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Sunday, May 22, 2022

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प्रतिहार क्षत्रिय राजवंश संक्षिप्त परिचय

प्रतिहार क्षत्रिय वंश का बहुत ही वृहद इतिहास रहा है इन्होंने हमेशा ही अपनी मातृभूमि के लिए बलिदान दिया है, एवं अपने नाम के ही स्वरुप प्रतिहार यानी रक्षक बनकर हिंदू सनातन धर्म को बचाये रखा एवं विदेशी आक्रमणकारियों को गाजर मूली की तरह काटा डाला, हमें गर्व है ऐसे हिंदू राजपूत वंश पर जिसने कभी भी मुश्किल घड़ी मे अपने आत्म विश्वास को नहीं खोया एवं आखरी सांस तक हिंदू सनातन धर्म की रक्षा की।
गुहिल, सोलंकी, चौहान आदि कई राजवंशों के नामकरण उनके मूल पुरुषों के नाम पर प्रचलित हुए हैं, पर प्रतिहार वंश का नामकरण उनके मूल पुरुष के नाम पर नहीं होकर राज्याधिकार के पद पर प्रचलित हुआ है। राज्य के विभिन्न अधिकारियों के पद नामों में एक पद प्रतिहार के नाम पर भी होता था, जिसका कार्य राजा के बैठने के स्थान या आवास पर रहकर उसकी रक्षा का दायित्व निभाना था। एक तरह से उसका काम अंगरक्षक की भांति होता था। इस पद पर राजा के अतिविश्वसनीय व्यक्ति को नियुक्त किया जाता था, जो राजा का पारिवारिक सदस्य या कोई भी विस्वासपात्र व्यक्ति हो सकता था। उसकी नियुक्ति की आहर्ता वीरता के साथ स्वामिभक्ति व विश्वासपात्रता ही प्रमुख थी, यही कारण था कि प्रतिहार पद पर नियुक्ति के लिए किसी खास जाति या वर्ण का विचार नहीं रहता था। प्राचीन शिलालेखों में प्रतिहार या महाप्रतिहार नाम मिलता है और स्थानीय भाषाओं में परिहार, पड़िहार आदि शब्द भी प्रयुक्त किये जाते है। ‘‘प्रतिहार नाम वैसा ही है जैसा कि पंचकुल (पंचोली)। पंचकुल राजकर वसूल करने वाले राजसेवकों की एक संस्था थी, जिसका प्रत्येक व्यक्ति पंचकुल कहलाता था। प्राचीन दानपत्रों, शिलालेखों तथा प्रबन्ध चिंतामणि आदि पुस्तकों में पंचकुल का उल्लेख मिलता है। राजपूताने में ब्राह्मण पंचोली, कायस्थ पंचोली, महाजन पंचोली और गुजर पंचोली है, जिनमें अधिकतर कायस्थ पंचोली है। इसका कारण यह है कि कि ये लोग विशेषकर राजाओं के यहाँ अहलकारी का पेशा ही करते थे। पंचकुल का पंचजल (पंचोल) और पंचोली शब्द बना है। जैसे पंचोली नाम किसी जाति का सूचक नहीं, किन्तु पद का सूचक है, वैसे ही प्रतिहार शब्द भी जाति का नहीं, किन्तु पद का सूचक है। इसी कारण शिलालेखादि में ब्राह्मण प्रतिहार, क्षत्रिय (रघुवंशी) प्रतिहार और गुर्जर (गुजर) प्रतिहारों का उल्लेख मिलता है। आधुनिक शोधकों ने प्रतिहार मात्र को गुजर मान लिया है। जो भ्रम है।1

  • रघुवंशी क्षत्रिय प्रतिहार

मिहिर भोज की ग्वालियर प्रशस्ति में प्रतिहारों को राम के छोटे भाई लक्ष्मण का वंशज बतलाया गया है। इस अभिलेख में कहा गया है कि इस वंश के मूल पुरुष मेघनाद के विरुद्ध युद्ध करके शत्रुओं की शक्ति को अवरुद्ध करने वाले लक्ष्मण थे। जिन्होंने राम के लिए द्वारपाल की भूमिका निभाई थी। उन्हीं के वंशज प्रतिहार कहलाये। ‘‘प्रतिहारों की मांडव्यपुर शाखा के शासक बाउक के जोधपुर अभिलेख में स्पष्टतः यह कहा गया है कि रामचंद्र के अनुज (लक्ष्मण) ने अपने भाई के लिए प्रतिहार का कार्य किया था। इसीलिए उनके वंशज प्रतिहार नाम से विख्यात हुए।

स्वभ्राता रामभद्रस्य प्रतिहार्य कृतं यतः।
श्री प्रतिहारवंशोयं अतश्योन्नतिमाप्नुयात्।।
एपिग्राफिया इण्डिका, श्लोक 18, पृष्ठ 95-97

अधिकांशतः अभिलेख एवं साहित्य प्रतिहारों की क्षत्रिय उत्पति का ही समर्थन करते है। मिहिर भोज की ग्वालियर प्रशस्ति में वत्सराज को ‘‘एकक्षत्रियपुंग’’ कहा गया है तथा महाकवि राजशेखर महेंद्रपाल को ‘‘रघुकुलतिलक’’ और उसके पुत्र महिपाल को ‘‘रघुवंश मुक्तामणि’’ कहकर संबोधित करता है। उपर्युक उपर्युक्त तथ्यों में अनेक भारतीय इतिहासकार प्रतिहारों को सूर्यवंशी क्षत्रिय मानते है।2

इस तरह यह तय है कि प्रतिहार शब्द की उत्पत्ति किसी मूल पुरुष के नाम पर ना होकर पद के नाम पर है और क्षत्रिय प्रतिहार लक्ष्मण द्वारा अपने भ्राता राम के लिए प्रतिहार का दायित्व निभाने के कारण लक्ष्मण के वंशज प्रतिहार क्षत्रिय कहलाये। रघुवंशी प्रतिहारों ने चावड़ांे से प्राचीन गुर्जर देश छीन लिया, उनकी राजधानी भी भीनमाल होनी चाहिए।3

प्रतिहार क्षत्रियों का राजस्थान में मण्डोर (वर्तमान जोधपुर), राजौरगढ़ के अलावा कन्नौज, ग्वालियर, चन्देरी, उचेहरा (बुन्देलखण्ड), जूझोती, अलीपुर, उरई, हिमाचल प्रदेश के कुछ भूभाग पर शासन रहा है। उक्त स्थानों के अलावा भी प्रतिहार क्षत्रियों के अनेक ठिकाने और जागीरें रही है, जहाँ प्रतिहारों की अनेक खांपों ने शासन किया है। इन खांपों में डाभी, लुल्लरा, सूरा, रामटा, बुद्धखेलिया, सोधिया, खुखर, ईन्दा, चन्द्र, माहप, घांघिल, सिन्धुका, डोरणा, सुवरण, कलहंस पड़िहार, देवल पड़िहार, मढाढ, खढाढ, चौनिया, बोजरा, झांगरा, बापणा (अब वैश्य है), चौपड़ा (अब वैश्य), गोढला (अब कुम्हार), पेसवाल (अब रैबारी), टाकसिया (अब कुम्हार), पूमोर, साम्भोर, बारी, बोथा, चोहिल, फलू, धांधिया, खरवढ, सीधका, तखी, गजकेसर परिहार, बाचलिया, चाँदणा, सिंधक, चोयल, माहर, पीसवाल, गोटला, चांदोरा, खुमोर, लूलावत प्रतिहार, रामावत प्रतिहार आदि प्रतिहारों की अनेक खांपें थी. इस समय कौनसी खांप के प्रतिहार कहाँ रहते है इसका विवरण जुटाना श्रमसाध्य कार्य है।

सन्दर्भ :

1- राजपूताने का प्राचीन इतिहास, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, पृष्ठ- 139,140
2- गुप्तोत्तर युगीन भारत का राजनैतिक इतिहास, डा. राजवंत राव व डा. प्रदीप कुमार राव, पृष्ठ -115
3- राजपूताने का प्राचीन इतिहास, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, पृष्ठ-143

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