब होने वाली सूचनाओं को प्रसारित करने के बदले बेशक विज्ञापनों के रूप में धन मिले या सीधा, पर आजकल जनता सब समझ जाती है और उसे अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने का औजार भी सोशियल साईट के रूप में मिला हुआ है जहाँ वह अपनी पुरी भड़ास निकालती है|

मीडिया ही क्यों ? राजनेताओं व सरकारी अधिकारियों द्वारा किये मोटे मोटे घोटालों की पोल खुलने के बाद आम जनता इनको भी लोकतंत्र का बेड़ा गर्क करने को जिम्मेदार मानती है|

पर लोकतंत्र की बदहाली के लिए चलने वाली बहस में उस धरातल की भूमिका पर कोई चर्चा नहीं करता जिस धरातल पर लोकतंत्र के चारों स्तंभ टिके है| लोकतंत्र के धरातल से मेरा मतलब आम जनता और उस समाज से है जहाँ से लोकतंत्र के चारों स्तंभों में लोग आते है| यदि उस धरातल यानी उस समाज के सामाजिक चरित्र में ही भ्रष्टाचार घुला होगा तो उसमें से निकले लोग कहीं भी जायें वे अपना आचरण उसी सामाजिक चरित्र के आधार पर ही करेंगे| आज भले कोई राजनेता हो, अफसर हो या पत्रकार उसका सामाजिक चरित्र वही होगा जो उस समाज का होगा जिसका वह अंग है|

यही नहीं लोकतंत्र के इस धरातल रूपी चरित्र भी पर भी हम नजर डाल लेते है –

लोकतंत्र का धरातल रूपी मतदाता यानि आम आदमी वोट देते समय धर्म या जाति पहले देखता है| कोई कितना ही काबिल व ईमानदार प्रत्याशी चुनाव में क्यों ना हो मतदाता वोट देते समय पहले उसकी जाति व धर्म देखता है उसके बाद स्वजातिय व स्वधर्म वाले को वोट देता है बेशक उसका स्वजातिय उम्मीदवार अयोग्य या भ्रष्ट ही क्यों ना हो ! ऐसी हालात में राजनैतिक पार्टियां भी धार्मिक या जातिय वोटों की अधिकता देखते हुए ही प्रत्याशी चुनाव में उतारेगी| हर पार्टी का ध्येय चुनाव जीतकर सत्ता हासिल करना होता है ऐसे में हर दल वोटों की गणित देखकर ही प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरेगा जिसे हम गलत कैसे कह सकते है ? आखिर जिस जातिवाद व संप्रदायवाद को बढाने का आरोप हम राजनैतिक दलों पर लगा रहें है उसे बढाने की पहल तो सर्वप्रथम हम ही करते है|

अक्सर चुनावों में देखा जाता है कि मतदाता प्रत्याशियों से शराब या धन लेकर वोट डालते है| अब जो प्रत्याशी वोट खरीदने के लिए धन खर्च करेगा तो वसूलेगा भी| और बिना भ्रष्टाचार के ऐसे धन की वसूली होती नहीं|

आज किसी भी राजनैतिक दल द्वारा आयोजित रैलियों में अक्सर सुनने देखने को मिलता है कि भीड़ बढाने के लिए लोग रूपये लेकर रैलियों में भाग लेते है| इस तरह की रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए राजनैतिक दल मोटा खर्च करते है जाहिर है सता में आने के बाद वह जनता के पैसे से ही वसूल करेंगे|

लोकतंत्र की बदहाली व भ्रष्टाचार के राजनैतिक दलों, कार्यपालिका और प्रेस पर आरोप लगाने के बजाय हमें अपने अंदर भी झांकना चाहिए कि- लोकतंत्र की इस बदहाली के लिए हम जो इस लोकतंत्र का धरातल है खुद कितने जिम्मेदार है ? हमें आरोप लगाने के बजाय खुद को बदलना होगा और ये बदलाव भी तभी आयेगा जब हम खुद से इसकी शुरुआत करेंगे| यदि हमारा सामाजिक चरित्र अच्छा होगा तो हमारे ही समाज से निकल कर लोकतंत्र के स्तंभों में जाने वाले लोग चरित्रवान होंगे और तभी यह लोकतंत्र सही मायने में लोकतंत्र कहलायेगा|

आज यदि मतदाता जातिय व धार्मिक आधार पर वोट देना बंद करदे, चुनाव में धन वितरित करने वाले प्रत्याशी को हराकर सबक सिखाये, किसी बदमाश, भ्रष्ट व अपराधी को वोट ना दे तो शायद ही कोई राजनैतिक दल ऐसे प्रत्याशियों को चुनाव में खड़ा करने की हिम्मत जुटा पाये|

9 Responses to "बदहाल लोकतंत्र : जिम्मेदार कौन ?"

  1. पूरण खण्डेलवाल   February 10, 2013 at 12:06 pm

    आपका कहना सही है चुनावों में निरंतर धनबल का प्रयोग बढ़ रहा है लेकिन अगर जनता सचेत हो जाए तो कोई सा बल भी नहीं चल सकता लेकिन सबसे बड़ी समस्या तो यही है कि जनता हि तो नहीं समझ रही है !

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  2. Vikesh Badola   February 10, 2013 at 12:29 pm

    किसी भी तंत्र के लिए कुछ नियम होते हैं, उनका सर्वप्रथम पालन समाज को नहीं सत्‍ताधारियों को करना होता हैं। क्‍यूंकि जब सत्‍ता अपनी मर्जी से अनेक सामाजिक विघटन कर सकती है तो कई अच्‍छे कार्य भी कर सकती है। लेकिन वह ऐसा नहीं करती। समाज सत्‍ता से शासित होता है ना कि समाज से सत्‍ता। समाज अपने स्‍तर पर विद्रोह के अतिरिक्‍त कुछ नहीं कर सकता। ऐसा विद्रोह, जिससे सम्‍पूर्ण विसंगतियों को जड़मूल नष्‍ट किया जा सके।

    Read more: https://www.gyandarpan.com/2013/02/blog-post_10.html#ixzz2KUy2has7

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  3. प्रवीण पाण्डेय   February 10, 2013 at 12:35 pm

    जो देते, वह पा जाते हैं,
    जानो, यह ही लोकतन्त्र है,
    भरते, फिर भी दुहराते हैं,
    जानो, यह ही लोकतन्त्र है।

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  4. काजल कुमार Kajal Kumar   February 10, 2013 at 1:26 pm

    मै तो अभी इंतज़ार कर रहा हूं कि जिस दिन देहात तक का भी हर आम आदमी सोशल मीडिया से जुड़ जाएगा तब इस तरह के ढकोसलेबाज़ वर्तमान मीडिया की क्या गत होगी

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    • Ratan Singh Shekhawat   February 10, 2013 at 1:49 pm

      काजल कुमार जी
      फेसबुक गांवों में पहुँच गयी पर अभी मोबाइल पर ज्यादा है कई मोबाइल हिंदी स्पोर्ट नहीं करते इसलिए पूरी बात उन तक पहुँच नहीं रही | गांवों में बच्चे धड़ल्ले से मोबाइल पर नेट इस्तेमाल कर रहे है |

      दो साल पहले गांव में मुझे देख चौपाल में बैठे एक बच्चे ने दुसरे से पुछा ये कौन है ?
      जबाब में अक्सर बच्चे- बच्चे का नाम लेते हुए ही बताते है कि फलां बच्चे के पापा है|
      पर दुसरे बच्चे ने जबाब दिया- इन्हें नहीं जानता ? ये भगतपुरा.कॉम वाले काका सा है |
      मतलब मुझे गांव के ब्लॉग से जाना गया 🙂

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (11-02-2013) के चर्चा मंच-११५२ (बदहाल लोकतन्त्रः जिम्मेदार कौन) पर भी होगी!
    सूचनार्थ.. सादर!

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  6. कैसा,यह गणतंत्र हमारा

    भ्रष्टाचार , भूख से हारा
    वंसवाद का लिये सहारा
    आरक्षण की बैसाखी पर,टिका हुआ यह तंत्र हमारा,

    कैसा,यह गणतंत्र हमारा

    महंगाई ने पैर पसारा
    वोटो को नोटों ने मारा
    जाति-धर्म के नाग-पाश में,भ्रमित रहा मतदान हमारा,

    कैसा यह गणतंत्र हमारा

    संसद में लगता यह नारा
    जन से है जनतंत्र हमारा
    लोकपाल भी लोभपाल से ,आज वही पर देखो हारा,

    कैसा,यह गणतंत्र हमारा,

    RECENT POST… नवगीत,

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  7. ताऊ रामपुरिया   February 11, 2013 at 7:04 am

    शायद वह समय भी आयेगा जल्द ही.

    रामराम.

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  8. Gajendra singh Shekhawat   February 11, 2013 at 7:39 am

    आम जनता को जातिवाद व् धर्मवाद के मोह को त्यागना होगा ,प्रेरक प्रसंग)

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