प्रतिहार राजवंश पर इतिहासकार जगदीशसिंह गहलोत ने जो लिखा

प्रतिहार राजवंश  क्षत्रिय या गुर्जर :  इतिहासकार जगदीशसिंह गहलोत ने राजपूत शासनकाल की कमियों पर बेबाकी से कलम चलाई है, जिसे पढने के बाद उन पर यह आरोप कोई नहीं लगा सकता कि वे राजपूतों के दरबारी इतिहासकार थे | उन्होंने प्रतिहार राजवंश के गुर्जर जाति से सम्बन्ध होने के मामले में भी अपने शोध के आधार पर लिखे निबन्ध में कलम चलाई है | “स्वतंत्रतापूर्व राजस्थान” पुस्तक स्व. गहलोत द्वारा लिखे निबंधों का संग्रह है | इसमें प्रतिहार राजवंश पर उन्होंने विस्तार से लिखा है | इस पुस्तक के पृष्ठ संख्या 33 पर स्व. लिखा है कि –

“प्रतिहार राजवंशी क्षत्रिय है या गुर्जर, यह भी विवादस्पद है | बाउक के वि.स. 894 ई.स. 837 के लेख में स्पष्ट लिखा है कि प्रतिहार हरिशचंद्र की क्षत्रिय राणी भाद्रा से चार पुत्र उत्पन्न हुए | हरिशचंद्र की एक और राणी ब्राह्मण थी | इससे उत्पन्न पुत्र ब्राह्मण प्रतिहार कहलाये | क्षत्रिय राणी भाद्रा से उत्पन्न पुत्रों ने ही अलग अलग राज्य स्थापित किये थे | हरिशचंद्र जो संभवत: गुप्त सम्राटों का ही महाप्रतिहार था, ने गुप्त साम्राज्य के पतनकाल में वर्तमान जोधपुर राज्य के आसपास के क्षेत्र में अपना स्वतंत्र राज्य छठी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में स्थापित किया | उस वक्त यह क्षेत्र गुर्जरात्रा कहलाता था | यह राज्य वर्तमान डीडवाना से राजोर (अलवर) तक फैला था |

वर्तमान जोधपुर राज्य का काफी हिस्सा जालोर, भीनमाल आदि भी इसी क्षेत्र में आते थे | इस गुर्जरात्रा का वर्तमान गुजरात प्रान्त से कोई सम्बन्ध नहीं था | वर्तमान गुजरात्रा प्रान्त इसके काफी समय बाद इस नाम से कहलाया जाने लगा | गुजरात्रा के मूल निवासी होने के कारण यहाँ के प्रतिहार गुर्जर प्रतिहार कहलाये | इनका गुर्जर जाति से कोई सम्बन्ध नहीं था |”

तो इस तरह इतिहासकार स्व. जगदीश सिंह गहलोत ने साफ़ किया कि प्रतिहारों के साथ गुर्जर शब्द देशवाचक था, ना कि जातिवाचक | स्व. गहलोत ने प्रतिहारों को साफ़ शब्दों में क्षत्रिय लिखा है और वर्त्तमान में क्षत्रिय राजपूत नाम से जाने जाते हैं | अब कोई यह कहे कि राजपूत शब्द की उत्पत्ति बाद में हुई, पर आज जब क्षत्रिय और राजपूत शब्द एक दूसरे के पर्यायवाची बन गये तो राजपूत शब्द की उत्पत्ति पर बहस बेमानी है |

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