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Saturday, October 1, 2022

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पैसे का ग्रुप चेक किया क्या ?

इन्सान जब जन्म लेता हे तब उसका वजन
ढाई किलो होता हे
ओ़र मरने के बाद अग्नि संस्कार के बाद उसकी राख का वजन भी
ढाई किलो होता हे |
जिन्दगी का पहला कपडा जिसका नाम हे ,ज़बला,
जिसमे जेब नहीं होती हे |
जिन्दगी का आखरी कपडा कफन ,
जिसमे भी जेब नहीं होती हे |
तो बिचके समय में जेब के लिए इतनी जंजाल क्यू ?
इतने छल और कपट क्यू ?
खून की बोतल लेने के पहले ब्लड ग्रुप चेक करते हे ,
पेसे लेते वक़्त जरा चेक करोगे की ,
पैसा कौनसे ग्रुप का हे ?
न्याय का हे ? हाय का हे ? या हराम का हे ?
और गलत ग्रुप का पैसा घरमें आ जाने से ही
आज घर में अशांति ,लडाई और झगड़ा है |
हराम और हाय का पैसा
दवाखाने , क्लब ,कोठा और बार में
ख़तम हो जायेगा
और आपको भी ख़तम कर देगा
बैंक बेलेन्स तो बढेगा ,पर परिवार का बेलेन्स कम होगा
तो समझना की पैसा हमें सूट नहीं हो रहा हे |

जनहित के कल्याण के लिए
” जय श्री राम
उपरोक्त तुकबंदी लाडनू से जयपाल सिंह ने मुझे ऑरकुट पर स्क्रप की |

ब्लॉग जगत में जिस तरह ब्लोगर टिप्पणियों के लालायित रहते है ठीक उसी तरह ऑरकुट पर भी लोग स्क्रप के लिए लालायित रहते है और स्क्रप पाने के लिए कई बार अनुरोध करते है अब देखिय योगेन्द्र को किसी के द्वारा स्क्रब न करना कितना सता रहा है |

ऑरकुट वालो …खमा घनी ….. ,

ओरकुट री गल्या मे थारी ही याद आवे हे सा …
Scrap नहीं करन री वजह बार बार सतावे हे ….
सोच रिहया का शायद थाने कोई गम हे जी ……..
या पछे थारे दील्डा मे म्हारे लीये जगह कोण्या हे सा ………..,

कदे कदे महोब्बत मे जुदाई भी आवे हे सा …
पर जुदाई प्यार ने और गह्रो बना जावे हे सा….
दो पल री जुदाई मे आंसू मन बहा भायला…..
जुदाई री तड़प प्यार ने और प्यारो बना जावे हे सा

५ जून २००९ को सुबह ५.५५ बजे पढ़े, एक ऐसे क्रान्तिकारी कवि के बारे में जिसने देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सब कुछ (जागीर तक) होम कर दिया | और उनके रचे चुटीले दोहे पढ़कर हिंदुआ सूर्य उदयपुर के महाराणा फतह सिंह ने वायसराय लार्ड कर्जन द्वारा आहूत दिल्ली दरबार में भाग नहीं लिया |

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10 COMMENTS

  1. badi bebak kavita lekin राख का वजन यदि शव विदुत शवदाह गृह में हाई वोल्टेज पर जले तो २.५ ग्राम से भी कम होता है बड़ा ही कटु सच बयां कराती कविता

  2. अरे हमें तो अब ओर्कुट भी बोझिल लगने लगा है ….पर कभी कभी ऐसे स्क्रैप पढ़ कर मन में हसीं छूट जाती है

    हिन्दी चिट्ठाकारों का आर्थिक सर्वेक्षण : परिणामो पर एक नजर

  3. आप इसे तुकबन्दी कह सकते है । पर यह जीवन का सार है । और पैसा हमें सूट हो रहा है क्यों कि हम ग्रुप चेक करने की मशीन तो नही रखते पर कोशिश करते है कि गलत रास्ते से पैसा आये ही नही ।

  4. वाह शेखावत जी…………बहुत ही लाजवाब……तुकबंदी अक्सर मज़ा देती है…………..कैसे हैं आप………..हमारी राम राम…. फरीदाबाद आने पर मुलाक़ात होगी………

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