पत्नी को ताना देना भारी पड़ गया था सारण जाट पूला को

पत्नी को ताना देना भारी पड़ गया था सारण जाट पूला को

बीकानेर की स्थापना से पहले आज के बीकानेर के आस-पास उत्तर-पूर्व के कई गांवों पर गोदारा, सारण, बेनीवाल, पूनिया आदि गोत्रों के जाटों का अधिकार था| वे कृषि के साथ अपनी सुरक्षा भी खुद ही करते थे| उन दिनों शेखसर का जाट पांडू गोदारा बड़ा दानी था| उसकी दानशीलता के चर्चे थे| एक दिन पांडू का दाडी भाड़ंग के जाट पूला सारण के यहाँ मांगने गया| पूला ने अपने सामर्थ्य अनुसार दाडी को दान दिया| दान देने के बाद जब पूला पत्नी मिल्की से मिला तो मिल्की ने पूला से कहा- “चौधरी ऐसा दान करना था, जिससे पांडू से ज्यादा यश मिलता|” पूला उस वक्त नशे में था, सो उसने मिल्की को थप्पड़ रसीद करते हुए ताना मारा कि- तुझे बूढा पांडू अच्छा लगता है तो उसी के पास चली जा| मिल्की को यह बात चुभ गई और उसने उत्तर दिया- चौधरी मैंने तो तुझे एक बात कही थी, पर यदि तेरी यही सोच है तो आज से तेरे पास आऊँ तो भाई के पास आऊँ| और मिल्की ने उसी दिन से पूला से बातचीत बंद कर दी|

मिल्की ने इस घटना का पूरा वृतांत पांडू को कहला भेजा और सन्देश भेजा कि उसे आकर ले जाए| पांडू ने अपने पुत्र नकोदर को मिल्की को लाने भाड़ंग भेजा| मिल्की अपनी जगह एक दासी को बैठाकर खुद नकोदर के साथ शेखसर चली आई| पांडू हालाँकि बूढ़ा हो चला था फिर भी बात के लिए मिल्की को रख लिया|

जब भाड़ंग में मिल्की की खोज हुई, तब पूला को दासी से पता चला कि उसकी स्त्री मिल्की पांडू के पास चली गई| तब पूला ने रायसाल व कंवरपाल आदि जाटों को बुलाया ताकि पांडू पर आक्रमण कर मिल्की को ले जाने की सजा दी जा सके| लेकिन राव बीका राठौड़ पांडू का संरक्षक था, अत: इन जाटों की पांडू जाट पर आक्रमण की हिम्मत नहीं पाई| आखिरी पूला अपने सहयोगियों को लेकर सिवाणा के जाट स्वामी नरसिंह के पास गया| नरसिंह बड़ा वीर समझा जाता था| नरसिंह को साथ लेकर पूला ने पांडू पर आक्रमण किया| पांडू भागकर राव बीका की शरण में पहुँच गया| तब बीका ने नरसिंह, पूला आदि का पीछा किया और सिधमुख के पास जा घेरा| नरसिंह सो रहा था| बीका ने उसे उठाया और ललकारा| नरसिंह ने बीका पर वार किया, पर बीका के प्रतिवार के एक झटके में ही काम आया|  नरसिंह के मरते ही सभी जाट भाग खड़े हुए और पूला, रायसल, कंवरपाल आदि जाट प्रमुख बीका के पास आये और माफ़ी मांगते हुए उसकी अधीनता स्वीकार कर ली|

इस तरह वर्षों से स्वाधीनता भोग रहे उस क्षेत्र के जाटों ने राव बीका को अपना राजा माना और उसकी प्रजा बनकर शांतिपूर्वक रहने लगे|

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