प्राचीन शेखावाटी प्रदेश में गुप्त काल

प्राचीन शेखावाटी प्रदेश में गुप्त काल

शेखावाटी प्रदेश में गुप्त काल : गुप्त सम्राटों के सत्ता में आने से पहले दूसरी शताब्दी ईस्वी में मत्स्य जनपद पर अनेक गणतंत्री कबीलों के शासन करते रहने के प्रमाण मिलते हैं, जिनमें आर्जुनायन मुख्य थे। विदिशा, पद्मावती और कांतिपुरी के नागों (भारशिवों) की भांति – यहां के शासक कुल भी पूर्ण रूपेण स्वतंत्र थे। उनके समय में काबुल, कंधार और पंजाब पर कुषाणों का अधिकार हो चुका था। कुषाण शासकों को पंजाब से आगेे बढने से रोकने हेतु वे कुल अर्गला का काम कर रहे थे। तब यहां पर उनके शक्तिशाली संगठन थे। मत्स्य जनपद के पूर्व में शौरसेनी यादव, दक्षिण में कर्कोटक नगर के मालव, चित्तौड़ के समीपस्थ मध्यमिका के शिवि आदि अन्य अनेक गणतंत्री कुल विद्यमान थे। उत्तर से कुषाणों एवं दक्षिण पश्चिम से शकों के आक्रमणों का उन्हें निरन्तर प्रतिरोध करना पड़ रहा था। सन् 175-180 ई. के लगभग कुषाणों के पतनकाल में वीरसेन यादव ने कुषाणों को हटा कर मथुरा पर पुनः अधिकार जमा लिया था। डॉ. जायसवाल उसे नागवंशी मानते हैं। किन्तु उनके मतानुसार नाग भी पंजाब के टक्क जनपद से आए हुए यादवों की ही एक प्राचीन शाखा से थे। नाग भी मूलतः गणतंत्री कुलों के ही प्रतिनिधि थे 21।

गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त ने सत्ता में आते ही सर्वप्रथम नाग राजाओं को पराजित करके उनके राज्य समाप्त किए। तत्पश्चात् उसने राजस्थान के स्वतंत्रता प्रेमी गणराज्यों को उसकी आधीनता स्वीकार करने को बाध्य किया। किन्तु उस सम्राट ने उनकी आन्तरिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं किया। वे उसके करद राज्य बने रहे। उनके राजदूत (प्रतिनिधि) सम्राट के दरबार में उपस्थित रहा करते थे। सम्रद्रगुप्त के प्रयाग वाले प्रशस्ति स्तंभ लेख में जिन गणतंत्री कुलों के उसके आधीन होने का उल्लेख है, उनमें मालव, आर्जुनायन, योधेय, आभीर, मद्रक आदि के नाम मुख्य हैं 22।

मत्स्य प्रदेश में उस काल जिन गण-राज्यों का उदय हुआ अथवा जो किसी न किसी रूप में पहले से विद्यमान थे- उन सब के नाम और तद्विषयक इतिहास जानने के लिए प्रामाणिक सामग्र्री उपलब्ध नहीं है। इतिहासज्ञों का मानना है कि आर्जुनायनों का गणतंत्री कुल उस काल मत्स्य के ही किसी भाग पर शासन कर रहा था। वहां से प्राप्त उनकी मुद्राओं पर ‘आर्जुनानाम् जयः’ के श्रुति वाक्य ;स्महमदकद्ध टंकित हैं 23। डॉ. दिनेशचन्द्र ने आर्जुनायनों को हैहयवंशी सहस्त्रार्जुन के वंशज माना है 24। यदि डॉ. शुक्ल के मतानुसार आर्जुनायनों को हैहयवंशी क्षत्रिय मान लिया जावे तो फिर यह मानने में भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि मध्यकाल के डाहलिया राजपूत जो अपने को हैहयवंशी क्षत्रिय मानते और डाहल प्रान्त के मूल निवासी होने के कारण डाहलिया कहलाते थे- इसी आर्जुनायन कबीले से प्रादुर्भूत किसी शाखा के प्रतिनिधि थे। राजपूतकाल के प्रारंभ में नांण-अमरसर के आसपास के इलाके पर डाहलियों का राज्य होने की दन्तकथाएं प्रचलित हैं। खण्डेला का इलाका भी कभी डाहलियों के अधिकार में था। निरबाण चैहानों ने डाहलियों का पराभव करके ही खण्डेला पर अपना अधिकार जमाया था।
डॉ. दिनेशचन्द्र शुक्ल की मान्यता के विपरीत डॉ. जायसवाल का मत है कि आर्जुनायन – पाण्डव अर्जुन के वंशज होने चाहिए 25। डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी ने भी डॉ. जायसवाल के मत की ही पुष्टि की है 26। यदि उपर्युक्त अनुमान सही हो तो लेखक की यह मान्यता सही होनी चाहिए कि आज की तंवरावाटी के तंवर राजपूत ही उस काल के आर्जुनायनों के वंशज हैं। तंवर अपने को प्रारंभकाल से अब तक पाण्डव अर्जुन की वंशपरम्परा में मानते आ रहे हैं। और कदीम से इसी भू-भाग पर कभी सबल तो कभी निर्बल रह कर भी अपना अस्तित्व यथावत बनाए हुए हैं। प्राचीनकाल से उनमें प्रचलित बराबर भाई बंटवारे की प्रथा, जिसे ‘तंवर्या बंट’ कहते हैं, उनके गणतंत्री पूर्वजों के वंशज होने के अनुमान की ही पुष्टि करती है। परम्परा से तंवरों के जातीय ध्वज पर हनुमानजी का चित्र अंकित रहना – पाण्डव अर्जुन के कपिध्वज की परम्परा की याद दिलाता है।

ओझाजी ने आर्जुनायनों का राज्य अलवर राज्य के समीपस्थ किसी भाग पर होने का अनुमान लगाया है 27। उनके हाथ से राज्य का बड़ा भाग निकल जाने पर सिमटते हुए वे केवल इसी सीमित क्षेत्र के शासक बने रह गए 28। पहली दूसरी शताब्दी ईस्वी के लगभग ही योधेयों ने भी अपने मूल स्थान सतलुज नदी के दोनों तटों से उठकर दक्षिण में बढते हुए कुरु के पश्चिमी भाग (आज के हरियाणा) को जीत कर राजस्थान के पूर्वोतरी भाग पर जो उस काल जांगल देश का एक भाग था – अधिकार जमा लिया 29। किन्तु उन्होंने अपने पड़ोसी आभीरों और आर्जुनायनों से छेड़छाड़ नहीं की जो उन्हीं की भांति गणतंत्री कुल थे। मथुरा के शौरसेनी यादवों के वंशजों ने मथुरा जनपद के समीपस्थ मत्स्य के कुछ भागों पर अपने राज्य स्थापित कर लिए थे। मौखरियों बरीकवंशियों एवं टांकों (नागों) के भी छोटे-छोटे राज्य उस काल मे अस्तित्व में थे 30।
भारतवर्ष में गुप्त साम्राज्य स्थापन के समय – मत्स्य जनपद और उसके आस-पास के अन्य विभिन्न नाम वाले भू-क्षेत्रों पर संभवतया यही ऊपर कथित कुल शासन कर रहे थे। गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त ने उन गणराज्यों को अपने करद राज्य बना लिए, किन्तु उनकी आन्तरिक स्वतंत्रता में हस्तक्षप नहीं किया। परन्तु उसके पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय ने- जिसने विक्रमादित्य का महान विरुद धारण किया था – उन गणतंत्री कुलों को सर्वथा शक्क्ति हीन बना दिया। उनमें प्रचलित परम्परागत संघ प्रणाली का तब कोई उपयोग नहीं रहा।

सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय ने गणतंत्री कुलोद्धव अनेक महत्वाकांक्षी वीर पुरुषों को बड़े राज्यों के शासक पदों पर आरूढ़ करके अपने अधीनस्थ सामन्त बना लिया 31। फिर तो उन शासक बनाए गए प्रधान पुरुषों से नए शासक धरानों का उदय हुआ। केवल योधेयों, आभीरों और यादवों को छोड़ कर अन्य उन सभी गणतंत्री कुलों के नाम भुला दिए गए – जिनका उल्लेख सम्राट समुद्रगुप्त के प्रयाग वाले स्तंभ लेख में मिलता है। तब तो ओलिकर, परमार, निकुंभ,भाटी, डाहलिया, तंवर, दहिया, चाहमान, गुहिल आदि नामों से नए शासक धराने इस देश के राजनैतिक रंगमंच पर प्रगट हुए। वे सभी राजपूत कुल – शिवि मालव, साल्व, आर्जुनायन और नाग कुलों से किसी न किसी रुप में सम्बद्ध थे। उनकी उत्पति की कहानी- पाश्चात्य विद्वानों का अनुकरण करते हुए – मनमाने अनुमानों के आधार पर अन्यत्र खोजना व्यर्थ है उन राजपूत कुलों में अद्यावधि प्रचलित रीतिरिवाज और कुलों पर आधरित उनका सामाजिक ढांचा, उन्हें गणतंत्री कुलों के वंशज सिद्ध करने के लिए यथेष्ठ आधार है। उनमें प्राचीनकाल से अद्यावधि प्रचलित रीतिरिवाजों एवं कुलों पर आधारित सामाजिक ढांचे पर कुछ विशेष प्रकाश डालने का परिशिष्ट संख्या (4) पर किंचित् प्रयास किया गया है।

सन्दर्भ : 21. अंधकार युगीन भारत पृ. 33, 40, 60, 61, 98, 99 डॉ. जायसवाल।, 22. वही पुस्तक पृ. 273 – प्रयाग प्रशस्ति लेख की 22वीं पंक्ति।  Raasthan through the ages p. 60 Dr. Dasharath Sharma. , 23. अंधकार युगीन भारत पृ. 275, 24- Early History of Rajasthan p. 31, 25. हिन्दू राज्यतंत्र पृ. 182, 26. विक्रम स्मृतिग्रंथ (2001 वि.) पृ. 192, 27. ओझा – राजपूताने का इतिहास प्रथम भाग पृ. 112, 28. तंवरवाटी के तंवरों का दिल्ली के तंवरों का वंशज होने और वहीं से इधर आने की अनुश्रुति में कोई प्रमाणिकता नहीं है। यह अवश्य संभव माना जा सकता है कि आर्जुनायन में से किसी साहसी व्यक्ति ने कुरु जनपद में जाकर राज्य स्थापित किया हो। ‘दिल्ली के तोमर’ नामक ग्रंथ के लेखक पं. हरिहर निवास द्विवेदी ने दिल्ली के तोमरों का आदि स्थान चम्बल क्षेत्र के तंवरघार को माना है। इसी भांति तंवरावाटी के तंवरों का निकास भी चम्बल का क्षेत्र ही माना है। किन्तु उक्त विद्वान ने सारा ही ग्रंथ मनमानी कल्पना के आधार पर लिखा है।, 29. हिन्दू राज्यतंत्र पृ. डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल, 30. मोखरीवंश की जानकारी के लिए बडवा (कोटा) का कृत सम्वत् 295 का यूप-स्तंभ लेख तथा बरीक वंशियों के लिए विजयगढ़ स्तूप लेख मालव सम्वत् 428 का दृष्टव्य है। उस काल कृत् और मालव सम्वतों के नाम से विक्रम सम्वत् का ही प्रचलन था। (राजस्थान इतिहास के श्रोत पृ. 45), 31. राजस्थान थू्र दी एजेज पृ. 101, 102 डॉ. दशरथ शर्मा।

लेखक : ठाकुर सुरजनसिंह शेखावत : पुस्तक – “शेखावाटी प्रदेश का प्राचीन इतिहास”

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