पुण्डीर क्षत्रिय राजवंश का इतिहास

पुण्डीर वंश में पुण्डीर नाम का एक प्रसिद्ध राजा हुआ, जिससे यह वंश पुण्डीर कहलाया। पहले इनका राज्य तिलंगना (आन्धप्रदेश) में था। इनके कुछ नाम ब्रह्मदेव, समुंदराज, लोपराज, फीमराज, केवलराज, जढासुरराज, और मढ़ासुरराज बताये जाते हैं। मढ़ासुरराज कुरुक्षेत्र में स्नान करने के लिए आया था। वहाँ के शासक सिन्धु रघुवंशी ने अपनी पुत्री अल्पद का विवाह राजा मढ़ासुरराज से कर कैथल का क्षेत्र दहेज में दे दिया। यह घटना वि.सं. 702 की मानी जाती है। मढ़ासुरराज ने पुण्डरी शहर बसाया और उसे अपनी राजधानी बनाया। जिला करनाल के पुण्डरक, हावड़ी और चूर्णी स्थानों पर पुण्डीरों ने किले बनवाए।

चौहान सम्राट पृथ्वीराज के समय में पुण्डरीक उसके अधीन हो गए। उसने इन्हें जागीर में पंजाब का इलाका दिया। ये पृथ्वीराज के सामंतों में थे। पृथ्वीराज के बड़े सामंतों में चन्द पुंडीर थे, उसकी पुत्री से पृथ्वीराज का विवाह भी हुआ था। एक बार पृथ्वीराज शिकार खेलने गया था। उस समय शहाबुद्दीन गौरी ने भारत पर चढ़ाई की। चंद पुंडीर ने सेना लेकर चिनाब नदी के किनारे उसका मार्ग रोका। काफी देर तक युद्ध होने के बाद चंद पुण्डीर के पहुँचने पर फिर गौरी से जबरदस्त युद्ध हुआ। उसमें बगल से चंद पुण्डीर ने शत्रु पर हमला किया। उस युद्ध में इसका एक पुत्र वीरता पूर्वक युद्ध करता हुआ मातृभूमि के लिए बलिदान हुआ था। शहाबुद्दीन फिर युद्ध में परास्त होकर भागा। जब पृथ्वीराज कन्नौज से संयोगिता का हरण करके भागा, तब जयचन्द की विशाल सेना ने उसका पीछा किया। जयचन्द की सेना ने पृथ्वीराज के सामंतों ने घोर युद्ध करके उस विशालवाहिनी को रोका था, जिससे पृथ्वीराज को निकल जाने का समय मिला गया। उस भीषण युद्ध में चंद पुण्डीर कन्नौज की सेना से युद्ध करके जूझा था।

चंद पुंडीर का पुत्र धीर पुण्डीर था। वह भी बड़ा सामंत था। उसके अजयदेव, उदयदेव, वीरदेव, सवीरदेव, साहबदेव और बीसलदेव छह भाई और थे। एक बार जब शहाबुद्दीन भारत पर आक्रमण करने आया, तब पृथ्वीराज का सामंत जैतराव आठ हजार घुड़सवार सेना के साथ उसे रोकने के लिए गया था। उसके साथ धीर पुण्डीर तथा उसके अन्य भाई थी थे। उस युद्ध में धीर पुण्डीर का भाई उदयदेव वीर गति को प्राप्त हुआ था। एक बार मुसलमान घोड़ों के सौदागर बनकर पंजाब में आए और धोखे से धीर पुण्डीर को मार डाला। इस पर पावस पुण्डीर ने उन्हें मारा। पृथ्वीराज को जब इस घटना की खबर मिली, तब उसे बड़ा अफसोस हुआ। पावस पुण्डीर धीर पुण्डीर का पुत्र था। पृथ्वीराज के ई. 1192 में गौरी के साथ हुए अन्तिम युद्ध में पावस पुण्डीर मारा गया।

पुण्डीरों के वर्णन में है कि पुण्डीर शासक ईसम हरिद्वार का शासक था। उसके बाद क्रमशः सीखेमल, वीडो कदम, हास और कुंथल शासक हुए। कुंथल के बारह पुत्रों में अजब सबसे बड़ा था। बाद में उसका भाई सलख हरिद्वार का शासक हुआ। इसके दो पुत्र चांदसिंह और गजसिंह थे। गजसिंह रामगढ़ (वर्तमान अलीगढ़) की तरफ चला गया था। उसके वंशजों के काफी गाँव थे, जिनमें 80 गाँव मैनपुरी और इटावा जिले में थे। इस वंश का एक राज्य ‘‘जसमौर’’ था, जहाँ शाकम्भरी देवी का मेला लगता है। पुंडीर पंजाब के अलावा उत्तर प्रदेश में सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मैनपुरी, इटावा और अलीगढ़ जिलों में है। पुण्डीरों की एक शाखा कलूवाल है।

गोत्र-पुलस्त, कहीं कपिल भी है। प्रवर-पुलस्त, विश्वश्रवस और दंभोलि। वेद-यजुर्वेद, शाखा-वाजसनेयी माध्यन्दिनी, सूत्र-पारस्कर गृह्यसूत्र, कुलदेवी-दधिमति माता

लेखक : ठाकुर देवीसिंह, मंडावा

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