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बच्चों के भविष्य के साथ, ठीक नहीं खिलवाड़

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कुम्हार के घड़े की मिट्टी की तरह होता है नन्हा बालक, जिसे माता-पिता व गुरूजन जैसा बनाना चाहें वैसा बना सकते हैं। परिवार शिशु की प्रथम पाठशाला है। माता-पिता के क्रिया-कलापों, उनके आचरण, उनके व्यवहार को बालक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ग्रहण करता है और यहीं से शुरू होता है उसके भविष्य का निर्माण।

एकजुटता, शक्ति प्रदर्शन अच्छी बात है, इससे एक तरफ जहाँ आत्मविश्वास बढ़ता है वहीं दूसरी ओर उन लोगों को प्रेरणा मिलती है जो मानवता के लिए, समाज के लिए, देश के लिए और खास कर भावी पीढ़ी के लिए कुछ करना चाहते हैं।

हरियाणा अभिभावक एकता मंच के बैनर के तले हल्ला बोल रैली जिसमें सर्व कर्मचारी संघ हरियाणा, सी.आई.टी.यू. इत्यादि संगठनों ने हिस्सा लिया और कहा कि ३1 जुलाई तक जनप्रतिनिधियों ने स्कूलों की मनमानी के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया तो उनका पुतला फूंका जाएगा।

अभिभावकों का ट्रेड यूनियन नेताओं की तरफ रूझान व उनकी भाषा जहाँ उनके नेतागिरी की तरफ अधिक और बच्चों के भविष्य की तरफ कम ध्यान के बारे में सोचने को मज़बूर करती है, वहीं सवाल पैदा होता है कि क्या पुतला फूंकने या हल्ला बोलने से, यातायात अवरूद्ध करने से या फीस कम करवाने से बच्चों की शिक्षा का स्तर सुधर् जाएगा ? बच्चे कर्त्तव्यपरायण, सहिष्णु, उदार, संस्कारी और चरित्रवान बन जाएँगे जो भारतीय संस्कृति की समृद्धता के लिए अनिवार्य है ?

अगर हम अच्छा खाने, अच्छा पहनने, अच्छी सुख सुविधाएँ पाने की इच्छा रखते हैं तो उसके अनुसार हमें दाम भी चुकाने होते हैं। अगर कोई अधिक वसूलता है तो कानून के दायरे में रह उसकी शिकायत की जा सकती है परतु किसी को जबरन मजबूर नहीं किया जा सकता कि दाम हमारी इच्छानुसार ही लें।

इन सब से अधिक महत्वपूर्ण है मेरे भारत की भावी पीढ़ी का भविष्य। बच्चे के अंत:करण में जैसा बीज रोपा जाएगा वो प्रस्फुटित होने पर वैसा ही फल समाज को देगा। बच्चों को आदर्शवान व अनुशासित बनाने के लिए आवश्यक है कि बच्चों को आदर, श्रद्धा, स्नेह, सौहार्द, सद्भावपूर्ण वातावरण प्रदान किया जाए जिससे वह एक अच्छा नागरिक बन समाज व देश का नाम ऊँचा कर सकें।

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